BREAKING:
August 10 2026 03:45 pm

जानें पवित्र मिट्टी के चयन से लेकर निर्माण, संपूर्ण पूजन विधि और विसर्जन का सही समय व शास्त्रसम्मत नियम

Post

सनातन धर्मग्रंथों और विशेष रूप से 'शिवपुराण' की कोटिरुद्रसंहिता में पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी के शिवलिंग) की पूजा को सभी प्रकार के पूजन विधानों में सर्वोपरि और अत्यंत फलदायी बताया गया है। सावन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी यानी सावन शिवरात्रि के पावन अवसर पर घर पर स्वयं अपने हाथों से पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनका पूजन करने से कलयुग में कोटि-यज्ञों के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलयुग में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए पार्थिव पूजन सबसे सुलभ और अचूक साधन है। स्वयं श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करने से पहले समुद्र तट पर पार्थिव शिवलिंग बनाकर ही महादेव की आराधना की थी। सावन शिवरात्रि पर जो भी भक्त निष्काम भाव से पार्थिव शिवलिंग का निर्माण और पूजन करता है, उसके घर से दरिद्रता, गृह क्लेश, मानसिक संताप और अकाल मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

पार्थिव शिवलिंग निर्माण के लिए पवित्र मिट्टी का चयन और शुद्धिकरण

पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए मिट्टी का चयन और उसका सही ढंग से शुद्धिकरण करना अत्यंत आवश्यक है। गलत स्थान की मिट्टी का उपयोग करने से पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

मिट्टी का चयन कहां से करें: पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, शिप्रा), तालाब के तट, बेलपत्र के वृक्ष के नीचे की मिट्टी, पीपल के पेड़ की जड़ की मिट्टी या किसी स्वच्छ बगीचे की काली अथवा पीली मिट्टी का उपयोग करना सबसे उत्तम माना जाता है। ध्यान रखें कि तुलसी के पौधे की मिट्टी से शिवलिंग नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि भगवान शिव की पूजा में तुलसी दल वर्जित होता है। इसके अलावा किसी दूषित स्थान, श्मशान, या सड़क किनारे की मिट्टी का प्रयोग कदापि न करें।

मिट्टी का शुद्धिकरण और मिश्रण तैयार करना:

सबसे पहले मिट्टी को अच्छी तरह छान लें ताकि उसमें कंकड़, पत्थर, तिनके या बाल न रहें।

इसके बाद मिट्टी को एक स्वच्छ पात्र में रखें और उसमें थोड़ा सा शुद्ध गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, थोड़ा सा गाय का गोबर (गोमय), देसी घी, शहद और भस्म मिलाएं।

इन सभी सामग्रियों को मिलाकर मिट्टी को आटे की तरह अच्छी तरह गूंथ लें। इस प्रकार तैयार की गई मिट्टी अत्यंत पवित्र, कोमल और शिवलिंग बनाने योग्य हो जाती है।

घर पर पार्थिव शिवलिंग बनाने की शास्त्रसम्मत एवं आसान चरणबद्ध विधि

घर पर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करते समय दिशा और आकृति के नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

निर्माण की सही दिशा और स्थान: पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए घर की उत्तर दिशा या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) का चयन करें। एक स्वच्छ पीतल, तांबे या लकड़ी की चौकी स्थापित करें। उस पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं और उसके ऊपर एक कांसे या पीतल की थाली या बेलपत्र रखें।

आकार और संरचना का नियम:

वेदी (जलाधारी) का निर्माण: सबसे पहले गूंथी हुई मिट्टी से एक गोल या चौकोर आधार (वेदी) बनाएं और उसमें उत्तर दिशा की ओर निकलती हुई जल निकासी (जलाधारी/अरघा) की आकृति बनाएं। जलाधारी का मुख सदैव उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।

शिवलिंग का निर्माण: इसके पश्चात मिट्टी का एक पिंडी स्वरूप (शिवलिंग) बनाकर जलाधारी के ठीक मध्य में स्थापित करें।

आकार का ध्यान रखें: घर में पूजन हेतु पार्थिव शिवलिंग का आकार बहुत विशाल नहीं होना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, गृहस्थों के लिए अंगूठे के आकार से लेकर अधिकतम 12 अंगुल (लगभग हाथ की हथेली) के आकार का शिवलिंग बनाना ही सर्वोत्तम माना गया है।

अंगों का सामंजस्य: शिवलिंग का ऊपर का गोल भाग (लिंगम) और नीचे की जलाधारी एक दूसरे से सुदृढ़ तरीके से जुड़े होने चाहिए ताकि पूजन और जलाभिषेक के समय वे खंडित न हों।

