ट्रंप बोले- ईरान से बातचीत का कोई इरादा नहीं, तेहरान का पलटवार- 'अमेरिका शर्तों के लिए गिड़गिड़ा रहा'; होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव चरम पर
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक खींचतान एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर दो टूक घोषणा करते हुए कहा है कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ किसी भी तरह की बातचीत या द्विपक्षीय वार्ता न तो चल रही है और न ही भविष्य के लिए कोई योजना तय है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी पूरी सख्ती के साथ लागू है।
इसके ठीक विपरीत, तेहरान ने बेहद आक्रामक तेवर अपनाते हुए वाशिंगटन के रुख की धज्जियां उड़ा दी हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर दावा किया कि जंग के जरिए ईरान को झुकाने में पूरी तरह विफल रहने के बाद अब अमेरिका खुद अपनी शर्तों के बजाय तेहरान के नियमों पर बातचीत की मेज पर आने के लिए 'गिड़गिड़ा' रहा है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व से आए इन तीखे बयानों के बाद सामरिक रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में युद्ध जैसे हालात गहरा गए हैं।
ट्रंप का दावा बनाम जमीनी हकीकत: होर्मुज पर किसका नियंत्रण?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से खुला और सक्रिय है तथा समुद्री जलक्षेत्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय कर दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और नौवहन आंकड़ों से सामने आई जानकारी के अनुसार, इस जलमार्ग पर जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर के मुकाबले बेहद सीमित हो चुकी है।
व्यापारिक जहाजों के मालिक और अंतरराष्ट्रीय कार्गो ऑपरेटर जोखिम और संभावित हमलों के डर से इस रूट से परहेज कर रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया है कि जब तक अमेरिका जून 2026 में हुए अंतरिम समझौते के तहत अपनी सभी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं करता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता पूरी तरह सामान्य नहीं होने दिया जाएगा।
ईरान की प्रमुख मांगों में ईरानी बंदरगाहों से अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी तुरंत हटाना, तेल निर्यात पर लगे सभी प्रतिबंध समाप्त करना, विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को बिना शर्त जारी करना और सैन्य हमलों की धमकियों को पूरी तरह रोकना शामिल है।
60 दिनों का अंतरिम समझौता खत्म: कूटनीतिक रास्ते क्यों हुए बंद?
वाशिंगटन और तेहरान के बीच 17 जून को हुए एक सहमति पत्र (MoU) के तहत 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई थी, ताकि दोनों पक्ष स्थायी शांति समझौते और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों पर आम सहमति बना सकें। दोनों पक्षों के बीच विवादों का दायरा घटने के बजाय और बढ़ गया। जब राष्ट्रपति ट्रंप से इस अस्थाई समझौते को आगे बढ़ाने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में किसी भी तरह के विस्तार से इनकार कर दिया।
ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने कहा कि जून के समझौते में 13 शर्तें ईरान के हित में थीं और केवल एक अमेरिका के पक्ष में थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल और वाशिंगटन के कुछ गुटों ने जानबूझकर इस कूटनीतिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने का काम किया। तेहरान ने चेतावनी दी है कि कूटनीतिक ठहराव के कारण उसकी सेना अब 'पूरी तरह से आक्रामक' (Fully Offensive) रणनीति अपनाने की तैयारी में है, जिसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ सकता है।
ओमान और यूएई पर असर: खाड़ी देशों में बढ़ता भू-राजनीतिक टकराव
होर्मुज के संकट को सुलझाने के लिए ओमान और कतर जैसे क्षेत्रीय मध्यस्थ दोनों पक्षों के बीच एक नया ट्रांजिट मैकेनिज्म तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। इस पहल पर भी ट्रंप प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। ट्रंप ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि अगर ओमान अमेरिकी नाकेबंदी के बीच आया या अनधिकृत समझौतों को बढ़ावा दिया तो अमेरिका सख्त कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।
इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दावा किया है कि समुद्री यातायात को निशाना बनाकर दागी गई ईरानी मिसाइलों में से एक उसके जलक्षेत्र के नजदीक गिरी। हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे क्षेत्रीय सद्भाव बिगाड़ने वाला प्रोपेगैंडा करार दिया। एहतियात के तौर पर यूएई ने ईरान के साथ अपनी वाणिज्यिक और वित्तीय गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोक दिया है, जिससे अरब जगत और फारस की खाड़ी के बीच आर्थिक दूरी और बढ़ गई है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) गुजरती है। इस संकरे समुद्री गलियारे में सैन्य टकराव और नाकेबंदी की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। वैश्विक बाजारों में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतों में तत्काल तेजी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा यह गतिरोध जल्द नहीं थमा, तो आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इसका सीधा असर भारत सहित तेल का आयात करने वाले सभी विकासशील और विकसित देशों की महंगाई दर, लॉजिस्टिक्स लागत और मुद्रा पर पड़ेगा। फिलहाल कूटनीतिक रास्ते बंद नजर आ रहे हैं और दोनों देशों की हठधर्मिता ने दुनिया को एक बड़े आर्थिक व सैन्य संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।