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August 26 2026 05:07 am

'दान की पाई-पाई भगवान के खजाने में जाए...', बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश; कहा- पहले प्रभु का हक

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उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन स्थित करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र श्री बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे और दान की धनराशि के प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। देश की शीर्ष अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाने वाले दान के एक-एक पैसे पर पहला और पूर्ण अधिकार केवल और केवल आराध्य 'ठाकुर जी' (भगवान/Deity) का है। कोर्ट ने मंदिर की प्रबंध समिति और सेवायतों को निर्देश दिया है कि मंदिर में आने वाला सारा चढ़ावा अनिवार्य रूप से आधिकारिक दानपात्रों (गोलक) या अधिकृत ऑनलाइन डिजिटल माध्यमों से सीधे मंदिर के मुख्य खजाने में जमा होना चाहिए। अदालत ने साफ चेतावनी दी है कि इस पारदर्शी व्यवस्था में किसी भी सेवायत, पुजारी या अन्य व्यक्ति द्वारा डाली जाने वाली बाधा को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा और इसे कोर्ट की अवमानना माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: दान की पाई-पाई पहले भगवान के खजाने में जाएगी

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह सख्त दिशा-निर्देश जारी किए।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, "इस बात में किसी को भी रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए। हम स्पष्ट रूप से निर्देशित करते हैं कि दान का हर एक पैसा या तो मंदिर के अधिकृत दानपात्रों के जरिए या फिर सीधे ऑनलाइन मंदिर के खजाने (Treasury) में ही आना चाहिए। सेवायतों या किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा इस प्रक्रिया में किसी भी तरह का व्यवधान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।" सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की निगरानी कर रही हाई पावर कमेटी को तत्काल प्रभाव से एक पारदर्शी, सुरक्षित और फूलप्रूफ व्यवस्था लागू करने का आदेश दिया ताकि चढ़ावे का सही और ऑडिटेड हिसाब-किताब रखा जा सके।

'पुजारी का भगवान पर गार्निशी अधिकार नहीं हो सकता': जस्टिस बागची की दो टूक टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जब सेवायतों और पुजारियों की ओर से यह दलील दी गई कि वे लंबे समय से चली आ रही परंपरा और दीवानी अदालत (Civil Court) के पुराने आदेशों के तहत दान की राशि पर अपना अधिकार रखते हैं, तो इस पर खंडपीठ ने बेहद तीखी और संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

खंडपीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट करते हुए कहा, "अदालत सेवायतों के उस हिस्से पर कोई विवाद नहीं कर रही है जो उन्हें उनकी भंडारी या सेवा की जिम्मेदारियों के तहत मिलना तय है। लेकिन दान सबसे पहले भगवान को समर्पित होना चाहिए। एक पुजारी या सेवायत का भगवान पर कोई 'गार्निशी राइट' (Garnishee Right - पूर्व कुर्की या सीधा कब्जा करने का अधिकार) नहीं हो सकता। आप यह व्यवहार नहीं कर सकते कि श्रद्धालु द्वारा मंदिर में प्रवेश करने और भगवान के कोष में पैसा डालने से पहले ही उस रकम पर आपका मालिकाना हक हो गया। पहले सारा पैसा देवता के फंड में दर्ज होगा, उसके बाद ही नियमों के तहत जो भी हिस्सा बनता है, वह संबंधित सेवायत को दिया जाएगा।"

पॉलीथिन बैग में दान और ढके हुए दानपात्र: हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कोर्ट के समक्ष मंदिर की वर्तमान व्यवस्था पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट और कई संवेदनशील तस्वीरें व वीडियो फुटेज पेश किए। इन साक्ष्यों ने मंदिर के भीतर चल रही मनमानी की पोल खोल दी।

वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि मंदिर परिसर में कई गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं:

दानपात्रों को ढकना: मंदिर में रखे गए आधिकारिक दानपात्रों (गोलक) को फूलों की मालाओं, बड़ी थालियों और कपड़ों से ढक दिया जाता है ताकि सामान्य श्रद्धालु उसमें सीधे पैसे न डाल सकें।

पॉलीथिन बैग में वसूली: वीडियो साक्ष्यों में देखा गया कि दानपात्रों के ठीक सामने खड़े होकर कुछ लोग श्रद्धालुओं को गोलक में पैसे डालने से रोक रहे हैं और उनसे सीधे कैश लेकर अपने व्यक्तिगत झोलों और पॉलीथिन बैगों में भर रहे हैं।

क्यूआर कोड (QR Codes) के साथ छेड़छाड़: ऑनलाइन डिजिटल दान के लिए लगाए गए आधिकारिक क्यूआर कोड्स को या तो क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है या उन पर पोस्टर चिपकाकर उन्हें निष्क्रिय करने की कोशिश की जाती है।

हाई पावर कमेटी ने कोर्ट को बताया कि इन अनैतिक हथकंडों के चलते मंदिर के आधिकारिक राजस्व और खजाने को भारी नुकसान पहुंच रहा है, जबकि दान का एक बड़ा हिस्सा सीधे निजी हाथों में चला जाता है।

