जानिए मरीजों के वे हैरान कर देने वाले बहाने, जिनसे वे डॉक्टर की फीस देने से बचते हैं; खुद डॉक्टरों ने खोले कई दिलचस्प राज
हमारे समाज में डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन जब बात उनकी फीस चुकाने की आती है, तो कई मरीजों का रवैया पूरी तरह बदल जाता है। दवाई की दुकान पर हजार रुपये की गोलियां बिना किसी हिचकिचाहट के खरीद लेने वाले लोग भी क्लिनिक के बाहर डॉक्टर की दो-तीन सौ रुपये की कंसल्टेशन फीस देने में सौ बार सोचते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि वर्षों की मेहनत, मेडिकल पढ़ाई और अनुभव के आधार पर दी जाने वाली डॉक्टरी सलाह को लोग "मुफ्त" की चीज समझते हैं? देश के अलग-अलग शहरों में प्रैक्टिस करने वाले वरिष्ठ डॉक्टरों और फिजीशियन ने अपने रोजमर्रा के अनुभवों को साझा करते हुए उन बहानों का खुलासा किया है, जिनका इस्तेमाल मरीज फीस देने से बचने के लिए करते हैं।
क्लीनिक के रिसेप्शन काउंटर से लेकर डॉक्टर के केबिन तक, फीस बचाने की यह कवायद हर दिन एक नए ड्रामे की तरह देखने को मिलती है। डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल आर्थिक मजबूरी की वजह से नहीं होता, बल्कि एक सामाजिक मानसिकता बन चुकी है जहाँ लोगों को लगता है कि "केवल बात करने" का पैसा क्यों दिया जाए।
"बस रिपोर्ट दिखानी है डॉक्टर साहब!": सबसे पुराना और सदाबहार बहाना
शहर के प्रसिद्ध जनरल फिजिशियन डॉक्टर संजय शर्मा बताते हैं कि मरीजों का सबसे पसंदीदा और वर्षों पुराना बहाना है—"हम इलाज कराने नहीं, बस रिपोर्ट दिखाने आए हैं।" मरीज या उनके परिजन लैब टेस्ट की रिपोर्ट हाथ में लेकर सीधे केबिन में घुसने की कोशिश करते हैं। उनका तर्क होता है कि डॉक्टर ने तो मरीज को पहले ही देख लिया था, अब तो सिर्फ कागज पर लिखी जांच रिपोर्ट पढ़नी है।
लेकिन हकीकत यह होती है कि रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर को मरीज की मौजूदा स्थिति का आकलन करना पड़ता है, दवाइयों की डोज में बदलाव करना होता है और आगे की सलाह देनी होती है। इसमें डॉक्टर का उतना ही समय और दिमाग खर्च होता है जितना पहली बार देखने में। बावजूद इसके, मरीज रिसेप्शन पर पर्ची कटवाए बिना सीधे केबिन में प्रवेश करने की जिद करते हैं और फीस मांगने पर असहज हो जाते हैं।
"आप तो अपने ही हैं!" - मोहल्लेदारी और दूर की रिश्तेदारी का दांव
भारत में किसी भी सेवा का मुफ्त में लाभ उठाने का सबसे बड़ा हथियार होता है—"जान-पहचान निकालना"। डॉक्टरों के मुताबिक, कई मरीज क्लिनिक में कदम रखते ही डॉक्टर के गांव, पुराने स्कूल, किसी दूर के रिश्तेदार या मोहल्ले के पूर्व पार्षद का हवाला देना शुरू कर देते हैं। "डॉक्टर साहब, हम तो गुप्ता जी के साले के पड़ोसी हैं" जैसी बातें कहकर वे एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करते हैं जिससे डॉक्टर संकोच में आकर फीस मांगने से हिचकिचाए।
अगर डॉक्टर फिर भी पेशेवर रुख अपनाते हुए फीस की बात करे, तो मरीज बुरा मान जाते हैं। कई बार लोग सीधे यह कह देते हैं कि "अरे आपसे क्या हिसाब-किताब करना, आप तो परिवार जैसे हैं।" इस तरह की भावनात्मक बयानबाजी के आगे कई बार डॉक्टर भी चुप रहने पर मजबूर हो जाते हैं।
डिजिटल पेमेंट का नया बहाना: "नेटवर्क नहीं आ रहा" और "क्यूआर कोड स्कैन नहीं हो रहा"
