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August 26 2026 04:31 am

'ईरान युद्ध से तंग आए अमेरिकी...' डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में ऐतिहासिक गिरावट, अप्रूवल रेटिंग गिरकर 33% के रिकॉर्ड निचले स्तर पर

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संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को छह महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वैश्विक राजनीति और घरेलू मोर्चे पर उनकी मुश्किलें लगातार विकराल रूप लेती जा रही हैं। ईरान के साथ शुरू हुए सैन्य टकराव और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिकी जनता का भरोसा राष्ट्रपति की नीतियों से तेजी से डगमगा रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित सर्वे एजेंसी रॉयटर्स/इप्सॉस (Reuters/Ipsos) द्वारा किए गए ताजा राष्ट्रव्यापी जनमत सर्वेक्षण ने व्हाइट हाउस और रिपब्लिकन पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। सर्वे के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की समग्र राष्ट्रपति अप्रूवल रेटिंग गिरकर महज 33 प्रतिशत पर आ गई है, जो उनके राजनीतिक जीवन और दोनों कार्यकालों में दर्ज की गई सबसे निचली रेटिंग्स में से एक है। इस तेज गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख वजह ईरान के खिलाफ जारी युद्ध को लेकर अमेरिकी नागरिकों में पनपता भारी असंतोष और देश के भीतर बढ़ती आर्थिक तंगी है।

महज 31% अमेरिकी युद्ध के समर्थन में: सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

चार दिनों तक पूरे अमेरिका में 1,215 से अधिक वयस्क नागरिकों पर किए गए इस विस्तृत सर्वे ने साफ कर दिया है कि आम अमेरिकी अब किसी भी नए विदेशी युद्ध में अपने देश की भागीदारी के पूरी तरह खिलाफ हैं। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, केवल 31 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही ईरान के खिलाफ चल रही अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं। यह आंकड़ा मार्च के महीने में दर्ज किए गए 37 प्रतिशत और महीने की शुरुआत में रहे 34 प्रतिशत से भी काफी नीचे फिसल गया है। सबसे बड़ा झटका ट्रंप को अपनी ही पार्टी के कोर वोट बैंक से लगा है। रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच ईरान युद्ध का समर्थन मार्च के 77 प्रतिशत से घटकर अब 69 प्रतिशत पर आ गया है। इसके अलावा, लगभग 83 प्रतिशत अमेरिकियों का मानना है कि यह संघर्ष जल्द खत्म होने वाला नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले 'अंतहीन युद्ध' (Endless War) में तब्दील हो चुका है।

'अमेरिका फर्स्ट' के वादों और जमीनी हकीकत के बीच गहरा विरोधाभास

डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी मतदाताओं से यह वादा किया था कि वे 'अमेरिका फर्स्ट' नीति पर चलेंगे, देश को विदेशी युद्धों से दूर रखेंगे और बाइडन प्रशासन के दौरान बढ़ी महंगाई को पूरी तरह नियंत्रित करेंगे। हालांकि, 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू हुई व्यापक सैन्य कार्रवाइयों के बाद हालात पूरी तरह उलट नजर आ रहे हैं। छह महीने बीत जाने के बाद भी न तो ईरान का परमाणु संकट पूरी तरह शांत हुआ है और न ही खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता लौट पाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जो मतदाता ट्रंप को एक 'शांतिप्रिय और गैर-हस्तक्षेपवादी' नेता मानकर वोट दे रहे थे, वे अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। विदेशी मामलों में आक्रामकता और घरेलू स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता ने ट्रंप की राजनीतिक साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पेट्रोल-डीजल की बेलगाम कीमतें और अमेरिकी परिवारों पर आर्थिक बोझ

युद्ध का सबसे सीधा और विनाशकारी असर आम अमेरिकी की जेब पर पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और तेल निर्यात में आई रुकावटों के चलते अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मची हुई है। अमेरिका के घरेलू बाजारों में गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतें युद्ध शुरू होने से पहले की तुलना में एक डॉलर प्रति गैलन से भी अधिक बढ़ चुकी हैं। आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई महंगी होने से खाद्य और दैनिक उपभोक्ता सामानों की कीमतों में दोबारा उछाल देखने को मिल रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स और अन्य आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, 53 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी नागरिकों का मानना है कि उनकी आर्थिक स्थिति पहले से बदतर हुई है। मुद्रास्फीति पर काबू पाने के व्हाइट हाउस के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं, जिससे मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों में गहरा आक्रोश है।

आगामी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों पर मंडराया संकट, रिपब्लिकन पार्टी में खलबली

अप्रूवल रेटिंग में आई इस ऐतिहासिक गिरावट ने आगामी नवंबर के मध्यावधि (Midterm) चुनावों को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के रणनीतिकारों के माथे पर पसीना ला दिया है। कांग्रेस (संसद) के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी के पास बहुत मामूली बहुमत है, जिसे बचाना अब बेहद चुनौतीपूर्ण दिख रहा है। सर्वे में जब स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं से पूछा गया कि यदि आज चुनाव होते हैं तो वे किसे वोट देंगे, तो 33 प्रतिशत ने डेमोक्रेटिक पार्टी का पक्ष लिया, जबकि केवल 19 प्रतिशत ने रिपब्लिकन के समर्थन की बात कही। पेंसिल्वेनिया, मिशिगन और विस्कॉन्सिन जैसे प्रमुख 'स्विंग स्टेट्स' में भी ट्रंप की रेटिंग नकारात्मक दायरे में पहुंच चुकी है। उपनगरीय इलाकों की महिलाएं और युवा मतदाता, जो चुनाव के नतीजे तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, युद्ध और महंगाई के मुद्दे पर खुले तौर पर प्रशासन के खिलाफ नजर आ रहे हैं।

घर के भीतर असंतोष और अंतहीन युद्ध का खौफ

अमेरिका का आधुनिक इतिहास गवाह रहा है कि जब भी कोई राष्ट्रपति वियतनाम, इराक या अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों में उलझा है, तो उसकी घरेलू लोकप्रियता पूरी तरह ध्वस्त हो गई। अमेरिकी जनता अब एक और दशक लंबे संघर्ष में अपने सैनिकों और टैक्सपेयर्स के खरबों डॉलर झोंकने के मूड में नहीं है। 45 वर्ष से कम उम्र के युवा रूढ़िवादी और लिबर्टेरियन वर्ग, जो ट्रंप के राष्ट्रवादी नारों से प्रभावित होकर उनके साथ जुड़ा था, अब उनसे दूर छिटकता दिख रहा है। युवाओं का मानना है कि राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग देश के बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर होना चाहिए, न कि हजारों मील दूर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों में बमबारी करने पर।

वैश्विक कूटनीति, प्रतिबंध और व्हाइट हाउस के सामने कड़ी अग्निपरीक्षा

व्हाइट हाउस ने हाल ही में ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' के तहत नए प्रतिबंधों की घोषणा की है, लेकिन ये प्रशासनिक कदम भी जनता के असंतोष को शांत करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ उन्हें मध्य पूर्व में अपनी सैन्य साख और रणनीतिक हितों की रक्षा करनी है, तो दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर गिरती लोकप्रियता और आर्थिक मंदी के खतरे से निपटना है। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप अपनी नीतियों में कोई बड़ा बदलाव करते हुए कूटनीतिक समझौते का रास्ता चुनते हैं, या फिर यह युद्ध उनकी राजनीतिक विरासत और सत्ता पर पकड़ को और कमजोर कर देगा।