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August 10 2026 03:45 pm

सावन शिवरात्रि पर जरूर पढ़ें यह पौराणिक व्रत कथा, पूजन से भी प्रसन्न हुए महादेव; जानें राजा चित्रभानु और शिकारी की वह अमर गाथा

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सावन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि यानी सावन शिवरात्रि का पावन पर्व देवाधिदेव महादेव की पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। सनातन संस्कृति में मान्यता है कि सावन शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की संपूर्ण विधि-विधान से पूजा करने, व्रत रखने और कथा सुनने से साधक के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं। सनातन धर्मग्रंथों और स्कंद पुराण के अनुसार, सावन शिवरात्रि का व्रत केवल जलाभिषेक या उपवास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन पवित्र मन से 'सावन शिवरात्रि व्रत कथा' (Sawan Shivratri Vrat Katha) का पाठ करना या श्रवण करना अनिवार्य माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस पावन कथा को सच्चे मन से पढ़ता या सुनता है, महादेव उसके जीवन की सभी बाधाओं को दूर कर उसे सुख, शांति और मोक्ष का वरदान प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की वह सबसे फलदायी और अमर पौराणिक व्रत कथा।

चित्रभानु और शिकारी की अमर गाथा: जब अनजाने में हुआ महादेव का पूजन

पौराणिक काल में इक्ष्वाकु वंश में राजा चित्रभानु शासन करते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त और जातिस्मरा (पूर्व जन्म की बातें याद रखने वाले) थे। एक बार सावन शिवरात्रि के दिन जब राजा चित्रभानु उपवास रखकर भगवान शिव का पूजन कर रहे थे, तब एक महान ऋषि ने उनसे उनके इस कठोर व्रत और पूर्वजन्म के रहस्य के बारे में पूछा। तब राजा चित्रभानु ने अपने पूर्व जन्म की वह गाथा सुनाई जो आज सावन शिवरात्रि की मुख्य व्रत कथा के रूप में जानी जाती है।

राजा चित्रभानु ने बताया कि अपने पूर्व जन्म में वे 'गुरुद्रुह' नाम के एक निषाद (शिकारी) थे। वह शिकारी अत्यंत क्रूर था और वन्य जीवों का शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उस पर बहुत से साहूकारों का कर्ज हो गया था। कर्ज न चुका पाने के कारण एक दिन एक साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोगवश वह दिन सावन मास की शिवरात्रि का ही दिन था। शिवमठ में दिनभर भगवान शिव के भजन, कीर्तन और शिवरात्रि व्रत कथा का पाठ होता रहा। शिकारी भूखा-प्यासा वहीं बैठा सब कुछ सुनता और देखता रहा। इस प्रकार अनजाने में ही उनसे शिवरात्रि के दिन का उपवास और कथा श्रवण का पुण्य प्राप्त हो गया।

बेलपत्र के वृक्ष पर रात का पहरा और चार प्रहर का अद्भुत पूजन

संध्या समय साहूकार ने शिकारी को चेतावनी देकर मुक्त कर दिया कि वह अगले दिन तक कर्ज की राशि चुका दे। शिकारी अपने परिवार के लिए भोजन का प्रबंध करने हेतु तुरंत जंगल की ओर निकल पड़ा। वह जंगल में एक जलाशय (तालाब) के किनारे स्थित बेलपत्र (बिल्व) के विशाल वृक्ष पर चढ़कर छिप गया और शिकार की प्रतीक्षा करने लगा। उसे आशा थी कि रात्रि में कोई पशु जल पीने आएगा और वह उसका शिकार कर सकेगा। उस बेलपत्र के पेड़ के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित था, जो सूखी पत्तियों से ढका हुआ होने के कारण शिकारी को दिखाई नहीं दे रहा था।

रात का पहला प्रहर बीता। शिकारी प्यास और भूख से व्याकुल था और शिकार की टोह में बेलपत्र के पत्तों को तोड़-तोड़कर नीचे फेंक रहा था। उसके ऐसा करने से अनजाने में ही जल की कुछ बूंदें और बेलपत्र नीचे ढके हुए शिवलिंग पर गिरते रहे। इस प्रकार प्रथम प्रहर में अनजाने ही शिकारी द्वारा महादेव का पहला पूजन संपन्न हो गया।

तभी जलाशय पर एक गर्भिणी हिरणी जल पीने आई। जैसे ही शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाया, हिरणी ने कातर स्वर में कहा, "हे शिकारी! मुझे मत मारो। मैं गर्भिणी हूँ और शीघ्र ही बच्चे को जन्म देने वाली हूँ। अपने बच्चे को जन्म देकर और उसे उसके पिता के सुपुर्द करके मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊंगी।" शिकारी को उस पर दया आ गई और उसने धनुष नीचा कर लिया। धनुष हिलाने और पत्ते तोड़ने से पुनः शिवलिंग पर बेलपत्र जा गिरे, जिससे दूसरे प्रहर का पूजन भी अनजाने में पूरा हो गया।

