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August 19 2026 08:42 pm

जिंदा रहते अपनी 'मौत' देखने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे लोग: चीन में तेजी से वायरल हुआ ताबूत और अंतिम संस्कार का यह खौफनाक ट्रेंड

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कल्पना कीजिए कि आप एक शांत कमरे में बैठे हैं, अपने जीवन की अंतिम वसीयत लिख रहे हैं, अपने प्रियजनों के लिए आखिरी संदेश छोड़ रहे हैं और फिर आपको एक संकरे, ठंडे ताबूत में बंद कर दिया जाता है। इसके बाद मशीनें आपको एक गर्म सुरंग में धकेलती हैं, जहां 40 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हवाएं और लाल रोशनी यह अहसास कराती हैं कि आपका अंतिम संस्कार (दाह संस्कार) किया जा रहा है। यह किसी हॉरर फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि चीन में इस समय का सबसे बड़ा और चर्चित लाइफस्टाइल ट्रेंड बन चुका है, जिसे 'डेथ सिमुलेशन' कहा जा रहा है।

शंघाई, बीजिंग और चेंगदू जैसे बड़े महानगरों में ऐसे कई 'डेथ कैफे' और सिमुलेशन सेंटर खुल चुके हैं, जहां लोग मोटी रकम चुकाकर अपनी नकली मौत का अहसास करने पहुंच रहे हैं। तकनीक की मदद से यहां व्यक्ति को मृत्यु के क्षण से लेकर शवदाह गृह और फिर एक सफेद 'जन्म नली' (बर्थ कैनाल) के जरिए दोबारा जीवित होने का पूरा 4D अनुभव कराया जाता है। इस पूरे अनुभव के लिए लोग भारी-भरकम फीस देने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं।

ताबूत में बंद होकर 'पुनर्जन्म' का अहसास: कैसे काम करता है यह पूरा सिस्टम?

इस खेल की शुरुआत एक मनोवैज्ञानिक खेल से होती है। प्रतिभागियों को जीवन और मृत्यु से जुड़े कठिन नैतिक सवालों के जवाब देने होते हैं। जो प्रतिभागी खेल के नियमों के अनुसार 'जीवित' रहने के मानक पूरे नहीं कर पाते, उन्हें 'मृत' घोषित कर दिया जाता है।

इसके बाद शुरू होता है मौत का असली सफरनामा। 'मृत' व्यक्ति को एक असली लकड़ी के ताबूत में लिटाया जाता है। ताबूत का ढक्कन पूरी तरह बंद कर दिया जाता है और भारी संगीत, रोने की ध्वनियों और खास लाइटिंग के बीच उसे कन्वेयर बेल्ट पर आगे बढ़ाया जाता है। यह बेल्ट सीधे एक गर्म चैंबर की ओर जाती है, जो ठीक श्मशान घाट की भट्टी जैसा दिखता है।

चैंबर के अंदर पहुंचते ही तापमान तेजी से बढ़ता है और फॉग मशीनों के जरिए धुएं का माहौल तैयार किया जाता है, जिससे प्रतिभागी को यह विश्वास हो जाए कि उसका शरीर राख में तब्दील हो रहा है। इसके ठीक बाद, एक शीतल, नरम और सफेद सुरंग खुलती है, जहां से प्रतिभागी रेंगते हुए बाहर निकलता है। इस हिस्से को 'पुनर्जन्म' का नाम दिया गया है। बाहर निकलते ही व्यक्ति को एक नया जीवन प्रमाण पत्र भी दिया जाता है।

आधुनिक तनाव, '996' वर्क कल्चर और मेंटल डिटॉक्स की अनोखी राह

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोग ऐसी डरावनी प्रक्रिया से गुजरने के लिए पैसे क्यों खर्च कर रहे हैं। समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इसका सीधा संबंध चीन के युवाओं में बढ़ते मानसिक तनाव और भीषण वर्क कल्चर से है। चीन के कॉरपोरेट जगत में कुख्यात '996' संस्कृति (सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, हफ्ते में 6 दिन काम) ने युवाओं को भावनात्मक और शारीरिक रूप से निचोड़ कर रख दिया है।

प्रतियोगिता, मकान की आसमान छूती कीमतें, करियर का दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फंसे युवाओं के लिए यह सिमुलेशन एक 'इमोशनल रीसेट बटन' का काम कर रहा है। ताबूत में बिताए गए वे कुछ मिनट लोगों को अपनी दौड़-भाग भरी जिंदगी से पूरी तरह काट देते हैं। वहां मौजूद अंधेरे में उन्हें यह सोचने का मौका मिलता है कि असल जिंदगी में क्या खोया और क्या पाना बाकी था।

