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August 19 2026 07:56 pm

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर नई आफत: चिरैया नाले की पुलिया का प्रोटेक्शन वर्क धंसा, नीचे बना बड़ा खोखलापन

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राजधानी लखनऊ और औद्योगिक नगरी कानपुर के बीच सफर को आसान और हाई-स्पीड बनाने के लिए तैयार किए गए 63 किलोमीटर लंबे नए कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर तकनीकी खामियों और निर्माण गुणवत्ता का संकट लगातार गहराता जा रहा है। बारिश के मौसम में इस एक्सप्रेसवे पर नित नई परेशानियां उभरकर सामने आ रही हैं। सड़क धंसने, क्रैश बैरियर चटकने, डामर उखड़ने और पुलों के जोड़ों में दरारें आने के बाद अब एक और गंभीर मामला सामने आया है। लखनऊ से कानपुर जाने वाली लेन पर चिरैया नाले के ऊपर बनी पुलिया का सुरक्षात्मक 'प्रोटेक्शन वर्क' अचानक नीचे की ओर धंस गया है। पानी के तेज बहाव और मिट्टी के भारी कटाव के चलते पुलिया के नीचे एक बड़ा खोखलापन बन गया है, जिससे हाई-स्पीड कॉरिडोर पर दौड़ने वाले वाहनों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

चिरैया नाले पर क्या हुआ: किमी 36.8 के पास नीचे से बह गई मिट्टी

घटना एक्सप्रेसवे के ग्रीनफील्ड हिस्से में किलोमीटर संख्या 36.8 और 36.9 के मध्य की है। यहां चिरैया नाले के ऊपर से गुजरने वाले मार्ग के लिए कंक्रीट की पुलिया और उसके दोनों किनारों पर सुरक्षा दीवार बनाई गई थी। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, हाल ही में हुई मूसलाधार बारिश के बाद नाले में जलस्तर तेजी से बढ़ा।

पानी के तेज बहाव और जलनिकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण पुलिया की नींव और प्रोटेक्शन वर्क के नीचे भरी गई मिट्टी धीरे-धीरे कटकर बह गई। इसके चलते कंक्रीट और पत्थर की पिचिंग वाला हिस्सा नीचे की ओर झुककर बैठ गया। जब नींव का सहारा ही हट गया, तो वहां गहरा गड्ढा और खोखलापन नजर आने लगा। यदि इस हिस्से पर समय रहते ध्यान न दिया जाता, तो पुलिया से सटी एप्रोच रोड धंस सकती थी, जिससे 100 से 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरने वाले वाहनों के लिए जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती थी।

प्रोटेक्शन वर्क क्या होता है और यह एक्सप्रेसवे के लिए क्यों है जीवनरेखा?

सिविल इंजीनियरिंग के मानकों के अनुसार, किसी भी नदी, नाले, नहर या जलस्रोत के ऊपर पुलिया अथवा अंडरपास बनाते समय उसके दोनों ओर 'प्रोटेक्शन वर्क' यानी सुरक्षात्मक ढांचा तैयार किया जाता है। इसमें भारी पत्थरों की पिचिंग (Stone Pitching), जियो-टेक्सटाइल लेयर, कंक्रीट की मजबूत परत और ड्रेनेज स्लोप शामिल होते हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि भारी बारिश या बाढ़ की स्थिति में नाले का पानी पुलिया के पिलर, नींव और मुख्य सड़क के नीचे की मिट्टी को बहाकर न ले जाए। यह सुरक्षा दीवार पानी की धारा को सीधा मोड़ती है और सड़क के आधार (Sub-base) को ठोस बनाए रखती है। चिरैया नाले पर इसी सुरक्षा परत के धंसने से यह स्पष्ट हो गया है कि निर्माण के दौरान मिट्टी की सही ढंग से कॉम्पेक्शन (दबाव देकर ठोस करना) नहीं की गई थी या फिर सीमेंट-कंक्रीट की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी।

एनएचएआई का तुरंत एक्शन: मौके पर मिट्टी का भराव और सुदृढ़ीकरण जारी

पुलिया का प्रोटेक्शन वर्क धंसने की सूचना मिलते ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और निर्माण एजेंसी की पेट्रोलिंग टीम हरकत में आई। अधिकारियों ने तुरंत उस हिस्से के आसपास चेतावनी संकेत और बैरिकेडिंग लगाई ताकि कोई वाहन अनियंत्रित होकर किनारे की तरफ न जाए।

एनएचएआई के अधिकारियों के अनुसार, पानी के भारी दबाव के कारण निचली सतह से कुछ मिट्टी बही थी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मौके पर भारी मशीनें, डंपर और मजदूर तैनात कर दिए गए हैं। युद्धस्तर पर गड्ढे में मिट्टी और गिट्टी का भराव कर उसे रोलर व वाइब्रेटर से ठोस बनाया जा रहा है, ताकि दोबारा पानी आने पर रिसाव न हो। कार्यदायी संस्था का दावा है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और यातायात को किसी भी समय रोका नहीं गया है।