सत्यनिष्ठा और अहिंसा से द्रवित हुआ शिकारी का कठोर हृदय

कुछ समय पश्चात दूसरे प्रहर के अंत में एक और हिरणी अपनी बहन की खोज में वहां पहुंची। शिकारी ने पुनः बाण चढ़ाया। उस हिरणी ने भी विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की कि वह अपने प्रियतम से मिलकर शीघ्र ही लौट आएगी। शिकारी ने उस पर भी विश्वास कर उसे जाने दिया। इस प्रक्रिया में पुनः बेलपत्र और ओस की बूंदें शिवलिंग पर गिरीं, जिससे तीसरे प्रहर की पूजा संपन्न हो गई।

तीसरे प्रहर में एक विशाल मृग (हिरण) अपनी संगिनी की खोज में जलाशय पर आया। शिकारी ने जैसे ही बाण साधा, मृग ने कहा, "यदि तुमने मेरी पत्नियों और बच्चों को मार दिया है तो मुझे भी मार दो। और यदि वे जीवित हैं तो मुझे उनसे अंतिम बार मिलने दो, मैं स्वयं वापस आऊंगा।" मृग की सत्यनिष्ठा और परिवार के प्रति प्रेम देखकर शिकारी का हृदय पूरी तरह पिघल गया। उसने उस मृग को भी छोड़ दिया। चतुर्थ प्रहर में पुनः बेलपत्र और ओस की बूंदें शिवलिंग पर अर्पित हो गईं।

इस प्रकार जाने-अनजाने में शिकारी से सावन शिवरात्रि का पूरा उपवास, रात्रि जागरण, चार प्रहर की पूजा और शिवलिंग पर बेलपत्र तथा जल का अर्पण पूरा हो गया। निरंतर शिव पूजा के प्रभाव से और हिरण परिवार के सत्यनिष्ठ आचरण को देखकर शिकारी का हिंसक हृदय पूरी तरह से परिवर्तित हो गया। उसके मन से क्रूरता, पाप और हिंसा के भाव सदा के लिए समाप्त हो गए।

यमदूतों और शिवगणों का संवाद एवं महादेव का अभय वरदान

सुबह होते ही वह पूरा मृग परिवार अपने दिए वचन के अनुसार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया ताकि शिकारी उनका शिकार कर सके। जानवरों की ऐसी सत्यवादिता, त्याग और सत्यनिष्ठा देखकर शिकारी की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। उसने धनुष-बाण त्याग दिए और संकल्प लिया कि अब वह किसी भी जीव की हत्या नहीं करेगा।

शिकारी के इस आत्म-परिवर्तन और अनजाने में हुए सावन शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती वहां प्रकट हुए। महादेव ने शिकारी को 'गुह' नाम प्रदान किया और वरदान दिया कि त्रेतायुग में स्वयं भगवान श्रीराम उसके मित्र बनेंगे। इसके साथ ही महादेव ने पूरे मृग परिवार को आकाश मंडल में 'मृगशिरा नक्षत्र' के रूप में अजर-अमर स्थान प्रदान किया। जब शिकारी की मृत्यु का समय आया, तो यमदूत उसे लेने पहुंचे, लेकिन भगवान शिव के गणों ने यमदूतों को रोक दिया और शिकारी को दिव्य विमान में बैठाकर सीधे 'शिवलोक' (कैलाश) ले गए।

सावन शिवरात्रि व्रत कथा का आध्यात्मिक संदेश और पूजन नियम

सावन शिवरात्रि की यह पावन कथा हमें संदेश देती है कि जब अनजाने में किए गए सावन शिवरात्रि व्रत और बेलपत्र अर्पण से एक क्रूर शिकारी के जन्मों के पाप नष्ट हो सकते हैं और उसे मोक्ष मिल सकता है, तो जो भक्त श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ इस दिन व्रत रखते हैं, महादेव उनके जीवन के बड़े से बड़े कष्ट हर लेते हैं।

व्रत और पूजा के आवश्यक नियम:

सावन शिवरात्रि पर प्रातःकाल उठकर स्नान करें और शुद्ध मन से व्रत का संकल्प लें।

पूजा में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी, चंदन, भस्म, धतूरा और कम से कम तीन पत्तियों वाला अखंडित बेलपत्र अर्पित करें।

पूरे दिन और रात्रि में 'ॐ नमः शिवाय' अथवा 'महामृत्युंजय मंत्र' का निरंतर मानसिक जाप करें।

रात्रि के चारों प्रहर में या संध्या समय इस 'सावन शिवरात्रि व्रत कथा' को स्वयं पढ़ें या परिवारजनों के साथ बैठकर अवश्य सुनें।

पूजा के अंत में आरती करें और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए भोलेनाथ से क्षमा प्रार्थना करें।