सावन पुत्रदा एकादशी 23 अगस्त: संतान सुख और समृद्धि के लिए भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पारण का सही समय
सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'श्रावण पुत्रदा एकादशी' या 'पवित्रा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित यह पावन तिथि संतान सुख की अभिलाषा रखने वाले दंपतियों के साथ-साथ परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। सावन का महीना होने के कारण इस दिन श्रीहरि विष्णु के साथ-साथ देवाधिदेव महादेव की पूजा का भी अद्भुत संयोग बनता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक पूरी श्रद्धा, संयम और विधिवत नियमों के साथ सावन पुत्रदा एकादशी का उपवास रखते हैं, उन्हें वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है और जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। हालांकि, शास्त्रों में एकादशी व्रत से जुड़े कई कड़े नियम बताए गए हैं। यदि अनजाने में भी इन नियमों की अनदेखी हो जाए, तो व्रत खंडित हो सकता है और उसका शुभ फल प्राप्त नहीं होता।
सावन पुत्रदा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि विस्तार
पंचांग गणना के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 22 अगस्त की दोपहर से होकर 23 अगस्त की दोपहर तक रहेगा। सनातन परंपरा में उदयातिथि का विशेष महत्व होने के कारण सावन पुत्रदा एकादशी का पावन व्रत 23 अगस्त को ही रखा जाएगा।
एकादशी तिथि का शुभारंभ: 22 अगस्त
एकादशी तिथि का समापन: 23 अगस्त
उदयातिथि मान: 23 अगस्त (पूरे दिन व्रत का मान)
व्रत पारण का शुभ समय: 24 अगस्त को सुबह सूर्योदय के पश्चात द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व
विशेष रूप से काशी, प्रयागराज, हरिद्वार, मथुरा और अयोध्या जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर इस दिन श्रद्धालु प्रातःकाल पवित्र नदियों में स्नान कर भगवान विष्णु और भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
सावन पुत्रदा एकादशी पर भूलकर भी न करें ये 5 बड़ी गलतियां
एकादशी व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म की शुद्धि का संकल्प है। ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन निम्नलिखित 5 गलतियों से प्रत्येक व्यक्ति को, विशेषकर व्रती को पूर्णतः बचना चाहिए:
1. चावल और अन्न का सेवन करना पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि एकादशी के दिन चावल खाने से महर्षि मेधा के अंग खाने का पाप लगता है और व्यक्ति का अगला जन्म रेंगने वाले जीवों में होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एकादशी के दिन जल तत्व का संतुलन बनाए रखने के लिए चावल जैसे भारी अन्न का त्याग करना उचित माना जाता है। न केवल व्रती, बल्कि घर के अन्य सदस्यों को भी इस दिन सात्विक आहार ही लेना चाहिए।
2. एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है और तुलसी दल के बिना श्रीहरि का भोग अधूरा माना जाता है। किंतु एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पौधे से पत्ते तोड़ना महापाप माना गया है। ऐसी मान्यता है कि माता तुलसी स्वयं इस दिन भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी के पत्ते एकादशी से एक दिन पहले यानी दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेने चाहिए। एकादशी के दिन केवल तुलसी जी के समक्ष घी का दीपक जलाकर उनकी परिक्रमा करनी चाहिए।
3. तामसिक आहार, मद्यपान और अनैतिक आचरण एकादशी का दिन पूर्ण संयम और आत्मनियंत्रण का पर्व है। इस पावन दिन पर प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बासी भोजन और नशीले पदार्थों का सेवन घर में दरिद्रता और नकारात्मकता लाता है। इसके अलावा, इस दिन किसी के प्रति मन में कटु विचार लाना, अपशब्द बोलना, झूठ बोलना, परनिंदा करना, क्रोध करना या किसी असहाय का अपमान करना व्रत के संपूर्ण फल को शून्य कर देता है। ब्रह्मचर्य का पालन करना इस व्रत का अनिवार्य नियम है।
4. भगवान विष्णु की पूजा में अक्षत (साबुत चावल) का प्रयोग पूजा-पाठ में अक्षत का प्रयोग सामान्य रूप से शुभ माना जाता है, परंतु एकादशी के दिन भगवान विष्णु और उनके विग्रहों पर साबुत अक्षत नहीं चढ़ाना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा में अक्षत के स्थान पर सफेद तिल या पीले फूलों का उपयोग करना शास्त्रों के अनुसार सर्वोत्तम माना गया है। साथ ही, पूजा के दौरान काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र धारण करने से बचें; पीले, नारंगी या श्वेत वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
5. व्रत के पारण समय की अनदेखी करना एकादशी व्रत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका पारण (व्रत खोलना) होता है। यदि एकादशी का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में निश्चित समय सीमा के भीतर न किया जाए, तो व्रत अधूरा माना जाता है। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले और सूर्योदय के बाद पारण करना अनिवार्य होता है। पारण के समय सबसे पहले ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान करें, इसके बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत संपन्न करें।
पुत्रदा एकादशी की प्रामाणिक और सरल पूजा विधि
संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की सफाई करें। इसके बाद नित्यकर्म से निवृत्त होकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
घर के ईशान कोण या पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित कर उस पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या शालिग्राम जी को स्थापित करें। इसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से भगवान का अभिषेक करें। श्रीहरि को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले पुष्प, मौसमी फल, पंजीरी और पंचामृत का भोग अर्पित करें। ध्यान रहे कि भोग में पूर्व संचित तुलसी दल अवश्य सम्मिलित हो।
पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। विष्णु सहस्रनाम या गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करना विशेष रूप से संतान गोपाल मंत्र का जप करना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। अंत में घी के दीपक और कपूर से भगवान की आरती उतारें और परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद वितरित करें।
सावन पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा का सार
पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, द्वापर युग में भद्रावती नगर के धर्मात्मा राजा सुकेतुमान और उनकी पत्नी चंपावती के कोई संतान नहीं थी। संतानहीन होने के कारण राजा और रानी अत्यंत दुखी रहते थे और पितरों के तर्पण को लेकर चिंतित रहते थे।
एक दिन राजा वन में चले गए, जहां उन्हें सरोवर तट पर तपस्या कर रहे महर्षियों के दर्शन हुए। राजा ने मुनियों को अपनी व्यथा सुनाई। तब ऋषियों ने राजा को सावन मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का विधिवत व्रत रखने का निर्देश दिया। राजा ने महल लौटकर रानी के साथ पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों को दान देकर पारण किया। व्रत के प्रभाव से उन्हें एक तेजस्वी और धर्मनिष्ठ पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसने आगे चलकर अपने कुल का नाम रोशन किया। तभी से इस एकादशी का नाम 'पुत्रदा एकादशी' पड़ा।
तीर्थ क्षेत्रों में विशेष अनुष्ठान और सामाजिक महत्व
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत पूरे देश में इस दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व देखा जाता है। वाराणसी के गंगा घाटों, हरिद्वार के हर की पौड़ी और उज्जैन की शिप्रा नदी के तट पर लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। मंदिरों में भजन-कीर्तन और अखंड रामायण पाठ का आयोजन होता है। रात्रि के समय जागरण करना और भगवान के नामों का संकीर्तन करना इस व्रत के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।
सावन पुत्रदा एकादशी न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि साधक को संयमित जीवनशैली और नैतिक मूल्यों की ओर भी अग्रसर करती है। यदि पूरी निष्ठा, नियमों की मर्यादा और सात्विक भाव से यह व्रत रखा जाए, तो संतान संबंधी सभी कष्ट दूर होते हैं और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।