Nature's fury due to carelessness उत्तरकाशी की त्रासदी से सबक कब मिलेगा
India News Live,Digital Desk : उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में बादल फटने की घटना ने एक बार फिर से पहाड़ी राज्यों में हो रहे अनियोजित निर्माण की गंभीरता को उजागर कर दिया है। इस प्राकृतिक आपदा में जान-माल की जो हानि हुई है, वह केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का परिणाम भी है।
धराली में तबाही: नदी किनारे की गलतियां
उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में क्षीरगंगा नदी के पास बने मकान, होटल और होमस्टे बाढ़ की चपेट में आ गए। इन इमारतों का नदी के बहुत करीब होना ही त्रासदी को और भयावह बना गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य नदी से सुरक्षित दूरी पर होता, तो नुकसान कम होता। यह वही गलती है जो हमने केदारनाथ त्रासदी के समय की थी – और अब दोहराई जा रही है।
नियम ताक पर, खतरा बुलावा
भवन संहिता कहती है कि ऊँची ढलानों और नदी तटों पर निर्माण नहीं होना चाहिए, फिर भी वहां बहुमंज़िला इमारतें बन रही हैं। ‘रिवर व्यू’ के नाम पर नदियों से महज़ 30 मीटर की दूरी पर होटल बनाए जा रहे हैं, जो पुराने नियम (100 मीटर) के साफ उल्लंघन हैं। ऐसे में जब भी बादल फटते हैं या बाढ़ आती है, भारी तबाही तय है।
नियमों की ज़रूरत, मगर पालन कौन करे?
एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूविज्ञानी प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार, सरकार के पास संवेदनशील इलाकों की जानकारी है। दिशा-निर्देश भी मौजूद हैं, लेकिन पालन न होना ही सबसे बड़ा संकट है। खासकर नदी तट, हिमालयी घाटियां और ग्लेशियर क्षेत्रों में सख्ती बेहद ज़रूरी है।
मास्टर प्लान की सख्त ज़रूरत
उत्तराखंड आर्किटेक्ट्स एंड इंजीनियर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डीएस राणा का मानना है कि पूरे राज्य के लिए एक ठोस मास्टर प्लान तैयार होना चाहिए, जिसमें अनियोजित निर्माण पर पूरी तरह रोक लगे। साथ ही, भूकंपरोधी तकनीकों और भवन संहिता का सख्ती से पालन हो। जब तक हम विकास और प्रकृति के बीच संतुलन नहीं बनाते, ऐसी आपदाएं आती रहेंगी।