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August 13 2026 07:59 pm

भारत की जमीन पर नेपाल के दावे को बड़ा झटका! गायब हुए ऐतिहासिक 'सुगौली संधि' के मूल दस्तावेज, केपी शर्मा ओली की ओली सरकार पर उठे सवाल

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भारत और नेपाल के बीच बीते कुछ वर्षों से जारी सीमा विवाद (Border Dispute) के बीच एक ऐसा अभूतपूर्व और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है जिसने काठमांडू से लेकर दिल्ली तक के कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। जिस 1816 की ऐतिहासिक 'सुगौली की संधि' (Treaty of Sugauli) को आधार बनाकर नेपाल सरकार भारत के सीमावर्ती इलाकों—कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा—पर अपना दावा ठोकती आ रही थी, उसी ऐतिहासिक सुगौली संधि की मूल प्रति (Original Treaty Document) नेपाल के अपने ही राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) से गायब हो चुकी है। नेपाल के कानून और विदेश मामलों से जुड़े शीर्ष अधिकारियों ने संसद और मीडिया के सामने यह स्वीकार किया है कि उनके पास 1816 की उस संधि का मूल दस्तावेज मौजूद ही नहीं है।

इस सनसनीखेज खुलासे के बाद पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा भारत के खिलाफ बनाए गए राजनीतिक नैरेटिव और नए विवादित नक्शे की अंतरराष्ट्रीय वैधानिकता पर बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि नेपाल का दावा न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है, बल्कि कार्टोग्राफिक दावों (मानचित्रीय दावों) के पीछे कोई कानूनी आधार भी नहीं है।

क्या है 1816 की सुगौली संधि? जिसके आधार पर खींची गई थी भारत-नेपाल सीमा

इतिहास के पन्नों को पलटें तो ईस्ट इंडिया कंपनी (ब्रिटिश हुकूमत) और नेपाल के गोरखा राजा के बीच 1814 से 1816 के दौरान 'एंग्लो-नेपाल युद्ध' लड़ा गया था। युद्ध के अंत के बाद 2 दिसंबर 1815 को सुगौली में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसे 4 मार्च 1816 को आधिकारिक रूप से लागू किया गया था। इसी संधि को ऐतिहासिक रूप से 'सुगौली की संधि' के नाम से जाना जाता है।

इस संधि के तहत तय हुआ था कि काली नदी (महाकाली नदी) भारत और नेपाल के बीच की पश्चिमी सीमा रेखा होगी। संधि के अनुसार, महाकाली नदी के पूर्व का पूरा भूभाग नेपाल का माना गया और पश्चिम का भूभाग भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) के अधीन आया। इसी संधि के दम पर नेपाल सरकार यह दावा करती आ रही थी कि महाकाली नदी का उद्गम स्थल लिंपियाधुरा है, इसलिए लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का लगभग 335 वर्ग किलोमीटर का इलाका उसका हिस्सा है।

कैसे शुरू हुआ था विवाद? केपी शर्मा ओली ने जारी किया था नया नक्शा

भारत-नेपाल के बीच यह सीमा विवाद तब सबसे ज्यादा गरमा गया था जब मई 2020 में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक बनी एक रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किया था, जो मानसरोवर यात्रा के मार्ग को बेहद आसान बनाती है। इस सड़क का उद्घाटन होते ही नेपाल की तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार ने कड़ा विरोध जताया था।

इसके बाद, जून 2020 में नेपाल की संसद ने सर्वसम्मति से संविधान संशोधन पारित करके देश का एक नया राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शा (New Political Map) जारी किया। इस नए नक्शे में नेपाल ने भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को अपनी सीमा के भीतर दर्शा दिया था। भारत ने नेपाल के इस कदम को "एकतरफा और ऐतिहासिक तथ्यों व साक्ष्यों के विपरीत" बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया था।

दस्तावेज गायब होने से बैकफुट पर काठमांडू: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कैसे साबित होगा दावा?

नेपाल के कानून और न्याय मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने संसदीय समितियों के समक्ष यह खुलासा किया कि जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान अपने दावों को साबित करने के लिए सुगौली संधि की मूल प्रति की तलाश शुरू की, तो वह नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of Nepal) और नारायणहिती पैलेस संग्रहालय में मिली ही नहीं।

नेपाली अधिकारियों के अनुसार, उनके पास सुगौली संधि की केवल फोटोकॉपी या बाद में छपी किताबों के संदर्भ ही उपलब्ध हैं, लेकिन आधिकारिक मुहरों और हस्ताक्षरों वाला असली ऐतिहासिक दस्तावेज नेपाल के रिकॉर्ड रूम से नदारद है। माना जा रहा है कि सुगौली संधि का मूल दस्तावेज केवल लंदन स्थित 'ब्रिटिश लाइब्रेरी' और भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India) के पास ही सुरक्षित रूप से मौजूद है।

कानूनी विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों का मानना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा विवाद में मूल दस्तावेज (Original Primary Document) की अनुपस्थिति में दावेदार देश का पक्ष बेहद कमजोर हो जाता है। यदि नेपाल भविष्य में संयुक्त राष्ट्र (UN) या इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मामले को ले जाने की कोशिश भी करता है, तो बिना मूल आधिकारिक दस्तावेज के उसका दावा टिक ही नहीं पाएगा।

भारत का क्या है रुख और नेपाल की घरेलू राजनीति में भूचाल

भारत सरकार का इस पूरे मामले पर हमेशा से एक स्पष्ट और सुदृढ़ रुख रहा है। भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख का पूरा इलाका भारत की संप्रभु सीमा (Sovereign Territory) का हिस्सा है। भारत 1950 के दशक से ही इन रणनीतिक इलाकों में अपनी सीमा चौकियों (Outposts) और सुरक्षा बलों को बनाए हुए है, और स्थानीय राजस्व रिकॉर्ड भी भारत के पास ही उपलब्ध हैं।

नेपाल के भीतर भी इस प्रशासनिक लापरवाही को लेकर भारी नाराजगी और राजनीतिक भूचाल देखने को मिल रहा है। विपक्षी नेताओं और आम जनता ने सरकार से सवाल पूछा है कि जब देश के पास ऐसे संवेदनशील और ऐतिहासिक भू-भाग से जुड़ा मूल दस्तावेज ही सुरक्षित नहीं था, तो किस आधार पर भारत के साथ कूटनीतिक तनाव मोल लिया गया? बहरहाल, सुगौली संधि के दस्तावेज गायब होने के इस खुलासे ने भारत-नेपाल सीमा विवाद में भारत के रुख को और अधिक मजबूत कर दिया है।