BJP संगठन के बाद अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल की आहट! 12 पद खाली और दावेदारों की लंबी लिस्ट; जानिए किनकी हो सकती है छुट्टी और किसे मिलेगी लाल बत्ती
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नए केंद्रीय संगठनात्मक ढांचे के ऐलान के बाद अब देश की सियासी निगाहें नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले संभावित कैबिनेट विस्तार और बड़े फेरबदल पर टिक गई हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन के नेतृत्व में नई राष्ट्रीय टीम के गठन और हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नए पदाधिकारियों के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद से ही सत्ता और संगठन के बीच जिम्मेदारियों के पुनर्संतुलन की चर्चाएं जोरों पर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन में नई चुनावी टीम तैयार होने के बाद अब केंद्रीय मंत्रिपरिषद को भी आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों की दीर्घकालिक रणनीतियों के अनुरूप नया कलेवर दिया जा सकता है। इस संभावित फेरबदल में न केवल मौजूदा मंत्रालयों के कार्यभार को संतुलित करने का प्रयास होगा, बल्कि एनडीए (NDA) के घटक दलों, युवा चेहरों, महिलाओं और सामाजिक संतुलन को भी विशेष तरजीह मिलने की संभावना है।
12 पद खाली और 14 मंत्रियों पर कई मंत्रालयों का भारी बोझ: क्या कहता है नियम?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(1A) के वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या (543) के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इस संवैधानिक सीमा के तहत केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री सहित अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। वर्तमान समय में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री समेत कुल 69 सदस्य कार्यरत हैं। इस गणितीय आधार पर मंत्रिपरिषद में सीधे तौर पर 12 मंत्री पद खाली पड़े हैं।
इसके अतिरिक्त, मौजूदा सरकार में लगभग 14 केंद्रीय मंत्री ऐसे हैं जो एक से अधिक भारी-भरकम मंत्रालयों का प्रभार संभाल रहे हैं। प्रशासनिक कामकाज की गति तेज करने और नीतिगत फैसलों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार मंत्रालयों के इस अत्यधिक बोझ को बांटने की दिशा में काम कर रही है। खाली पड़े 12 पदों को भरने के साथ-साथ कई विभागों का पुनर्गठन होने से शासन की दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
'एक व्यक्ति, एक पद' का सिद्धांत: किन पुराने मंत्रियों की हो सकती है संगठन में विदाई?
भाजपा में पारंपरिक रूप से 'एक व्यक्ति, एक पद' के संगठनात्मक सिद्धांत का कड़ाई से पालन किया जाता रहा है। संगठन की नई टीम में जगह पाने वाले मंत्रियों के भविष्य को लेकर सियासी गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं:
पीयूष गोयल: पार्टी की नई केंद्रीय टीम में पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण और समय-साध्य जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में उनके मंत्री पद पर बने रहने या केवल संगठन को समय देने को लेकर चर्चाएं गर्म हैं।
पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा: केंद्र में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष और हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। संगठनात्मक पदों पर पूर्णकालिक सक्रियता की आवश्यकता को देखते हुए इनके स्थान पर नए चेहरों को मंत्री बनाए जाने की संभावना है।
राज्यसभा कार्यकाल का गणित: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री बी. एल. वर्मा का राज्यसभा कार्यकाल इसी वर्ष नवंबर में समाप्त हो रहा है। इस कारण इन पदों पर भी नए समायोजन की दृष्टि से विचार किया जा रहा है।
हालिया इस्तीफे और रिक्तियां: पेपर लीक विवादों के बीच धर्मेंद्र प्रधान के पद छोड़ने, तथा राज्यसभा कार्यकाल पूरा होने पर जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू के केंद्रीय मंत्रिपरिषद से हटने के बाद शिक्षा, अल्पसंख्यक कार्य और रेल राज्य मंत्री जैसे अहम पोर्टफोलियो में भी स्थायी चेहरों की जरूरत महसूस की जा रही है।
युवा चेहरों और महिलाओं को तरजीह: औसत आयु घटाने पर फोकस
