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August 26 2026 05:32 am

पैदा होते ही क्यों रोता है नवजात शिशु? गरुड़ पुराण में छुपा है पूर्व जन्मों के कर्मों और 'वैष्णवी माया' का सबसे बड़ा रहस्य

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संसार में जब भी कोई नया जीवन आंखें खोलता है, तो उसकी पहली अभिव्यक्ति एक तीखी चीख और रोने की आवाज होती है। मातृत्व और चिकित्सा जगत में नवजात शिशु के इस पहले रोने को उसके जीवित होने, फेफड़ों के सक्रिय होने और पूर्णतः स्वस्थ होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। यदि जन्म के तुरंत बाद बच्चा न रोए, तो डॉक्टरों से लेकर परिजन तक भारी चिंता में पड़ जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी विचार किया है कि दुनिया के हर कोने में जन्म लेने वाला प्रत्येक मानव शिशु हंसने या शांत रहने के बजाय रोते हुए ही इस नश्वर संसार में प्रवेश क्यों करता है? सनातन धर्म के 18 महापुराणों में से एक 'गरुड़ पुराण' में इस घटना के पीछे का अत्यंत सूक्ष्म, दार्शनिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला आध्यात्मिक रहस्य विस्तार से उद्घाटित किया गया है।

गर्भ में जीवात्मा की स्थिति और पूर्व जन्मों का स्मरण

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प और धर्मकांड में मानव शरीर की उत्पत्ति और गर्भ में जीव की स्थिति का बहुत बारीक मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक विश्लेषण मिलता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब कोई जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार माता के गर्भ में प्रवेश करती है, तो प्रारंभिक महीनों में वह केवल एक पिंड स्वरूप होती है। लेकिन जैसे-जैसे गर्भ में भ्रूण का विकास होता है और पांचवें से सातवें महीने में चेतना का विस्तार होता है, जीवात्मा को अपने पिछले सैकड़ों और हजारों जन्मों के कर्मों का पूर्ण ज्ञान हो जाता है।

शास्त्रों में वर्णन है कि माता के गर्भ का वातावरण जीवात्मा के लिए अत्यंत संकीर्ण, अंधकारमय और कष्टकारी होता है। माता द्वारा ग्रहण किए जाने वाले कड़वे, तीखे, अत्यधिक गर्म या ठंडे आहार के रसों से गर्भस्थ शिशु का कोमल शरीर निरंतर झुलसता रहता है। इसके साथ ही, वह अपने ही मलमूत्र और गर्भनाल के बीच बंधा हुआ एक घोर कारागार जैसी यातना भोगता है। इस असहनीय पीड़ा के दौरान पूर्व जन्मों की यादें उसके सामने एक चलचित्र की तरह घूमती हैं, जिससे उसे यह अहसास होता है कि उसने पिछले जन्मों में सांसारिक मोह-माया में पड़कर केवल व्यर्थ के पाप और पुण्य बटोरे, लेकिन आत्म-कल्याण के लिए कोई यत्न नहीं किया।

भगवान से की गई मुक्ति की प्रतिज्ञा और गर्भ स्तुति

गरुड़ पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण के तीसरे स्कंध में भगवान कपिल और माता देवहूति के संवाद में उल्लेख आता है कि गर्भ में असहनीय कष्ट भोग रहा जीव दोनों हाथ जोड़कर परमपिता परमेश्वर से निरंतर करुण प्रार्थना करता है। वह ईश्वर से गुहार लगाता है कि 'हे दीनानाथ! मुझे इस अंधकारमय नर्क रूपी गर्भ से बाहर निकालिए। इस बार मैं सांसारिक प्रपंचों में नहीं फंसूंगा। जन्म लेते ही केवल आपका भजन करूंगा, सत्कर्म करूंगा और अपने जीवन को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करूंगा।'

जीवात्मा गर्भ के भीतर ईश्वर से यह अटूट प्रतिज्ञा करती है कि वह सांसारिक वासनाओं से मुक्त रहकर केवल परमात्मा के ध्यान में लीन रहेगी। ईश्वर उसकी इस प्रार्थना को स्वीकार कर उसे जन्म का अवसर प्रदान करते हैं।

प्रसूति वायु का आघात और 'वैष्णवी माया' का प्रभाव

जब प्रसव का समय निकट आता है, तो आयुर्वेद और गरुड़ पुराण में वर्णित 'प्रसूति वायु' (तीव्र जैविक दबाव) सक्रिय होती है। यह वायु शिशु को सिर के बल नीचे की ओर धकेलती है। योनि मार्ग से बाहर आते समय शिशु को ऐसी तीव्र पीड़ा का अनुभव होता है जैसे सैकड़ों बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो।

जैसे ही शिशु माता के गर्भ से निकलकर इस बाह्य जगत की खुली हवा में सांस लेता है, उसी क्षण भगवान विष्णु की अमोघ शक्ति 'वैष्णवी माया' उस पर अपना पर्दा डाल देती है। इस माया के स्पर्श मात्र से नवजात शिशु अपने पूर्व जन्मों का सारा ज्ञान, ईश्वर से की गई प्रतिज्ञा और आध्यात्मिक चेतना को एक पल में भूल जाता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि अपनी पवित्र चेतना के अचानक छिन जाने, ईश्वर से वियोग होने और पुनः माया के बंधनों में जकड़े जाने के आंतरिक आघात से त्रस्त होकर जीवात्मा चीत्कार कर उठती है।

'कोऽहम्' का रुदन: आत्मा का सनातन प्रश्न

वेदांत दर्शन और उपनिषदों में शिशु के रोने की ध्वनि को 'कोऽहम्... कोऽहम्...' माना गया है। संस्कृत में 'कोऽहम्' का अर्थ होता है—'मैं कौन हूँ?'

