क्या इथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से बढ़ रहे हैं चीनी के दाम? जानिए 'फूड वर्सेस फ्यूल' की बहस, गन्ने की डायवर्जन और चीनी उत्पादन के चौंकाने वाले आंकड़े
देश भर के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतें ₹48 से ₹50 प्रति किलो और महानगरों में ₹65 से ₹69 प्रति किलो के पार पहुंचने के बाद आम उपभोक्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं तक एक बड़ी बहस छिड़ गई है. सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या भारत सरकार के महत्वाकांक्षी इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP) और पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य के कारण घरेलू बाजार में चीनी की किल्लत हो रही है और कीमतें आसमान छू रही हैं? भारत ने पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य तय समय से पहले हासिल करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं, जिसके लिए हर साल गन्ने के रस (Sugarcane Juice), बी-हैवी शीरा (B-Heavy Molasses) और चीनी के बड़े हिस्से को फ्यूल इथेनॉल बनाने में डायवर्ट किया जा रहा है. आइए चीनी उत्पादन, घरेलू मांग, इन्वेंट्री और इथेनॉल डायवर्जन के वास्तविक आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि क्या वाकई चीनी की महंगाई का असली विलेन इथेनॉल है या इसके पीछे कुछ और बुनियादी कारक जिम्मेदार हैं।
इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन: क्या कहते हैं आंकड़े?
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सामान्य चीनी पेराई सत्र के दौरान लगभग 2.5 से 3.5 मिलियन टन (25 से 35 लाख टन) चीनी को इथेनॉल निर्माण के लिए डायवर्ट किया जाता है।
इथेनॉल सप्लाई में उछाल: पिछले एक दशक में गन्ने से बनने वाले इथेनॉल की आपूर्ति 40 करोड़ लीटर (वित्त वर्ष 2014) से बढ़कर लगभग 670 करोड़ लीटर (वित्त वर्ष 2024-2025) के पार पहुंच गई।
ब्लेंडिंग प्रतिशत का विस्तार: जहां 2014 में पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण महज 1.5% था, वहीं अब यह 15% से 20% के उच्च स्तर तक पहुंच चुका है।
मौजूदा सीजन का गणित: चालू चीनी सीजन में लगभग 28 से 29 लाख टन सुक्रोज/चीनी को सीधे इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
जब लगभग 30 लाख टन संभावित चीनी सीधे फैक्ट्री से फ्यूल टैंक की ओर चली जाती है, तो इसका सीधा असर खुले बाजार में आने वाली चीनी की कुल आपूर्ति पर पड़ता है।
घरेलू उत्पादन बनाम खपत: लगातार दूसरे साल उत्पादन में कमी
चीनी के दामों में आए उछाल की सबसे बड़ी और बुनियादी वजह केवल इथेनॉल डायवर्जन नहीं, बल्कि गन्ने की कुल फसल और चीनी उत्पादन में आई गिरावट है:
कुल चीनी उत्पादन (2025-26 अनुमान): लगभग 27.9 मिलियन टन (2.79 करोड़ टन)।
सालाना घरेलू खपत: लगभग 28.5 मिलियन टन (2.85 करोड़ टन)।
उत्पादन घाटा: घरेलू उत्पादन लगातार दूसरे साल घरेलू खपत से लगभग 6 लाख टन कम दर्ज किया गया है।
ओपनिंग और क्लोजिंग स्टॉक में गिरावट: 1 अक्टूबर 2025 को भारत के पास 4.7 मिलियन टन का शुरुआती स्टॉक (Opening Stock) था। लेकिन 28.5 मिलियन टन घरेलू खपत और पूर्व में हुए सीमित निर्यात के बाद 1 अक्टूबर 2026 तक देश का क्लोजिंग स्टॉक घटकर मात्र 3.3 से 3.5 मिलियन टन रह जाने का अनुमान है। यह पिछले कई वर्षों का सबसे निचला इन्वेंट्री स्तर माना जा रहा है।