मौजूदा केंद्रीय मंत्रिपरिषद के आयु वर्ग के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस समय 12 से अधिक मंत्री 70 वर्ष से अधिक आयु के हैं, जिनमें हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संरक्षक जीतन राम मांझी (81 वर्ष) सबसे वरिष्ठ हैं। वहीं तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के के. राममोहन नायडू (38 वर्ष) मंत्रिपरिषद के सबसे युवा कैबिनेट मंत्री हैं।
सूत्रों के मुताबिक, आगामी विस्तार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवा सांसदों और महिला जनप्रतिनिधियों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में भी जिस तरह से 30 से 50 वर्ष के बीच के ऊर्जावान चेहरों को आगे बढ़ाया गया है, उसी तर्ज पर सरकार में भी तकनीकी रूप से दक्ष, प्रशासनिक क्षमता वाले और नए जमाने के मुद्दों पर मुखर रहने वाले युवा सांसदों को राज्य मंत्री का स्वतंत्र प्रभार या राज्य मंत्री पद देकर ग्रूम किया जा सकता है।
सहयोगी दलों की दावेदारी: श्रीकांत शिंदे से लेकर अकाली दल पर नजरें
एनडीए गठबंधन की सरकार होने के नाते इस संभावित फेरबदल में घटक दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनके बदले हुए संख्याबल का पूरा ध्यान रखा जाएगा:
शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट): महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरणों और पार्टी सांसदों की संख्या को देखते हुए कल्याण से सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे का नाम कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार के पद के लिए सबसे मजबूत दावेदारों में चल रहा है।
शिरोमणि अकाली दल (SAD): पंजाब में भाजपा और अकाली दल के पुराने गठबंधन के पुनर्जीवित होने की सुगबुगाहटों के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल का नाम भी चर्चा में बना हुआ है, हालांकि इस पर अंतिम फैसला दोनों दलों के औपचारिक समझौते पर निर्भर करेगा।
नए संसदीय गुटों का समायोजन: विपक्षी दलों से बगावत कर एनडीए को समर्थन देने वाले सांसदों के गुटों और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर एनसीपीआई (NCPI) के बैनर तले आए सांसदों को भी प्रतीकात्मक रूप से मंत्रिपरिषद में शामिल कर चौंकाने वाले फैसले लिए जा सकते हैं।
आम आदमी पार्टी के पूर्व सांसद: हाल के दिनों में आप छोड़कर भाजपा खेमे में आए राज्यसभा सांसदों के समूह में से भी किसी एक प्रमुख चेहरे को केंद्र में मौका दिए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं।
चुनावी राज्यों के समीकरण: यूपी, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण पर विशेष रणनीति
कैबिनेट फेरबदल में आगामी विधानसभा चुनावों वाले राज्यों को प्रतिनिधित्व देना भाजपा की हमेशा से प्रमुख चुनावी रणनीति रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने के लिए नए चेहरों को मौका मिल सकता है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पिछड़ी जातियों (OBC), दलितों और ब्राह्मण समाज से आने वाले जमीन से जुड़े सांसदों को केंद्रीय टीम में शामिल कर मजबूत सामाजिक संदेश देने की योजना है।
इसके अलावा गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और केरल से भी प्रभावी वक्ता और स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले नेताओं को मंत्रिपरिषद में शामिल कर वहां पार्टी के विस्तार को गति दी जा सकती है।
2029 की लंबी तैयारी और अंतिम आधिकारिक घोषणा का इंतजार
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि मोदी कैबिनेट का यह संभावित फेरबदल केवल रिक्त पदों को भरने का साधारण प्रशासनिक कदम नहीं होगा, बल्कि यह 2029 के आम चुनावों के लिए सरकार और संगठन की संयुक्त ताकत को धार देने वाला रणनीतिक कदम साबित होगा। यद्यपि अभी तक प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) या राष्ट्रपति भवन की ओर से शपथ ग्रहण या फेरबदल की किसी विशिष्ट तारीख की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन संगठन की नई टीम की सक्रियता और रिक्तियों की संख्या को देखते हुए यह माना जा रहा है कि संसद के आगामी सत्र से पहले या आगामी राज्य चुनावों की घोषणा से पूर्व केंद्रीय मंत्रिपरिषद में यह महा-बदलाव धरातल पर दिखाई दे सकता है।