भूलने को सिर्फ उम्र का असर न मानें, डिमेंशिया के 5 शुरुआती संकेत पहचानें
भूलने को सिर्फ उम्र का असर न मानें, डिमेंशिया के 5 शुरुआती संकेत पहचानें
उम्र बढ़ने के साथ हमारे प्रियजनों की सक्रियता में कमी आना स्वाभाविक माना जाता है। अपॉइंटमेंट भूल जाना, किसी बातचीत को याद न रख पाना या सही शब्द खोजने में थोड़ी परेशानी होना कई बार सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा लग सकता है। लेकिन जब ऐसे बदलाव बार-बार होने लगें या रोजमर्रा की जिंदगी में दखल देने लगें, तो यह सामान्य उम्र बढ़ने से ज्यादा गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। उम्र से जुड़े सामान्य बदलावों और डिमेंशिया जैसे रोग के शुरुआती संकेतों के बीच अंतर समझना समय पर पहचान और इलाज के लिए जरूरी है।
एससीएआरएफ एनजीओ की सह-संस्थापक और मनोचिकित्सक डॉ. थारा रंगास्वामी ने कहा, "भारत में 88 लाख से ज्यादा लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं, फिर भी ज्यादातर परिवारों को इसका पता बीमारी के बाद के चरणों में चलता है। शुरुआती संकेत अक्सर बहुत हल्के होते हैं और उन्हें सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा समझ लिया जाता है। इन शुरुआती मानसिक बदलावों को केवल भूलने की आदत न मानकर एक चिकित्सकीय स्थिति के रूप में स्वीकार करना जरूरी है। इससे देखभाल के प्रति परिवार का नजरिया झुंझलाहट से सहानुभूति की ओर बदल सकता है और समय पर मदद लेने में भी सहायता मिलती है।"
डिमेंशिया के 5 शुरुआती संकेत: हल्की मानसिक क्षमता में कमी (एमसीआई) और शुरुआती डिमेंशिया से जुड़े मानसिक क्षमता और रोजमर्रा के कामकाज में होने वाले इन बदलावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए:
- एक ही सवाल या बात बार-बार दोहराना
कभी-कभार चीजें भूल जाना सामान्य है, लेकिन सामान्य भूलने और याददाश्त में गंभीर कमी के बीच अंतर होता है। अगर परिवार का कोई बुजुर्ग एक सवाल का जवाब मिलने के कुछ ही मिनट बाद वही सवाल दोबारा पूछने लगे या एक ही बैठक में एक ही कहानी बार-बार सुनाने लगे, तो इस पर ध्यान देना चाहिए। यह नई जानकारी को याद रखने में दिमाग की परेशानी का संकेत हो सकता है।
- रोजमर्रा की चीजें बार-बार गलत जगह रखना
चश्मा या चाबी कहीं रखकर भूल जाना सामान्य है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति चश्मा फ्रिज में या चीनी के डिब्बे में रखने लगे, तो यह चिंता का संकेत हो सकता है। डिमेंशिया के शुरुआती चरण में व्यक्ति सिर्फ चीजें खोता नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसी असंगत या अस्वाभाविक स्थान पर रख सकता है और बाद में यह भी याद न रख पाए कि उसने चीज कहां रखी थी। हाल में क्या किया, यह याद न रख पाना एक चेतावनी का संकेत है और मानसिक क्षमता में गिरावट की ओर इशारा कर सकता है।
- सही शब्द खोजने में परेशानी होना
रोजमर्रा की बातचीत के दौरान अचानक सही शब्द न मिल पाना भी एक संकेत हो सकता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति "घड़ी" या "चम्मच" जैसी सामान्य चीज का नाम भूलकर उसे "वह चीज" कहने लगे या उसके काम का वर्णन करने लगे। ऐसा भाषा और याददाश्त से जुड़े मस्तिष्क के हिस्सों में बदलाव के कारण हो सकता है।
- रोजमर्रा के परिचित काम करने में परेशानी
अगर कोई ऐसा काम जो व्यक्ति वर्षों से आसानी से करता आया है, अचानक मुश्किल लगने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, घर के खर्च का हिसाब रखने वाला व्यक्ति अचानक साधारण गणना में गलतियां करने लगे या बिल भरना भूल जाए। इसी तरह, दशकों से पारंपरिक व्यंजन बनाने वाली गृहणी अचानक उसकी विधि भूलने लगे। परिचित कामों में अचानक परेशानी दिमाग के काम करने के तरीके में बदलाव का संकेत हो सकती है।
- तारीखों का ध्यान न रहना या परिचित जगहों पर रास्ता भूल जाना
कभी-कभी यह भूल जाना सामान्य है कि सप्ताह का कौन सा दिन है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार महीने, मौसम या साल को लेकर भ्रमित रहने लगे, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है। इसी तरह, वर्षों से जिस बाजार में जाते रहे हों, वहां से वापस आते समय रास्ता भूल जाना भी चिंता का कारण है। कभी-कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार दिशा या तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति होने पर डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।
शंका निवारण एवं आगामी कदम
अगर माता-पिता, दादा-दादी या परिवार के किसी बुजुर्ग में ऐसे बदलाव दिखाई दें, तो उन्हें उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान ही सबसे कारगर हथियार है। इन संकेतों का मतलब यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति को डिमेंशिया है, लेकिन इनकी वजह जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। न्यूरोलॉजिस्ट, वयोवृद्ध रोग विशेषज्ञ या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ स्थिति का आकलन कर सही कारण का पता लगाने और आगे की देखभाल के बारे में मार्गदर्शन दे सकते हैं।
इन संकेतों को समय रहते पहचानना केवल बीमारी का पता लगाने तक सीमित नहीं है। इससे व्यक्ति और परिवार को समय पर सहायता लेने, लक्षणों को बेहतर तरीके से संभालने, भविष्य की योजना बनाने और व्यक्ति को अधिक सम्मान, आत्मनिर्भरता और बेहतर जिंदगी के साथ जीने में मदद मिल सकती है।