कई प्रतिभागियों का कहना है कि जब वे उस गर्म चैंबर से बाहर निकले, तो उन्हें लगा कि उनकी सारी समस्याएं, ईएमआई का तनाव और ऑफिस की डांट बहुत छोटी चीजें हैं। मौत का आभास होते ही जिंदगी की अहमियत कई गुना बढ़ जाती है। इसे युवा एक प्रकार की शॉक-थेरेपी या 'एक्सट्रीम मेंटल डिटॉक्स' मान रहे हैं।

दुनिया भर में तेजी से पैर पसारता डार्क टूरिज्म (Dark Tourism)

चीन में मौत का यह अनुभव अकेले नहीं बढ़ रहा, बल्कि यह ग्लोबल 'डार्क टूरिज्म' या 'थैनाटूरिज्म' (Thanatourism) का ही एक आधुनिक रूप है। डार्क टूरिज्म का मतलब होता है ऐसी जगहों की यात्रा करना जो मौत, त्रासदी, आपदा या खौफनाक इतिहास से जुड़ी हों।

यूक्रेन का चेरनोबिल परमाणु संयंत्र हो, पोलैंड का ऑशविट्ज़ नाजी यातना शिविर हो या फिर जापान का 'सुसाइड फॉरेस्ट' ओकिगाहारा—दुनिया भर में लोग हमेशा से मौत और रहस्य के प्रति आकर्षित रहे हैं। पहले डार्क टूरिज्म ऐतिहासिक त्रासदियों को देखने तक सीमित था, लेकिन अब यह व्यक्तिगत अनुभवों (Experiential Tourism) में बदल चुका है।

दक्षिण कोरिया में भी कुछ साल पहले 'हैप्पी डाइंग' के नाम से ऐसे ही नकली अंतिम संस्कार के केंद्र खोले गए थे, जहां आत्महत्या की दर को कम करने के लिए लोगों को अपनी मौत का अहसास कराया जाता था। अब चीन ने इस अवधारणा को अत्याधुनिक तकनीक और गेमिंग फॉर्मेट के साथ जोड़कर एक बड़ा कमर्शियल रूप दे दिया है।

क्या यह वाकई बदल रहा है जिंदगी का नजरिया? एक्सपर्ट्स की राय

मनोवैज्ञानिक इसे 'टेरर मैनेजमेंट थ्योरी' (Terror Management Theory) के चश्मे से देखते हैं। जब किसी इंसान को सीधे तौर पर उसकी नश्वरता का अहसास कराया जाता है, तो उसके भीतर जीवन के प्रति आभार (Gratitude) का भाव अचानक बढ़ जाता है। लोग अपने रिश्तों को सुधारने, अपनी प्राथमिकताओं को दोबारा तय करने और गैर-जरूरी तनाव को छोड़ने के लिए प्रेरित होते हैं।

हालांकि, कुछ मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि क्लॉस्ट्रोफोबिया (बंद जगहों का डर), डिप्रेशन या गंभीर एंग्जाइटी से जूझ रहे लोगों के लिए ऐसा अनुभव खतरनाक भी हो सकता है। बिना पेशेवर निगरानी के इस तरह के चरम अनुभवों में जाना पैनिक अटैक को जन्म दे सकता है। इसके बावजूद, सोशल मीडिया के दौर में इस तरह के सिमुलेटर केवल थेरेपी ही नहीं, बल्कि 'एडवेंचर और स्टेटस सिंबल' भी बनते जा रहे हैं। युवा ताबूत से बाहर निकलकर अपने अनुभव के वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर कर रहे हैं, जिससे इस ट्रेंड को और ज्यादा हवा मिल रही है।

एशियाई बाजार में बढ़ता डार्क टूरिज्म का नया इकोसिस्टम

डार्क टूरिज्म का यह विस्तार केवल चीन तक सीमित नहीं रहने वाला है। भारत, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में भी भूतिया किलों, प्राचीन युद्ध स्थलों और रूहानी टूर का बाजार लगातार बढ़ रहा है। आधुनिक पीढ़ी पारंपरिक पर्यटन स्थलों पर केवल आराम करने के बजाय कुछ ऐसा महसूस करना चाहती है जो उन्हें उनकी आरामदेह सीमाओं से बाहर धकेल दे।

चीन का यह 'डेथ सिमुलेटर' मॉडल यह साबित करता है कि आज का उपभोक्ता भौतिक सुख-सुविधाओं से आगे बढ़कर गहरे, अस्तित्वगत अनुभवों (Existential Experiences) की तलाश में है। लोग उस सच्चाई से रूबरू होने के लिए भुगतान कर रहे हैं जिससे इंसान सदियों से भागता आया है—यानी मौत। ताबूत का यह ठंडा सफर आधुनिक इंसान को यह याद दिलाने का एक अजीब लेकिन असरदार जरिया बन गया है कि जब तक सांसें चल रही हैं, जिंदगी को पूरी शिद्दत से जीना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।