पीएम मोदी क्यों बार-बार कर रहे हैं ये अपील? समझिए चालू खाता घाटा, अरबों डॉलर के आउटफ्लो और 'वेड इन इंडिया' का पूरा आर्थिक गणित
'मन की बात' से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उद्योग सम्मेलनों के मंच तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर देशवासियों, विशेष रूप से संपन्न और मध्यम वर्ग से तीन खास अपीलें दोहराते नजर आते हैं—भौतिक रूप में जरूरत से ज्यादा सोना खरीदने की होड़ से बचना, विदेशों में करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करके डेस्टिनेशन वेडिंग करने के बजाय देश के भीतर शादी करना ('वेड इन इंडिया'), और विदेशी छुट्टियों पर जाने से पहले अपने ही देश के कम से कम 15-20 प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना ('देखो अपना देश')। पहली नजर में किसी को यह सामान्य सांस्कृतिक या सामाजिक सलाह लग सकती है, लेकिन अर्थशास्त्र, कूटनीति और वैश्विक व्यापार के नजरिए से देखें तो इन तीन साधारण सी दिखने वाली अपीलों के पीछे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, रुपये की कीमत को थामने, चालू खाता घाटा (CAD) घटाने और भारत के भीतर लाखों नए रोजगार सृजित करने का एक बेहद सटीक और सोची-समझी आर्थिक रणनीति (Macroeconomic Strategy) छिपी हुई है।
सोने के भारी आयात से खजाने पर दबाव: चालू खाता घाटा (CAD) और विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा गणित
भारत दुनिया में सोने (Gold) का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और आयातक देश है। भारतीय समाज में विवाह, त्योहारों और पारिवारिक बचत के रूप में सोना खरीदना सदियों पुरानी परंपरा और भावनात्मक सुरक्षा का प्रतीक रहा है। लेकिन इस भावनात्मक जुड़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा वित्तीय असर पड़ता है। चूंकि भारत अपनी घरेलू सोने की मांग का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों (स्विट्जरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका आदि) से आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल (Crude Oil) के बाद सोना भारत के आयात बिल में विदेशी मुद्रा की सबसे बड़ी खपत करने वाला दूसरा प्रमुख उत्पाद बन चुका है।
जब देश में लाखों नागरिक भारी मात्रा में भौतिक सोना खरीदते हैं, तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) से हर साल 40 से 50 अरब डॉलर (करीब 3.5 से 4.5 लाख करोड़ रुपये) की भारी-भरकम पूंजी विदेशों में चली जाती है। यह सीधे तौर पर देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ा देता है। आयात बिल बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ती है और भारतीय रुपया कमजोर होता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री बार-बार यह संदेश देते हैं कि देश की घरेलू बचत को तिजोरियों में 'डेड एसेट' (अनुत्पादक संपत्ति) के रूप में बंद सोने में फंसाने के बजाय वित्तीय बाजारों, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB), म्यूचुअल फंड्स या नए उद्योगों में निवेश किया जाए, ताकि यह पैसा देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण और विनिर्माण में काम आ सके।
'वेड इन इंडिया' (Wed in India): विदेशों में शादियों पर उड़ने वाले अरबों डॉलर देश में रोकने की मुहिम
हाल के वर्षों में भारत के अमीर उद्योगपतियों, कॉर्पोरेट्स और हाई-नेट-वर्थ परिवारों के बीच इटली, स्विट्जरलैंड, दुबई, तुर्किये (तुर्की), थाईलैंड और यूरोप के खूबसूरत शहरों में जाकर भव्य डेस्टिनेशन वेडिंग (Destination Wedding) करने का एक बड़ा फैशन बन चुका है। भारतीय शादियों के बाजार के अनुमानों के मुताबिक, हर साल सैकड़ों अमीर परिवार विदेशी शादियों पर करीब 75,000 करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक की भारी विदेशी मुद्रा विदेशों में बहा देते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इन इंडिया' की तर्ज पर 'वेड इन इंडिया' का नारा देते हुए देश के रईसों से सवाल किया कि जो धरती देवी-देवताओं और प्राकृतिक सौंदर्य की धनी है, वहां शादी करने में क्या संकोच है? यदि यह पैसा उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों, राजस्थान के शाही महलों (उदयपुर, जयपुर, जोधपुर), केरल के बैकवाटर्स, गोवा के समुद्र तटों या वाराणसी और हम्पी जैसे आध्यात्मिक धरोहर स्थलों पर खर्च किया जाए, तो वह अरबों रुपया भारत के भीतर ही घूमेगा। इससे स्थानीय होटल उद्योग, इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों, कैटरर्स, फोटोग्राफर्स, लोक कलाकारों, बुनकरों और टैक्सी चालकों की आजीविका को सीधा और अभूतपूर्व संबल मिलेगा।
