दूरदर्शन के उस मशहूर शो की दर्दनाक दास्तान, जिसके सेट पर जिंदा जल गए थे 52 लोग, और हीरो को करानी पड़ी थी 70 से ज्यादा सर्जरी
80 और 90 के दशक में दूरदर्शन (Doordarshan) का भारतीय समाज में एक अलग ही जलवा हुआ करता था। 'रामायण', 'महाभारत', 'बुनियाद' और 'हूम लोग' जैसे धारावाहिकों के समय देश की सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। इसी दौर में वर्ष 1989-90 में दूरदर्शन पर एक और भव्य ऐतिहासिक धारावाहिक के निर्माण की तैयारी शुरू हुई थी, जिसने टेलीविजन तकनीक और बजट के मामले में नए आयाम गढ़े। उस ऐतिहासिक शो का नाम था—'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' (The Sword of Tipu Sultan)।
मशहूर अभिनेता और निर्देशक संजय खान (Sanjay Khan) इस शो के निर्माता, निर्देशक और मुख्य अभिनेता (टीपू सुल्तान) थे। लेकिन किसे पता था कि भारतीय टेलीविजन के इतिहास का सबसे भव्य और चर्चित प्रोजेक्ट बनने जा रहा यह शो एक दिन भारतीय मीडिया का सबसे भयानक और दर्दनाक हादसा बन जाएगा। एक ऐसा हादसा जिसने 52 निर्दोष लोगों की जान ले ली और शो के मुख्य हीरो संजय खान को मौत के दरवाजे तक पहुंचा दिया।
8 फरवरी 1989 की वो काली रात: मैसूर के प्रीमियर स्टूडियो में हुआ भयावह हादसा
घटना 8 फरवरी 1989 की है। कर्नाटक के मैसूर स्थित ऐतिहासिक 'प्रीमियर स्टूडियो' (Premier Studios) में 'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' के एक भव्य सीन की शूटिंग चल रही थी। यह सीन टीपू सुल्तान की बेटी की शादी का था, जिसके जश्न में स्टूडियो के भीतर भारी मात्रा में आतिशबाजी (Firecrackers) और बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा था।
शूटिंग के दौरान अचानक बारूद की एक चिंगारी ने सेट पर मौजूद पर्दों और सूती कपड़ों को पकड़ लिया। उस दौर में स्टूडियो में आग से बचाव (Fire Safety) के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं थे। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। साउंडप्रूफ बनाने के लिए स्टूडियो की दीवारों पर फाइबर ग्लास, लकड़ी और फोम लगाया गया था, जिसने आग में घी का काम किया। कुछ ही मिनटों में पूरा स्टूडियो आग के गोले में तब्दील हो गया।
52 लोगों की दर्दनाक मौत और स्टूडियो के बाहर मच गई चीख-पुकार
जब आग फैली तो स्टूडियो के भीतर अफरा-तफरी मच गई। उस समय सेट पर 100 से भी ज्यादा क्रू मेंबर्स, जूनियर आर्टिस्ट्स और टेक्नीशियन्स मौजूद थे। त्रासदी यह हुई कि स्टूडियो का मुख्य दरवाजा बाहर से बंद या जाम हो गया था और वहां कोई भी इमरजेंसी एक्जिट (Emergency Exit) नहीं था।
भीषण धुएं, जहरीली गैसों और गिरते हुए जलते हुए बीम के बीच लोग फंसकर रह गए। इस भयावह अग्निकांड में कुल 52 लोगों की झुलसने और दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई। मरने वालों में ज्यादातर लाइटमैन, कैमरामैन, स्पॉट बॉयज और जूनियर आर्टिस्ट्स शामिल थे। इस घटना ने पूरे देश और भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया था।
मौत के मुंह से लौटे संजय खान: 62% जले और 70 से ज्यादा प्लास्टिक सर्जरीज
शो के निर्माता और मुख्य अभिनेता संजय खान भी इस हादसे का शिकार हुए थे। अपने क्रू मेंबर्स को बचाने की कोशिश में संजय खान गंभीर रूप से जल गए थे। उनके शरीर का 62 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बुरी तरह झुलस चुका था। उनकी हालत इतनी नाजुक थी कि डॉक्टरों ने भी आस छोड़ दी थी।
संजय खान को तुरंत मैसूर से बेंगलोर और फिर एयर एंबुलेंस के जरिए मुंबई के जसलोक अस्पताल ले जाया गया। वे लगभग 13 महीनों तक अस्पताल के आईसीयू (ICU) में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ते रहे। अपने चेहरे, त्वचा और शरीर को दोबारा सामान्य स्थिति में लाने के लिए संजय खान को 70 से ज्यादा कठिन और दर्दनाक प्लास्टिक सर्जरीज (Plastic Surgeries) से गुजरना पड़ा।
संजय खान ने अपनी आत्मकथा 'द बेस्ट मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ' (The Best Mistakes of My Life) में इस हादसे का जिक्र करते हुए लिखा था कि डॉक्टरों ने उन्हें मृत मान लिया था, लेकिन उनके जीने की तीव्र इच्छाशक्ति ने उन्हें मौत के मुंह से वापस खींच लिया।
13 महीने बाद अस्पताल से लौटे संजय खान और ऐसे पूरा हुआ 'टीपू सुल्तान'
इतने बड़े हादसे और 52 जिंदगियों के चले जाने के बाद ऐसा लगा था कि यह शो कभी पूरा नहीं हो पाएगा। लेकिन संजय खान ने ठीक होने के बाद हार नहीं मानी। 13 महीने बाद जब वे अस्पताल से डिस्चार्ज होकर बाहर आए, तो उन्होंने इस शो को दोबारा शुरू करने का फैसला किया।
संजय खान ने अपने भाई शाहबाज खान को टीपू सुल्तान के शुरुआती जीवन के सीन्स के लिए कास्ट किया और बाद में खुद स्क्रीन पर वापसी की। आखिरकार, वर्ष 1990 में यह शो दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ और इसने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। दर्शकों ने इस शो को हाथों-हाथ लिया और संजय खान के इस जज्बे की पूरे देश में तारीफ हुई।
भारतीय मीडिया और फिल्म मेकिंग के लिए एक सबक
'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' के सेट पर हुआ यह हादसा भारतीय फिल्म और टेलीविजन इतिहास का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट (Turning Point) साबित हुआ। इस हादसे के बाद ही भारत में फिल्म स्टूडियोज, ओटीटी और टीवी शोज के सेट पर फायर सेफ्टी रूल्स (Fire Safety Norms), इंश्योरेंस पॉलिसी और इमरजेंसी एग्जिट्स को अनिवार्य बनाया गया।
दूरदर्शन का वह शो आज भी जहां अपनी भव्यता और टीपू सुल्तान की गाथा के लिए याद किया जाता है, वहीं उसके सेट पर हुई वह दर्दनाक घटना भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक काले पन्ने के रूप में दर्ज है।