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August 12 2026 09:05 am

रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 100% टैरिफ का खतरा? अमेरिकी सीनेट में बिल पास, जानें अमेरिकी सांसदों और ट्रम्प-मोदी रिश्तों पर कूटनीतिक हलचल

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अमरीकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट (US Senate) ने भारी बहुमत (86-11) से 'लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026' (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026) पारित कर दिया है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव को कई गुना बढ़ाना है।

इस नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति (डोनाल्ड ट्रम्प) को यह अधिकार (Discretionary Power) दिया जा रहा है कि वे उन शीर्ष 5 देशों के उत्पादों पर 100% तक का सीमा शुल्क (Tariff) लगा सकते हैं जो रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस का आयात कर रहे हैं। चूँकि भारत और चीन वर्तमान समय में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए इस विधेयक के कारण भारत के निर्यात पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगने का नया कूटनीतिक संकट मंडराने लगा है।

ट्रम्प और मोदी के नाम पर अमेरिकी अधिकारियों व सांसदों ने क्या कहा?

अमेरिकी संसद में इस विधेयक पर हुई तीखी बहस के दौरान सांसदों और अधिकारियों की ओर से विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आईं:

समर्थक सांसदों का बयान (अमेरिकी बाजार या सस्ता तेल): बिल की सह-प्रयोजक और सीनेटर डारलीन ग्राहम (Darline Graham) ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो देश रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहे हैं, उन्हें अब एक कड़ा विकल्प चुनना होगा—"या तो वे अमेरिकी बाजार में अपना व्यापार जारी रखें, या फिर रूस से सस्ता ऊर्जा संसाधन खरीदें।" सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल (Richard Blumenthal) ने कहा कि यह कदम रूस के युद्ध तंत्र को वित्तीय मदद पहुँचाने वाले देशों पर रोक लगाएगा।

विरोधी सांसदों की भारत के पक्ष में चेतावनी: सीनेटर रैंड पॉल (Rand Paul) और रॉन वायडन (Ron Wyden) जैसे सांसदों ने इस विधेयक का विरोध करते हुए ट्रम्प प्रशासन को आगाह किया कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर 100% टैरिफ लगाने का विचार उल्टा असर दिखा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे भारत की ऊर्जा नीति में कोई खास बदलाव नहीं आएगा, बल्कि वाशिंगटन और नई दिल्ली के प्रगाढ़ होते कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों में अकारण भारी तनाव पैदा हो जाएगा।

ट्रम्प की व्यक्तिगत वीटो/वेवर पावर (Trump-Modi Factor): अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कानून अपने आप स्वतः (Automatically) टैरिफ लागू नहीं करता है। इसमें राष्ट्रपति ट्रम्प को यह विशेष अधिकार (Waiver Authority) दिया गया है कि वे अमेरिकी राष्ट्रीय हित (National Interest) और मित्र देशों (जैसे भारत) के साथ अपने रणनीतिक संबंधों का हवाला देकर इन प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट दे सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच के निजी और रणनीतिक संबंधों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प इस वीटो/वेवर पावर का इस्तेमाल करके भारत को छूट (Exemption) प्रदान कर सकते हैं।

भारत का क्या रुख है और इसका कितना असर होगा?

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत का रुख हमेशा से अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की सुरक्षा का रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि भारत की प्राथमिकता 1.4 अरब देशवासियों को सस्ती और निरंतर ऊर्जा उपलब्ध कराना है।

31 अगस्त को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में वोटिंग: सीनेट से पास होने के बाद यह बिल अब 31 अगस्त को अमेरिकी निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' (House of Representatives) में जाएगा। वहां से पारित होने और राष्ट्रपति ट्रम्प के हस्ताक्षर के बाद ही यह कानून का रूप लेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: भारतीय आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट कम होकर 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल ही रह गया है। यदि अमेरिका 100% टैरिफ लागू करता है, तो भारत के पास अन्य खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब या यूएई) से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प खुले हुए हैं, इसलिए यह भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक ढांचे के लिए कोई स्थायी झटका नहीं होगा।

वैश्विक कूटनीति के जानकारों की नजरें अब 31 अगस्त के बाद अमेरिकी संसद और व्हाइट हाउस के अंतिम रुख पर टिकी हैं कि क्या ट्रम्प प्रशासन भारत को इस टैरिफ से छूट देगा या व्यापारिक वार्ता का नया दौर शुरू होगा।