गर्भ में जब तक जीवात्मा थी, उसे अपने मूल स्वरूप (सोऽहम्—वह ब्रह्म मैं ही हूँ) का ज्ञान था। लेकिन सांसारिक माया के आवरण में आते ही वह अपनी पहचान खो बैठती है और विस्मृति के अंधकार में गिर जाती है। इसी अज्ञान और विस्मृति के कारण नवजात शिशु जोर-जोर से रोकर मानो प्रकृति से प्रश्न करता है कि वह कौन है और किस लोक में आ गिरा है। बाद में जब माता उसे अपनी छाती से लगाती है और दूध पिलाती है, तो वह धीरे-धीरे इस संसार के नए मोह-पाश में बंधने लगता है।

श्रीमद्भागवत और आयुर्वेद का संयुक्त दृष्टिकोण

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, गर्भवास का दुख मृत्यु के दुख से भी अधिक भयानक होता है। जब जीव गर्भ से बाहर आता है, तो वह पराधीन हो जाता है। वह न तो अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकता है और न ही अपनी इच्छा से हिल-डुल सकता है। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी या किसी कीट के काटने पर भी वह केवल रोकर ही अपनी लाचारी प्रकट कर पाता है।

प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ 'चरक संहिता' और 'सुश्रुत संहिता' में भी शिशु के पहले रोने को 'प्राण-प्रत्यागमन' यानी प्राण वायु के शरीर में स्थापित होने की अनिवार्य क्रिया माना गया है। आचार्यों का मत है कि रोने की यह स्वाभाविक क्रिया हृदय और फुफ्फुस (फेफड़ों) को सक्रिय करने वाली प्राकृतिक चिकित्सा है।

चिकित्सा विज्ञान का क्या है आधुनिक तर्क?

धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के समानांतर यदि आधुनिक मेडिकल साइंस (Neonatology) के दृष्टिकोण को देखा जाए, तो विज्ञान भी जन्म के तुरंत बाद रोने को नवजात के अस्तित्व के लिए सबसे जरूरी शारीरिक घटना मानता है:

फेफड़ों का विस्तार: गर्भावस्था के 9 महीनों के दौरान शिशु माता के प्लेसेंटा (गर्भनाल) के माध्यम से ऑक्सीजन प्राप्त करता है। उस समय उसके फेफड़े निष्क्रिय रहते हैं और उनमें एमनियोटिक द्रव भरा होता है।

पहला स्वतंत्र श्वसन: जन्म के बाद जैसे ही गर्भनाल काटी जाती है, शिशु का बाहरी दुनिया से रक्त संपर्क टूट जाता है। जीवित रहने के लिए उसे खुद सांस लेनी होती है।

द्रव का बाहर निकलना: जब बच्चा रोने के लिए पहली गहरी सांस खींचता है, तो उसके फेफड़ों की सूक्ष्म वायुकोशिकाएं (Alveoli) खुल जाती हैं और फेफड़ों में भरा सारा तरल पदार्थ बाहर निकल जाता है।

परिवेश का झटका (Sensory Shock): गर्भ का तापमान हमेशा 37 डिग्री सेल्सियस के आसपास बिल्कुल सुरक्षित और गर्म होता है। बाहर आते ही शिशु को ठंडी हवा, तेज रोशनी और अजनबी स्पर्श का सामना करना पड़ता है। यह थर्मल और सेंसरी शॉक बच्चे की तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को उत्तेजित करता है, जिससे वह स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में रो पड़ता है।

अध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत सामंजस्य

प्राचीन गरुड़ पुराण का आध्यात्मिक विश्लेषण और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का शारीरिक तर्क—दोनों एक ही सत्य के दो पहलू नजर आते हैं। विज्ञान जहां शरीर के भौतिक तंत्र, ऑक्सीजन के प्रवाह और फेफड़ों के खुलने को रोने का कारण बताता है, वहीं गरुड़ पुराण चेतना के स्तर पर जाकर यह समझाता है कि जन्म लेना आत्मा के लिए कितना बड़ा संघर्ष और रूपांतरण है।

यह सनातन रहस्य हमें यह संदेश देता है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और अनमोल है। गर्भ की घोर यातनाएं सहकर और ईश्वर से मुक्ति की प्रतिज्ञा लेकर इस संसार में आने वाली जीवात्मा यदि पुनः सांसारिक विकारों और अधर्म में अपना समय गंवा देती है, तो वह अपने जन्म के मूल उद्देश्य से भटक जाती है। शिशु का पहला रुदन हर मनुष्य को यह मौन चेतावनी देता है कि इस नश्वर संसार में आकर अपने आत्म-कल्याण और ईश्वर से किए गए वादे को कभी नहीं भूलना चाहिए।