सावन शिवरात्रि पर पार्थिव शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा और पूजन प्रक्रिया

शिवलिंग बनकर तैयार हो जाने के बाद उस पर भगवान शिव का आह्वान कर पूजन आरंभ किया जाता है।

आह्वान और प्राण-प्रतिष्ठा: हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें और प्रार्थना करें कि वे इस पार्थिव शिवलिंग में विराजमान होकर आपकी पूजा स्वीकार करें।

पंचोपचार व षोडशोपचार पूजन:

जलाभिषेक व स्नान: पार्थिव शिवलिंग बहुत कोमल होता है, इसलिए सीधे तेज धार से जल चढ़ाने के बजाय हाथ की उंगलियों या आचमनी से धीरे-धीरे गंगाजल और कच्चे दूध की बूंदें अर्पित करें।

चंदन व भस्म: शिवलिंग पर सफेद चंदन, अष्टगंध और शुद्ध भस्म का त्रिपुंड लगाएं।

अर्पण सामग्री: तीन पत्तियों वाला अखंडित बेलपत्र (जिस पर राम नाम या ॐ लिखा हो), धतूरा, भांग, शमी पत्र, सफेद आंकड़े के फूल और कनेर के पुष्प अर्पित करें।

धूप-दीप और भोग: देशी घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें। भगवान भोलेनाथ को कंदमूल, फल, मखाने की खीर या मिठाई का भोग लगाएं।

मंत्र जाप व आरती: पूजन के दौरान निरंतर 'ॐ नमः शिवाय' या 'महामृत्युंजय मंत्र' का जाप करते रहें। अंत में कपूर जलाकर पूरे परिवार के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की आरती उतारें।

पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन कब और कैसे करें? जानें सही समय और नियम

पार्थिव शिवलिंग का पूजन करने के पश्चात उसका विसर्जन करना अनिवार्य होता है, क्योंकि मिट्टी का शिवलिंग अधिक समय तक रखने से सूखकर खंडित हो सकता है।

विसर्जन का सही समय:

पहला विकल्प (प्रदोष काल के बाद): यदि आपने सावन शिवरात्रि के दिन सुबह पार्थिव शिवलिंग बनाया है, तो दिनभर और संध्या (प्रदोष काल) की पूजा संपन्न करने के बाद उसी रात्रि विसर्जन किया जा सकता है।

दूसरा विकल्प (अगले दिन प्रातः): सबसे उत्तम विधान यह है कि सावन शिवरात्रि की पूरी रात या चार प्रहर की पूजा संपन्न करने के बाद अगले दिन (अमावस्या/पारणा तिथि) प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन करें।

शास्त्रसम्मत विसर्जन की विधि:

क्षमा प्रार्थना: विसर्जन से पूर्व हाथ जोड़कर भगवान शिव से पूजा में हुई किसी भी अनजानी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और प्रार्थना करें कि 'हे महादेव! आप अपने दिव्य लोक को प्रस्थान करें और पुनः हमारे बुलाने पर पधारें।'

स्थान परिवर्तन: शिवलिंग को थोड़ा सा अपनी जगह से उत्तर दिशा की ओर खिसकाएं।

पवित्र जलाशय में विसर्जन: यदि आपके घर के आसपास कोई पवित्र नदी, तालाब या कुआँ है, तो पूरे सम्मान और भक्तिभाव से पार्थिव शिवलिंग को जल में प्रवाहित कर दें।

घर पर विसर्जन की आधुनिक व पवित्र विधि: यदि आसपास कोई नदी या जलाशय न हो, तो किसी बड़े स्वच्छ पात्र (बाल्टी या गमले) में साफ जल भरें। उसमें थोड़ा सा गंगाजल और गुलाब की पंखुड़ियां डालें। इसके बाद पार्थिव शिवलिंग को उस जल में धीरे से विसर्जित कर दें। जब मिट्टी पूरी तरह से पानी में घुल जाए, तो उस पवित्र जल और मिट्टी को घर में लगे पीपल, बरगद, बेलपत्र के पेड़ या किसी बड़े गमले/पौधे में डाल दें। ध्यान रखें कि यह जल किसी के पैरों के नीचे न आए और न ही इसे नाली में बहने दें।

सावन शिवरात्रि पर इस प्रकार शास्त्रसम्मत विधि से पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन और विसर्जन करने से भगवान आशुतोष अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।