मौसम, रेड-रॉट रोग और गन्ने की पैदावार पर असर
इथेनॉल मांग के साथ-साथ कृषि से जुड़ी समस्याओं ने स्थिति को और नाजुक बना दिया:
प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों—उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में अनियमित और कम बारिश के चलते प्रति हेक्टेयर गन्ने की रिकवरी और यील्ड प्रभावित हुई।
उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख गन्ना क्षेत्रों में 'रेड-रॉट' (Red-Rot) फंगल बीमारी के प्रकोप के कारण शुरुआती अनुमान (3.09 करोड़ टन) की तुलना में वास्तविक उत्पादन गिरकर 2.79 करोड़ टन पर आ गया।
केंद्र सरकार द्वारा गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) में बढ़ोतरी के बाद मिलों की उत्पादन लागत बढ़ी, जिसने एक्स-मिल और थोक कीमतों को ऊपर की ओर धकेला।
'फूड वर्सेस फ्यूल' का द्वंद्व और मिलों की बदलती रणनीति
वर्तमान में चीनी मिलों के लिए आर्थिक समीकरण भी बदल गए हैं। तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा इथेनॉल खरीद की दरें पिछले कुछ वर्षों से स्थिर बनी हुई हैं, जबकि खुले बाजार में चीनी के थोक भाव ₹4,400 से ₹4,800 प्रति क्विंटल तक चढ़ चुके हैं। इसके परिणामस्वरूप कई मिलों के लिए अब इथेनॉल बनाने के मुकाबले सीधे चीनी बनाकर बेचना अधिक मुनाफे का सौदा बन गया है। यदि चीनी के दाम इसी तरह ऊंचे बने रहते हैं, तो मिलें गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से इथेनॉल बनाना कम कर सकती हैं, जिससे इथेनॉल ब्लेंडिंग की रफ्तार धीमी हो सकती है।
संतुलन बनाने के लिए सरकार के कड़े नीतिगत कदम
खाद्य सुरक्षा और ईंधन सुरक्षा के बीच संतुलन साधने के लिए केंद्र सरकार ने कई तात्कालिक हस्तक्षेप किए हैं:
चीनी निर्यात पर प्रतिबंध: घरेलू उपलब्धता सुरक्षित रखने के लिए चीनी के व्यावसायिक निर्यात पर रोक जारी रखी गई है।
अनाज आधारित इथेनॉल को बढ़ावा: गन्ने पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार मक्का (Corn) और सरप्लस चावल (Broken/Surplus Rice) से इथेनॉल बनाने पर अधिक जोर दे रही है, ताकि गन्ने की चीनी खाद्य उपयोग के लिए बची रहे।
ड्यूटी-फ्री कच्ची चीनी आयात और स्टॉक लिमिट: त्योहारी सीजन में कृत्रिम कमी और जमाखोरी रोकने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी और व्यापारियों पर 15 दिन की सख्त स्टॉक लिमिट लागू की गई है।
निष्कर्ष: क्या केवल इथेनॉल ही जिम्मेदार है?
आंकड़ों का निष्पक्ष विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि इथेनॉल उत्पादन चीनी के दामों में बढ़ोतरी का एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन इसने आपूर्ति के संतुलन को संवेदनशील (Tight) जरूर बनाया है। लगभग 30 लाख टन चीनी का इथेनॉल में डायवर्जन और दूसरी तरफ खराब मौसम व बीमारी के कारण कुल गन्ने के उत्पादन में गिरावट—इन दोनों कारकों के एक साथ मिलने से बाजार में सप्लाई घटी और कीमतें बढ़ीं। सरकार द्वारा अनाज आधारित इथेनॉल को प्राथमिकता देने और आयात की अनुमति मिलने से आगामी महीनों में घरेलू चीनी की कीमतों में स्थिरता आने की पूरी उम्मीद है।