360 मिनट के बजटीय सत्र में 36 मिनट का महा-संग्राम: प्रश्नकाल रद्द, बिना चर्चा के 7 महत्वपूर्ण विधेयक पारित होने पर संसद में मचा तीखा बवाल
संसद का मानसून सत्र अपनी विधायी गतिविधियों से ज्यादा प्रक्रियात्मक विवादों और राजनीतिक गतिरोध के कारण चर्चा में आ गया है। सदन में बने अभूतपूर्व हंगामे और शोरगुल के बीच सरकार ने महज 36 मिनट की समयावधि में 7 बेहद महत्वपूर्ण विधेयकों (Bills) को बिना किसी विस्तृत चर्चा के ध्वनिमत (Voice Vote) से पारित करा लिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पूरे दिन की कार्यवाही के दौरान सदस्यों को जनहित के बुनियादी सवाल पूछने का अवसर देने वाला 'प्रश्नकाल' (Question Hour) आयोजित ही नहीं हो सका और ना ही शून्यकाल (Zero Hour) का पूरा संचालन हो पाया।
संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा और विधायी प्रक्रिया (Legislative Procedure) को लेकर इस घटनाक्रम के बाद सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों के बीच तीखा वाकयुद्ध छिड़ गया है। जहां एक तरफ विपक्ष ने सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने, विधेयकों की गंभीर समीक्षा (Scrutiny) से बचने और संसद को रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ सरकार का तर्क है कि विपक्ष की लगातार नारेबाजी, तख्तियां दिखाने और कामकाज में अड़ंगा डालने की वजह से विधेयकों को बिना चर्चा के पास कराना मजबूरी बन गया था।
5 मिनट प्रति बिल का औसत: जानें मानसून सत्र में कैसे पास हुए 7 विधेयक?
सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, विपक्षी सदस्यों ने विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। कार्यसूची (List of Business) के अनुसार पहले प्रश्नकाल का समय निर्धारित था, लेकिन वेल (Well) में आकर विपक्ष के जोरदार प्रदर्शन और हंगामे के चलते पीठासीन अधिकारी को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। जब दोबारा सदन की बैठक शुरू हुई, तो विधायी कार्य (Legislative Business) को तेजी से आगे बढ़ाया गया।
संसदीय आंकड़ों और समयसीमा का विश्लेषण करें तो:
कुल समय: 7 विधेयकों को पेश करने, मंत्री द्वारा वक्तव्य दिए जाने और ध्वनिमत से पारित कराने की पूरी प्रक्रिया मात्र 36 मिनट में संपन्न हो गई।
औसत समय: प्रति विधेयक औसतन 5 मिनट से भी कम समय का आवंटन हो सका।
संसदीय समितियों को भेजने से परहेज: पारित किए गए 7 विधेयकों में से किसी भी विधेयक को विस्तृत विचार-विमर्श के लिए संसद की स्थायी समिति (Departmentally Related Standing Committee) या संयुक्त प्रवर समिति को नहीं भेजा गया।
पारित किए गए विधेयकों में अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक सुधार, आपराधिक न्याय प्रणाली और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई अहम संशोधन शामिल थे, जिनका सीधा असर आम नागरिकों, राज्यों के अधिकारों और देश के वित्तीय ढांचे पर पड़ता है। विपक्षी सांसदों का तर्क है कि इतने महत्वपूर्ण कानूनों पर कम से कम कई घंटों की बहस, संशोधनों (Amendments) पर वोटिंग और राज्यों के हितों पर चर्चा होनी अनिवार्य थी।
प्रश्नकाल न होना क्यों बना सबसे बड़ा विवाद का केंद्र?
भारतीय संसदीय प्रणाली में प्रश्नकाल (Question Hour) को लोकतंत्र का सबसे सशक्त पहुआ माना जाता है। इस एक घंटे (सुबह 11 से 12 बजे) के दौरान जनप्रतिनिधि (सांसद) सीधे मंत्रियों से सरकार की नीतियों, योजनाओं में भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दों पर तारांकित (Starred) और अतारांकित (Unstarred) सवाल पूछते हैं।
जब प्रश्नकाल को रद्द किया जाता है या हंगामे की भेंट चढ़ा दिया जाता है, तो:
सरकार की जवाबदेही (Executive Accountability) खत्म होती है: बिना सवाल-जवाब के सरकार बिना किसी जवाबदेही के नीतियां लागू कर सकती है।
जनता की आवाज दबती है: देश के अलग-अलग क्षेत्रों से चुनकर आए सांसदों के पास अपने स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने का सबसे प्रभावी मंच छिन जाता है।
संसदीय परंपराओं का हनन: विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार प्रश्नकाल का बलि चढ़ना या विधेयकों को मिनटों में पास कराना संसदीय परंपराओं को कमजोर करता है।
सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष: किसने क्या दी दलील?
विपक्ष का कड़ा रुख:
विपक्षी दलों के नेताओं और फ्लोर लीडर्स ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस पूरी प्रक्रिया को लोकतंत्र का 'चीरहरण' करार दिया। विपक्ष के मुख्य सचेतक ने कहा कि "सरकार केवल अपनी विधायी कार्यसूची (Legislative Agenda) को पूरा करने में रुचि रखती है। देश के मुख्य मुद्दों पर बहस कराने के बजाय विधेयकों को बुलेट ट्रेन की रफ्तार से पास कराया जा रहा है। संसद का मतलब केवल संख्याबल से कानून पास कराना नहीं, बल्कि संवाद (Deliberation) और सहमति बनाना है।"
सरकार की सफाई:
दूसरी ओर, संसदीय कार्य मंत्री और सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं ने विपक्ष के आरोपों का कड़ा खंडन किया। सरकार का कहना था कि "सरकार हर मुद्दे पर स्वस्थ चर्चा के लिए हमेशा तैयार थी। कार्यमंत्रणा समिति (BAC) में चर्चा के लिए समय तय किया गया था, लेकिन विपक्षी दलों का मकसद केवल सदन में गतिरोध पैदा करना और कार्यवाही को बाधित करना था। देश के विकास से जुड़े कानूनों को अनंतकाल तक नहीं अटकाया जा सकता, इसलिए जनहित में इन विधेयकों का पारित होना बेहद जरूरी था।"
क्या कहता है संसदीय इतिहास और नियम?
संसदीय विशेषज्ञों और संविधानविदों का मानना है कि यद्यपि नियमों के तहत पीठासीन अधिकारी (स्पीकर या सभापति) के पास यह अधिकार होता है कि वे ध्वनिमत से विधेयकों को पारित करा सकें, लेकिन बहस और समीक्षा के बिना कानून बनाने की यह परिपाटी न्यायपालिका में मुकदमों का बोझ बढ़ाती है। कई बार पर्याप्त चर्चा न होने के कारण कानूनों में तकनीकी और व्यावहारिक खामियां रह जाती हैं, जिन्हें बाद में अदालतों में चुनौती दी जाती है।
मानसून सत्र के इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत में संसदीय लोकतंत्र के संचालन, अध्यादेशों (Ordinances) व जल्दबाजी में पारित विधेयकों की वैधानिकता और प्रश्नकाल की पवित्रता को लेकर एक नए राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दे दिया है।