4200 करोड़ के प्रोजेक्ट पर उठते सवाल: 20 दिनों में दर्जनों जगह आई खामियां

करीब 4,200 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार हुआ कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे अभी पूरी तरह अपनी उपयोगिता साबित भी नहीं कर पाया था कि आए दिन हो रहे नुकसान ने जनता और विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। पिछले एक महीने के भीतर इस एक्सप्रेसवे पर कई गंभीर तकनीकी समस्याएं उजागर हो चुकी हैं:

सड़क धंसना और वन-वे ट्रैफिक: कानपुर से लखनऊ की तरफ किमी 32.4 के पास सड़क का एक बड़ा हिस्सा धंस गया था, जिसके बाद वहां कई दिनों तक यातायात को केवल एक संकरी लेन से निकाला गया।

स्लोप की मिट्टी खिसकना: किमी 60 के आगे बने अंडरपास के पास ढलान (स्लोप) की कच्ची मिट्टी पूरी तरह बह गई थी। स्लोप पर कंक्रीट की पक्की परत न होने से सड़क के बेस पर सीधा खतरा पैदा हो गया।

क्रैश बैरियर में दरारें: किमी 55 के आसपास सुरक्षा के लिए लगाए गए कंक्रीट क्रैश बैरियर में लंबी दरारें आ गईं और कुछ हिस्से टूटकर लटक गए।

पुलों के जोड़ में खराबी: गंगा एक्सप्रेसवे जंक्शन और अन्य कैनल ब्रिज के पास एक्सपेंशन जॉइंट्स के किनारों पर गहरी दरारें दिखाई देने लगीं, जिन्हें आनन-फानन में सीमेंट भरकर ढका गया।

ड्रेनेज सिस्टम की विफलता: 500 लीटर पानी भी 7 मिनट में बाहर नहीं निकला

एक्सप्रेसवे के बार-बार धंसने और क्षतिग्रस्त होने की सबसे बड़ी जड़ इसका दोषपूर्ण जलनिकासी तंत्र (Drainage System) माना जा रहा है। एक्सप्रेसवे के ग्रीनफील्ड हिस्से में पियरियां गांव (किमी 58.5) और आसपास के इलाकों में हल्की बारिश के 24 घंटे बाद भी मुख्य कैरिजवे पर पानी जमा रहता है।

एनएचएआई द्वारा किए गए शुरुआती ड्रेनेज टेस्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ था। जब सड़क पर टेस्टिंग के लिए 500 लीटर पानी डाला गया, तो वह 7 मिनट बीत जाने के बाद भी नालियों के जरिए बाहर नहीं निकल सका। सड़क के किनारों पर बनी नालियों का मुख्य हाईवे से सही ढलान और कनेक्शन ही नहीं बनाया गया था। जब पानी सड़क और डिवाइडर के बीच रुकता है, तो वह डामर (तारकोल) को उखाड़ देता है और धीरे-धीरे सड़क की नींव में रिसकर पूरी सड़क को खोखला कर देता है। अब निर्माण एजेंसी चालू एक्सप्रेसवे पर नालियों को जगह-जगह से तोड़कर दोबारा री-अलाइन करने में जुटी है।

गंगा एक्सप्रेसवे पर भी उन्नाव में दोहराया जा रहा वही मंजर

चिंता की बात यह है कि उन्नाव जिले की सीमा से गुजरने वाले दोनों बड़े एक्सप्रेसवे इस समय मानसूनी बारिश की मार झेल रहे हैं। एक तरफ कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर पुलिया और बैरियर क्षतिग्रस्त हो रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर निर्माणाधीन 'गंगा एक्सप्रेसवे' पर किमी 418 से 433 के बीच बशीरतगंज, मांखी, रुपऊ और तारगांव के पास सड़क और ढलान की मिट्टी बार-बार धंस रही है। पैचवर्क किए जाने के 24 घंटे के भीतर बारिश होते ही डामर फिर से धंस रहा है। दोनों ही प्रोजेक्ट्स में सामने आ रही ये कमियां निर्माण एजेंसियों की निगरानी और मैटेरियल क्वालिटी कंट्रोल पर गंभीर सवालिया निशान लगा रही हैं।

यात्रियों के लिए एडवाइजरी: बारिश के दौरान सावधानी से करें सफर

इंजीनियरों और सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक एक्सप्रेसवे के सभी ड्रेनेज आउटलेट, स्लोप पिचिंग और पुलिया के प्रोटेक्शन वर्क को स्थायी रूप से मजबूत नहीं किया जाता, तब तक केवल पैचवर्क या मिट्टी भरने से समस्या का समाधान नहीं होगा। भारी बारिश के दौरान पानी का रिसाव दोबारा बेस को कमजोर कर सकता है।

एनएचएआई और ट्रैफिक पुलिस ने लखनऊ और कानपुर के बीच सफर करने वाले वाहन चालकों से अपील की है कि वे बारिश के मौसम में गति सीमा का कड़ाई से पालन करें। विशेष रूप से पुलिया, अंडरपास और डायवर्जन वाले संवेदनशील हिस्सों पर अचानक ब्रेक लगाने या तेज रफ्तार में ओवरटेक करने से बचें। सुरक्षा पेट्रोलिंग टीमें लगातार मार्ग का निरीक्षण कर रही हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सुरक्षात्मक कदम उठाए जा सकें।