'देखो अपना देश': विदेशी पर्यटन से पहले भारतीय स्थलों की खोज और स्थानीय इकोनॉमी को संजीवनी
शादियों की तरह ही भारतीयों द्वारा विदेशों में छुट्टियां बिताने (Outbound Tourism) का खर्च भी तेजी से बढ़ा है। भारतीय पर्यटक हर साल यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया और अमेरिका की यात्राओं पर 15 से 20 अरब डॉलर से अधिक खर्च करते हैं। इसके विपरीत, भारत के भीतर ही कश्मीर, लद्दाख, अंडमान-निकोबार, पूर्वोत्तर के सात राज्य (Seven Sisters), पश्चिमी घाट और मध्य भारत के जंगलों जैसी अद्वितीय प्राकृतिक संपदा मौजूद है।
प्रधानमंत्री की अपील का मूल मंत्र यह है कि भारतीय नागरिक पहले अपनी विविधतापूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को देखें। जब एक भारतीय परिवार अपने देश के किसी राज्य में घूमने जाता है, तो उसके द्वारा खर्च किया गया हर एक रुपया देश के आंतरिक आर्थिक चक्र (Internal Economic Multiplier) को मजबूत करता है। इससे टियर-2 और टियर-3 शहरों में होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प, क्षेत्रीय खानपान, परिवहन और गाइडों को नियमित आय मिलती है, जिससे ग्रामीण और अर्बन-रूरल माइग्रेशन को रोकने में भी मदद मिलती है।
'डेड कैपिटल' को 'प्रोडक्टिव कैपिटल' में बदलना: विकसित भारत 2047 के लिए जरूरी कदम
अर्थशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि किसी भी देश की वास्तविक समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि उसका समाज अपनी बचत का उपयोग किस रूप में करता है। भारत के घरों में और धार्मिक ट्रस्टों के पास अनुमानित 25,000 टन से अधिक सोना दबा पड़ा है, जिसका बाजार मूल्य 1.5 से 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। यदि यह पूंजी केवल लॉकरों में बंद रहती है, तो यह देश में न तो कोई फैक्ट्री लगा सकती है, न कोई नया रोजगार पैदा कर सकती है और न ही कोई नया आविष्कार कर सकती है।
सरकार की नीति यह है कि लोगों की मानसिकता को भौतिक संपत्तियों (Physical Assets) से वित्तीय संपत्तियों (Financial Assets) की ओर मोड़ा जाए। जब लोग सोना खरीदने के बजाय शेयर बाजार, बॉन्ड्स, स्टार्टअप्स या बैंकों में फिक्स डिपॉजिट करते हैं, तो बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ती है, जिससे उद्योगों को कम ब्याज दर पर पूंजी मिलती है और देश का बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित होता है। विकसित भारत 2047 (Viksit Bharat 2047) के विजन को हासिल करने के लिए भारत को अपनी घरेलू बचत का अधिकतम हिस्सा उत्पादक आर्थिक गतिविधियों में लगाने की सख्त आवश्यकता है।
'वोकल फॉर लोकल' का व्यापक विस्तार: उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव का कूटनीतिक संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन बयानों का एक गहरा रणनीतिक और कूटनीतिक पहलू भी है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, वैश्विक संघर्षों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के टूटने के दौर में वही देश आर्थिक रूप से संप्रभु और सुरक्षित रह सकते हैं जिनकी अर्थव्यवस्था अपनी आंतरिक खपत और स्थानीय मांग (Domestic Demand) पर मजबूती से टिकी हो।
'वोकल फॉर लोकल' केवल मिट्टी के दीये या खादी खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक के उपभोग व्यवहार (Consumer Behavior) से जुड़ा है। अपने जीवन के सबसे बड़े वित्तीय खर्चों—जैसे शादी, छुट्टियां और बचत—में स्वदेशी और स्थानीय विकल्पों को पहली प्राथमिकता देकर देश का हर नागरिक अनजाने में ही सही, लेकिन सीधे तौर पर राष्ट्र निर्माण और भारतीय मुद्रा की मजबूती में अपना ऐतिहासिक योगदान दे सकता है। पीएम मोदी की यह अपील दरअसल किसी पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं, बल्कि देश के नागरिकों में राष्ट्रीय आर्थिक चेतना जगाने का एक सशक्त और दूरदर्शी प्रयास है।