June 22 2026 07:49 pm

निर्जला एकादशी 25 जून को: रवि, शिव और सिद्ध योग के साथ बन रहा है गुरुवार का दुर्लभ संयोग

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भगवान विष्णु की साधना के लिए वर्ष का सबसे बड़ा और कठिन महाव्रत 'निर्जला एकादशी' इस साल 25 जून 2026 को रखा जाएगा। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए व्रत रखने का विधान है।

धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस एक एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा और नियम के साथ रख लेते हैं, उन्हें वर्ष भर की सभी 24 एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त हो जाता है। साल 2026 में इस व्रत का महत्व इसलिए भी कई गुना बढ़ गया है क्योंकि इस दिन तीन बेहद शुभ योगों के साथ-साथ भगवान विष्णु का प्रिय दिन यानी 'गुरुवार' पड़ रहा है।

तिथि और उदया तिथि की गणना: जानें कब से कब तक है एकादशी

पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून 2026 को रात 08:09 बजे से हो जाएगी। वहीं, इस तिथि का समापन 25 जून 2026 को रात 09:14 बजे होगा। शास्त्र सम्मत उदया तिथि की मान्यता के आधार पर, निर्जला एकादशी का मुख्य व्रत 25 जून को ही रखा जाएगा और इसी दिन श्रद्धालु निर्जल रहकर साधना करेंगे।

रवि, शिव और सिद्ध योग का महासंगम, गुरुवार ने बढ़ाया महत्व

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस साल निर्जला एकादशी पर रवि योग, शिव योग और सिद्ध योग का एक साथ निर्माण हो रहा है। इन मांगलिक योगों में की गई पूजा, मंत्र जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। इसके अतिरिक्त, गुरुवार का दिन भगवान हरि को अत्यंत प्रिय होने के कारण इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों पर श्री हरि और माता लक्ष्मी की विशेष अनुकंपा बरसेगी।

भद्रा का साया, लेकिन डरने की जरूरत नहीं!

25 जून को व्रत के दिन सुबह 07:08 बजे से भद्रा शुरू हो जाएगी, जो रात 08:09 बजे तक रहेगी। हालांकि, ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस भद्रा का निवास 'पाताल लोक' में रहेगा। शास्त्रों के नियम के मुताबिक, जब भद्रा पाताल लोक में होती है, तो पृथ्वी पर उसका कोई भी अशुभ या नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए श्रद्धालु बिना किसी संशय या चिंता के अपनी पूजा और मांगलिक कार्य संपन्न कर सकते हैं।

निर्जला एकादशी 2026: पूजा के सबसे उत्तम और शुभ मुहूर्त

इस पावन दिन पर भगवान विष्णु की आराधना के लिए निम्नलिखित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं:

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:05 बजे से सुबह 04:45 बजे तक (साधना और संकल्प के लिए सर्वोत्तम)

अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक (महापूजा और आरती के लिए श्रेष्ठ)

श्री हरि विष्णु और मां लक्ष्मी की सरल पूजा विधि

एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करें और पीले या साफ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।

घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।

भगवान को पीले फूल, मौसमी फल, पंचामृत और विशेष रूप से तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अर्पित करें (याद रखें एकादशी को तुलसी पत्र नहीं तोड़े जाते, एक दिन पहले के रखें)।

पूजा के दौरान "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" महामंत्र का यथाशक्ति जाप करें। इसके साथ ही विष्णु चालीसा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।

दिनभर प्रभु का स्मरण करें और शाम के समय दीपदान करें। अगले दिन शुभ समय पर दान-पुण्य करने के बाद ही व्रत का पारण (व्रत खोलना) करें।

ज्येष्ठ मास के इस महाव्रत में दान का अचूक महत्व

निर्जला एकादशी के दिन तपती गर्मी से राहत देने वाली वस्तुओं के दान का विशेष विधान है। इस दिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार राहगीरों के लिए ठंडे पानी या शरबत की व्यवस्था करते हैं। इसके अलावा मिट्टी का घड़ा (जल से भरा कलश), छाता, वस्त्र, जूता और मौसमी फलों (जैसे आम, तरबूज) का दान करने से घर में सुख, समृद्धि और स्थाई बरकत का वास होता है।