ना सरकार में कुर्सी, ना नितिन नवीन की नई टीम में जगह: धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय का क्या होगा? समझिए दोनों कद्दावर नेताओं का सियासी भविष्य और विकल्प
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा घोषित की गई नई केंद्रीय टीम के बाद पार्टी के अंदरूनी गलियारों में भारी मंथन और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इस नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जहां कई पुराने दिग्गजों की वापसी हुई है और कई रणनीतिकारों को बड़े राज्यों की कमान सौंपी गई है, वहीं दो सबसे बड़े कद्दावर नामों का इस सूची से पूरी तरह गायब होना सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा है। वे दो नाम हैं—ओडिशा से आने वाले पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) और बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय (Mangal Pandey)। दोनों ही नेता वर्तमान में न तो केंद्र या राज्य सरकार में किसी मंत्री पद पर हैं और न ही उन्हें पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम में कोई औपचारिक पदाधिकारी बनाया गया है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या दोनों नेताओं को किसी रणनीति के तहत फिलहाल फ्रेम से बाहर रखा गया है या पार्टी आने वाले समय में उनके लिए कोई बिल्कुल अलग और बड़ी भूमिका तैयार कर रही है।
धर्मेंद्र प्रधान: केंद्रीय कैबिनेट से विदाई के बाद संगठन में भी नहीं मिला पद
धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में सबसे भरोसेमंद और महत्वपूर्ण मंत्रालयों (जैसे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, कौशल विकास और शिक्षा मंत्रालय) का कार्यभार संभालते रहे हैं। ओडिशा की राजनीति में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने और जमीन पर मजबूत करने में उनकी भूमिका सर्वविदित रही है।
हाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो नीट (NEET) और पेपर लीक विवादों के बीच 25 जुलाई को उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया था। इसके बाद राजनीतिक हलकों में यह प्रबल संभावना जताई जा रही थी कि सरकार से बाहर निकलने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को राष्ट्रीय संगठन में महासचिव या उपाध्यक्ष जैसा कोई बड़ा दायित्व देकर उनकी सांगठनिक क्षमताओं का उपयोग किया जाएगा। लेकिन 17 अगस्त को घोषित भाजपा की 65 सदस्यीय राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने से सस्पेंस और गहरा गया है।
मंगल पांडेय: बिहार सरकार से ड्रॉप होने के बाद दिल्ली में भी बढ़ा इंतजार
बिहार की राजनीति में मंगल पांडेय भाजपा के सबसे अनुभवी ब्राह्मण चेहरों और संगठनात्मक रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय तक बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में कई वर्षों तक स्वास्थ्य मंत्री की अहम जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के समय वे पार्टी के राज्य प्रभारी भी रह चुके हैं।
बिहार में राजनीतिक समीकरण बदलने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद जब नई सरकार का गठन हुआ, तो मंगल पांडेय को मंत्रिमंडल की सूची से बाहर कर दिया गया। उस वक्त बिहार के राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा थी कि मंगल पांडेय को प्रदेश की राजनीति से निकालकर केंद्रीय संगठन में लाया जाएगा और राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन नितिन नवीन की टीम में उनका नाम न आने से उनके समर्थकों के बीच भी असमंजस की स्थिति बन गई है।
संगठन में न होने के बावजूद क्या हैं भविष्य के रास्ते?
भाजपा की कार्यप्रणाली को समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में नाम न होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि दोनों नेताओं को किनारे (Sideline) कर दिया गया है। भाजपा अक्सर नियमित राष्ट्रीय पदाधिकारियों (पार्टी प्रभारी) और चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने वाले 'चुनाव प्रभारियों' (Election In-charges) को अलग-अलग रखती है।
धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय के सामने मुख्य रूप से निम्नलिखित राजनीतिक विकल्प और संभावनाएं नजर आती हैं:
2027 के विधानसभा चुनावों में बतौर 'चुनाव प्रभारी' बड़ी जिम्मेदारी: साल 2027 में देश के सात महत्वपूर्ण राज्यों—उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात—में विधानसभा चुनाव होने हैं। धर्मेंद्र प्रधान को चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट और गठबंधन वार्ताओं का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। इससे पहले वे बिहार, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में पार्टी के चुनाव प्रभारी की भूमिका सफलतापूर्वक निभा चुके हैं। इसी तरह मंगल पांडेय के पास भी बंगाल और अन्य राज्यों में चुनाव प्रबंधन का लंबा अनुभव है। ऐसे में पूरी संभावना है कि पार्टी सीधे तौर पर इन चुनावी राज्यों में उन्हें चुनाव प्रभारी (Election In-charge) बनाकर मैदान में उतारे।
पार्टी की सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्थाओं में जगह: भाजपा के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) में अभी कुछ पद रिक्त हैं। हालांकि इसमें शामिल होने को लेकर कयास जरूर हैं, लेकिन वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें विशेष समितियों में रखा जा सकता है।
विशेष प्रोजेक्ट्स और राज्यों के समन्वय का जिम्मा: ओडिशा में पार्टी की सरकार बनने के बाद वहां की अंदरूनी नीतियों के समन्वय या दक्षिण भारत के राज्यों में संगठन विस्तार के लिए विशेष दूत (Special Emissary) के रूप में भी इनका इस्तेमाल हो सकता है।
'विवादों से फौरी दूरी या शांत रणनीति का हिस्सा?'
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के पीछे जो जनआंदोलन और पेपर लीक के मुद्दे थे, उन्हें देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने उन्हें कुछ समय के लिए 'लो-प्रोफाइल' (Low Profile) रखने का फैसला किया हो सकता है। राजनीति में इसे 'कूलिंग ऑफ पीरियड' कहा जाता है, जिसके बाद नेताओं को नई ऊर्जा के साथ नए मोर्चों पर सक्रिय किया जाता है।
वहीं मंगल पांडेय के मामले में, बिहार में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन को साधने के लिए नए चेहरों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में मंगल पांडेय के अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर किसी चुनावी राज्य में खपाना ही भाजपा के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति मानी जा रही है।
अनुभव को दरकिनार करना भाजपा के लिए आसान नहीं
धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय दोनों ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की नर्सरी से निकले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मजबूत पृष्ठभूमि वाले नेता हैं। दोनों ही नेताओं ने बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन की बारीकियों को जिया है।
भाजपा के लिए आगामी राज्यों के विधानसभा चुनाव अत्यंत चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। ऐसे में संगठन के इतने मंझे हुए रणनीतिकारों को लंबे समय तक निष्क्रिय रखना पार्टी के हित में नहीं होगा। आने वाले कुछ हफ्तों या महीनों में जब चुनावी राज्यों के लिए चुनाव समितियों और प्रभारियों का आधिकारिक ऐलान होगा, तब यह साफ हो जाएगा कि नितिन नवीन और केंद्रीय नेतृत्व ने इन दोनों नेताओं के लिए क्या नया रोल तय किया है।