'भोग' और सेवायतों के अधिकार का दावा: अदालत ने खींची लक्ष्मण रेखा

याचिकाकर्ता सेवायत गोस्वामियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि भंडारी द्वारा श्रद्धालुओं से लिया जाने वाला नकद पैसा भगवान के 'भोग' (प्रसाद) के लिए एकत्र किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह सेवायतों का पारंपरिक 'यूसुफ्रुक्टुअरी राइट' (उपभोग का अधिकार) है जिसे 1939 के ऐतिहासिक सिविल कोर्ट डिक्री द्वारा कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि परंपराएं और अधिकार कानून और भगवान के सर्वोपरि दर्जे से ऊपर नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि जब कोई भक्त मंदिर में आता है, तो वह किसी व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि बांके बिहारी जी को अपनी श्रद्धा अर्पित करता है। इसलिए वह धन सबसे पहले मंदिर के सार्वजनिक खाते में जमा होना कानूनी और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है।

कॉरिडोर निर्माण और जमीन खरीद: बिना सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के नहीं खर्च होगा एक भी रुपया

सुनवाई के दौरान बांके बिहारी मंदिर क्षेत्र के समग्र विकास, दर्शन व्यवस्था और प्रस्तावित कॉरिडोर निर्माण को लेकर भी अहम चर्चा हुई। सेवायतों के वकील ने आरोप लगाया कि मंदिर के कोष का इस्तेमाल मनमाने तरीके से संपत्तियां खरीदने में किया जा रहा है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया:

कोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य: मंदिर के खजाने या फंड से किसी भी प्रकार की अचल संपत्ति या जमीन खरीदने से पहले सुप्रीम कोर्ट को सूचित करना होगा और अदालत की पूर्व लिखित मंजूरी के बाद ही कोई वित्तीय लेन-देन संपन्न होगा।

श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाएं: अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट को श्रद्धालुओं के लिए डिस्पेंसरी, आधुनिक शौचालय, पेयजल, छांव और भीड़ नियंत्रण जैसी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण का पूरा अधिकार दिया गया है।

जमीन अधिग्रहण पर रुख: कमेटी ने बताया कि विकास कार्यों के लिए कुल 5.5 एकड़ जमीन की आवश्यकता है, जिसमें से आधा एकड़ जमीन खरीदी जा चुकी है। कोर्ट ने कमेटी को जमीन मालिकों से आपसी बातचीत जारी रखने को कहा और निर्देश दिया कि यदि कोई निजी अड़चन आती है तो अदालत राज्य सरकार को नियमानुसार भूमि अधिग्रहण का आदेश देगी।

दर्शन व्यवस्था का नियमन: अदालत ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऑनलाइन दर्शन स्लॉट या टोकन सिस्टम लागू करने के सुझावों पर भी विचार करने को कहा।

बांके बिहारी मंदिर विवाद की पृष्ठभूमि: ऑर्डिनेंस, ट्रस्ट और प्रबंधन की कानूनी जंग

वृंदावन का यह पूरा विवाद तब गरमाया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने 'श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश 2025' के माध्यम से मंदिर के प्रबंधन को एक वैधानिक और सरकारी निगरानी वाले ट्रस्ट के दायरे में लाने की पहल की। काशी विश्वनाथ और उज्जैन महाकाल की तर्ज पर राज्य सरकार मंदिर क्षेत्र में एक भव्य और सुरक्षित कॉरिडोर बनाना चाहती है ताकि आए दिन होने वाले हादसों और भगदड़ जैसी स्थितियों से बचा जा सके।

हालांकि, मंदिर के पारंपरिक सेवायत गोस्वामी परिवारों ने राज्य सरकार के इस प्रस्तावित ट्रस्ट का कड़ा विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं। उनका तर्क था कि यह मंदिर एक निजी व संप्रदाय-विशेष का धार्मिक स्थल है। इसके बाद अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था के तहत पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया था, जो वर्तमान में मंदिर के दैनिक प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी कर रही है। अदालत ने सभी पक्षों को हाई पावर कमेटी की ताजा स्टेटस रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां और जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

भक्तों की आस्था की जीत: पारदर्शी व्यवस्था से बढ़ेगा मंदिर का वैभव

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े आदेश को देश भर के करोड़ों कृष्ण भक्तों ने एक ऐतिहासिक और जरूरी फैसला करार दिया है। हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपनी गाढ़ी कमाई में से करोड़ों रुपये का चढ़ावा बांके बिहारी जी के चरणों में समर्पित करते हैं। ऐसे में दान के पैसों की बंदरबांट और बिचौलियों की मनमानी पर रोक लगने से न केवल मंदिर के खजाने में वृद्धि होगी, बल्कि उस धन का उपयोग वृंदावन आने वाले बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग श्रद्धालुओं की सुख-सुविधाओं और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में किया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संदेश देता है कि आस्था के नाम पर वित्तीय मनमानी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगी और भगवान का धन केवल भगवान और उनके भक्तों के कल्याण के लिए ही खर्च होगा।