The 'Silent Killer' Toll of War: बारूद के धुएं से घुट रहा मध्य पूर्व का दम, जानें कैसे आपकी सांसों में जहर घोल रही है मिसाइलें?

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India News Live,Digital Desk : मध्य पूर्व में जारी ईरान-इजरायल युद्ध के बीच दुनिया केवल मलबे में तब्दील होते शहर और मौतों के आंकड़े देख रही है। लेकिन इस विनाश के पीछे एक 'साइलेंट किलर' भी है, जो आने वाली कई पीढ़ियों को बीमार करने वाला है। युद्ध केवल इंसानों को ही नहीं मारता, बल्कि धरती की हवा, पानी और मिट्टी पर भी ऐसे गहरे जख्म छोड़ता है जिन्हें भरने में दशकों लग जाते हैं। आइए जानते हैं कि बारूद और मिसाइलों का यह खेल हमारे पर्यावरण को किस कदर तबाह कर रहा है।

आसमान से बरसता जहर: हवा में घुलीं भारी धातुएं

मिसाइल और बम विस्फोट केवल आग नहीं लगाते, बल्कि वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का गुबार छोड़ते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन धमाकों से सीसा (Lead) और पारा (Mercury) जैसी भारी धातुएं सूक्ष्म कणों के रूप में हवा में मिल जाती हैं। जब ये कण बारिश के साथ जमीन पर गिरते हैं, तो 'काली बारिश' का रूप ले लेते हैं, जो फसलों और इंसानी फेफड़ों के लिए घातक है।

कार्बन उत्सर्जन का दैत्य: एक लड़ाकू विमान और हजारों कारें

सैन्य अभियान जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। एक लड़ाकू विमान का केवल एक मिशन उतना कार्बन उत्सर्जित करता है, जितना हजारों कारें मिलकर भी नहीं करतीं। टैंक, नौसैनिक जहाज और रसद पहुंचाने वाले ट्रक चौबीसों घंटे भारी मात्रा में ईंधन जला रहे हैं, जो सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) की रफ्तार को कई गुना बढ़ा रहा है।

मिट्टी और पानी पर 'केमिकल अटैक'

जब युद्ध के दौरान औद्योगिक क्षेत्रों या तेल के कुओं को निशाना बनाया जाता है, तो वहां से निकलने वाले रसायन सीधे नदियों और भूजल (Groundwater) में रिस जाते हैं। तेल समृद्ध क्षेत्रों में कुओं में लगी आग महीनों तक जलती रहती है, जिससे निकलने वाला काला धुआं सूरज की रोशनी तक को रोक देता है। भारी सैन्य वाहनों की आवाजाही उपजाऊ मिट्टी की संरचना को हमेशा के लिए बिगाड़ देती है, जिससे हरियाली वाली जमीन बंजर रेगिस्तान में बदल जाती है।

मलबे का पहाड़ और लुप्त होते वन्यजीव

संघर्ष समाप्त होने के बाद भी तबाही खत्म नहीं होती। शहरों के मलबे में एस्बेस्टस, घातक रसायन और विस्फोटक अवशेष होते हैं, जिनका सुरक्षित निपटान एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, बमबारी और जंगलों में लगी आग के कारण बेजुबान वन्यजीव या तो मारे जाते हैं या अपने प्राकृतिक आवास से विस्थापित होकर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

दशकों तक रहेगा असर: पारिस्थितिकी तंत्र की अपूरणीय क्षति

इमारतें और सड़कें फिर से बनाई जा सकती हैं, लेकिन प्रदूषित हो चुके जल स्रोतों और नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को ठीक होने में 50 से 100 साल तक का समय लग सकता है। मध्य पूर्व का यह संघर्ष आज की पीढ़ी के लिए तो काल बना ही है, लेकिन इसका पर्यावरणीय प्रभाव भविष्य की पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ेगा।