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August 27 2026 04:23 am

'समान नागरिक संहिता का धर्म से वास्ता नहीं, यह संवैधानिक संकल्प है'; मुस्लिम पर्सनल लॉ पर केंद्र को नोटिस

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India News Live,Digital Desk : देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि UCC एक संवैधानिक आकांक्षा (Constitutional Aspiration) है और इसका किसी धर्म विशेष से कोई लेना-देना नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

शरीयत कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के उन प्रावधानों को लेकर हो रही है, जिन्हें महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि मौजूदा विरासत और उत्तराधिकार के नियम महिलाओं के साथ स्पष्ट रूप से अन्याय करते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे संवैधानिक कसौटी पर परखने का निर्णय लिया है।

'भेदभाव है तो रद्द होना चाहिए': प्रशांत भूषण की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कोर्ट में पुरजोर दलील दी कि पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद-25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है। भूषण ने कहा, "अगर कोई कानून भेदभावपूर्ण है, तो उसे रद्द किया जाना चाहिए। महिलाओं को पुरुष के मुकाबले आधा हिस्सा देना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का सीधा उल्लंघन है।" उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर कोर्ट शरीयत के इन प्रावधानों को रद्द करता है, तो 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' को लागू किया जा सकता है।

वसीयत पर पाबंदी और जटिल नियमों का जिक्र

सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की पेचीदगियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इसके नियम इतने जटिल हैं कि वकीलों के लिए भी इन्हें समझना मुश्किल होता है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी मेहनत से कमाई गई संपत्ति का भी केवल 1/3 हिस्सा ही अपनी मर्जी से वसीयत कर सकता है, जो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश है। भूषण ने कहा कि यह एक दीवानी (Civil) मामला है, न कि कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'पीड़ित महिलाएं खुद आएं आगे'

मामले की गहराई में जाते हुए सीजेआई ने सुझाव दिया कि इस कानून से जो महिलाएं वास्तव में पीड़ित हैं, उन्हें सीधे कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए ताकि भविष्य में कानूनी प्रक्रिया पर कोई सवाल न उठे। इस पर भूषण ने जानकारी दी कि याचिकाकर्ता संस्था का प्रतिनिधित्व एक मुस्लिम महिला ही कर रही हैं और कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस याचिका का समर्थन किया है। कोर्ट अब इस मामले पर केंद्र के जवाब का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद अगली दिशा तय होगी।