स्मार्टफोन और डिजिटल इंडिया के इस दौर में फीस न देने के तरीकों में भी टेक-सवी (Tech-savvy) बदलाव आया है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के क्लीनिकों में काम करने वाले युवा डॉक्टरों का कहना है कि अब 'कैश न होने' का पुराना बहाना बदलकर 'डिजिटल पेमेंट फेलियर' में तब्दील हो चुका है।
मरीज इलाज कराने के बाद रिसेप्शन पर जाकर फोन निकालते हैं, क्यूआर कोड स्कैन करने का नाटक करते हैं और फिर बड़े सीधेपन से कहते हैं, "अरे यार, सर्वर डाउन बता रहा है" या "पेमेंट पेंडिंग में चला गया है।" इसके बाद वे वादा करते हैं कि घर जाकर या नेटवर्क में आते ही गूगल पे (Google Pay) या फोनपे (PhonePe) कर देंगे। हालांकि, डॉक्टरों और उनके स्टाफ का अनुभव बताता है कि क्लिनिक से बाहर निकलने के बाद 90 फीसदी मामलों में वह ट्रांसफर कभी नहीं होता।
"दवाई से आराम ही नहीं मिला": फीस वापस मांगने और अगली बार न देने का लॉजिक
एक अन्य अजीबोगरीब स्थिति तब पैदा होती है जब मरीज दोबारा फॉलो-अप के लिए आता है। यदि पहली बार दी गई दवा से मरीज को पूरा आराम नहीं मिला, तो वह इस बात को ढाल बनाकर अगली विजिट की फीस देने से साफ इनकार कर देता है। कुछ मरीज तो इतने आगे बढ़ जाते हैं कि वे पिछली फीस वापस मांगने या उस पैसे के बदले नई दवाइयों की मांग करने लगते हैं।
त्वचा रोग विशेषज्ञ (Dermatologist) डॉ. अनामिका सिंह बताती हैं कि कई बीमारियों के इलाज में समय लगता है और ट्रायल-एंड-एरर के आधार पर दवाएं बदलनी पड़ती हैं। लेकिन मरीज इसे डॉक्टर की नाकामी मानकर फीस देने से मना कर देते हैं। उनका कहना होता है, "जब आपकी दवा से आराम ही नहीं पड़ा, तो हम किस बात के पैसे दें?"
व्हाट्सएप और फोन पर 'फ्री कंसल्टेशन' की उम्मीद
कोविड काल के बाद से टेली-कंसल्टेशन का चलन बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही डॉक्टरों की निजी जिंदगी में खलल भी बढ़ गया है। मरीज बिना कोई फीस चुकाए सीधे डॉक्टर के व्हाट्सएप पर स्किन रैशेज, ब्लड टेस्ट रिपोर्ट या बच्चे के बुखार का पर्चा भेज देते हैं और तुरंत सलाह की उम्मीद करते हैं।
यदि डॉक्टर कॉल पर या मैसेज में फीस जमा करने का लिंक भेजते हैं, तो मरीज को यह बेहद नागवार गुजरता है। लोग सोचते हैं कि मोबाइल पर दो मिनट बात करने या मैसेज का जवाब देने के लिए फीस मांगना डॉक्टर का लालच है। वे यह भूल जाते हैं कि डॉक्टर का समय और उनका ज्ञान ही उनकी आजीविका का साधन है।
डॉक्टरों की अपील: सलाह और समय की कीमत को समझें
इस पूरी स्थिति पर देश के मेडिकल एसोसिएशनों और वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि लोगों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की सख्त जरूरत है। किसी भी डॉक्टर की फीस सिर्फ उनके द्वारा लिखे गए दो पन्नों के पर्चे की नहीं होती, बल्कि उस विशेषज्ञता की होती है जिसे हासिल करने में उन्होंने अपनी जिंदगी के 10 से 15 साल पढ़ाई और कठिन मेहनत में लगाए हैं।
जैसे लोग वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट या किसी अन्य पेशेवर की फीस देने में संकोच नहीं करते, वैसे ही डॉक्टर की कंसल्टेशन फीस को भी उनके सम्मानजनक पारिश्रमिक के रूप में देखा जाना चाहिए। जब तक मरीज डॉक्टर की सलाह और समय की कीमत को नहीं समझेंगे, तब तक क्लिनिक के बाहर बहानों का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।