मृत्यु के समय मनुष्य के साथ क्या होता है? गरुड़ पुराण के अनुसार जानिए प्राण त्यागने का पूरा सच और कर्मों का हिसाब
सनातन धर्म और गरुड़ पुराण में जीवन और मृत्यु को लेकर कई गहरे रहस्यों का उल्लेख किया गया है। मृत्यु एक ऐसा अकाट्य सत्य है, जिससे इस धरती पर जन्म लेने वाले हर जीव को रूबरू होना पड़ता है। इंसान जीवनभर तमाम तरह के अच्छे और बुरे कार्य करता है, जो अंततः उसके कर्मों का निर्धारण करते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति जीवनभर पुण्य और भलाई के कार्य करता है, उसे मृत्यु के बाद सद्गति और स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जबकि पापी और बुरे कर्म करने वाले जीवों को नरक की यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु का अंतिम समय आता है, तो उसके शरीर और आत्मा के साथ असल में क्या गुजरती है?
मृत्यु के समय सबसे पहले क्या होता है?
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु का समय नजदीक आता है, तो वह अपने परिजनों के मोह, स्नेह और संसार की आसक्ति के कारण अत्यधिक दुखी होता हुआ शरीर का त्याग करता है। उस दौरान उसका चेतन शरीर पूरी तरह सुन्न और जड़ के समान बेजान हो जाता है। धीरे-धीरे जब मृतक के प्राण कंठ (गले) में आकर अटक जाते हैं, तो उसे एक खास दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।
इस अलौकिक दृष्टि के जरिए वह अपने जीवन में किए गए सभी छोटे-बड़े अच्छे और बुरे कर्मों को एक चलचित्र (मूवी) की तरह एक साथ देख लेता है। हालांकि, इस स्थिति में होने के कारण वह चाहकर भी कुछ बोल पाने में असमर्थ होता है।
सौ बिच्छुओं के डंक जैसी असहनीय पीड़ा
प्राण-वायु जब अपने स्थान से छूटने लगती है, तो यमदूतों के भय से आत्मा कांप उठती है। उस आखिरी क्षण में व्यक्ति को एक पल भी कई वर्षों के समान बहुत लंबा प्रतीत होता है। गरुड़ पुराण में प्राण निकलते वक्त होने वाली इस शारीरिक और मानसिक पीड़ा की तुलना 'सौ बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने' जितनी भयंकर पीड़ा से की गई है।
मान्यता के अनुसार, पापी मनुष्य के प्राण हमेशा गुदा मार्ग से और पुण्यत्मा या अच्छे कर्म करने वाले व्यक्ति के प्राण मुख (मुंह) मार्ग से बाहर निकलते हैं। प्राण त्यागने के बाद जीवात्मा अपनी आगे की यात्रा के लिए अगले पड़ाव की ओर बढ़ती है।
यमलोक की यात्रा और अंगूठे के बराबर शरीर
प्राण निकलने के तुरंत बाद जीव मोहवश एक बार अपने घर और परिवार की ओर देखता है, और फिर उसे अंगूठे के आकार (सूक्ष्म रूप) का दूसरा शरीर प्राप्त होता है। इसके बाद यमदूत उसके गले में पाश (रस्सी) बांधकर उसे उसी प्रकार खींचते हुए ले जाते हैं, जैसे किसी अपराधी को सिपाही पकड़कर ले जाते हैं।
मार्ग में यमदूत जीव को उसके द्वारा किए गए पापों और नरक की भयानक यातनाओं का भय दिखाते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई पुण्यात्मा होती है, तो उसे यमदूतों के बजाय स्वर्ग के पार्षद बड़े आदर और सुखपूर्वक अपने साथ ले जाते हैं।