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September 14 2026 04:50 pm

बौद्ध स्थलों के विकास के वादों पर घिरा सपा का अतीत: पूर्व डीजीपी बृजलाल ने याद दिलाया 2012 का बुद्धा पार्क कांड

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उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों के बीच वादों और दावों की होड़ शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा सत्ता में आने पर प्रदेश के बौद्ध तीर्थस्थलों और स्मारकों के कायाकल्प करने के वादे के बाद राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। सपा के इस नए चुनावी रुख पर भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) बृजलाल ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने सपा के शासनकाल के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सामने रखते हुए दावा किया है कि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के चलते बौद्ध अनुयायियों और दलित महापुरुषों के प्रतीकों का सपा राज में लगातार अपमान हुआ, ऐसे में अब बौद्ध सर्किट और स्थलों के विकास की बातें महज एक छलावा हैं।

17 अगस्त 2012 का बुद्धा पार्क कांड: जब टूटी थी भगवान बुद्ध की प्रतिमा

पूर्व डीजीपी बृजलाल ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की एक खौफनाक घटना का ब्योरा साझा करते हुए कहा कि 17 अगस्त 2012 को राजधानी लखनऊ में जो कुछ हुआ, वह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी।

उस दिन लखनऊ की टीले वाली मस्जिद में अलविदा की नमाज के बाद म्यांमार (बर्मा) में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में एक उग्र भीड़ सड़कों पर उतर आई थी। इस भीड़ ने लखनऊ के प्रसिद्ध बुद्धा पार्क पर धावा बोल दिया, भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर चढ़कर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया और आसपास की दुकानों व बौद्ध प्रतीकों को तहस-नहस कर दिया।

भंते अशोकानंद और भिक्षुओं पर हमला, फिर भी नहीं हुई थी कार्रवाई

बृजलाल ने आरोप लगाया कि उस दौरान भीड़ ने केवल प्रतिमा को ही निशाना नहीं बनाया, बल्कि वहां मौजूद बौद्ध संत भंते श्री अशोकानंद जी और उनके शिष्यों पर प्राणघातक हमला किया। उनके कपड़े फाड़े गए, उनकी तीन गाड़ियां तोड़ दी गईं और बौद्ध भिक्षुओं के चीवर (भगवा वस्त्र) का अपमान किया गया।

उन्होंने सवाल उठाया कि म्यांमार के विवाद का बदला लखनऊ में बुद्ध की प्रतिमा तोड़कर और बौद्ध भिक्षुओं को लहूलुहान करके क्यों लिया गया? भंते अशोकानंद द्वारा हजरतगंज थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने के बावजूद अखिलेश सरकार ने वोट बैंक और तुष्टिकरण के दबाव में दंगाइयों के खिलाफ कोई कठोर दंडात्मक या एनएसए (NSA) जैसी कार्रवाई नहीं की। भीड़ चौक से लेकर संवेदनशील हजरतगंज और विधानसभा मार्ग तक तोड़फोड़ करती रही, लेकिन पुलिस को सख्ती से रोकने के आदेश तक नहीं दिए गए थे।

आंबेडकर और दलित प्रतीकों के नाम बदलने का भी उठा मुद्दा

पूर्व पुलिस महानिदेशक ने केवल बुद्धा पार्क की घटना ही नहीं, बल्कि सपा शासन में दलित और बौद्ध चेतना से जुड़े प्रतीकों की अनदेखी का भी विस्तृत ब्योरा दिया:

कन्नौज मेडिकल कॉलेज: बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर बने कन्नौज मेडिकल कॉलेज से बाबा साहेब का नाम हटा दिया गया था।

जनेश्वर मिश्रा पार्क: गोमती नगर में बाबा साहेब आंबेडकर ग्रीन गार्डन का नाम बदलकर जनेश्वर मिश्रा पार्क कर दिया गया।

गाजियाबाद हज हाउस प्रसंग: सितंबर 2016 में गाजियाबाद हज हाउस के उद्घाटन समारोह में जब तत्कालीन कद्दावर सपा नेता आजम खान ने मंच से बाबा साहेब को लेकर विवादित टिप्पणी की थी, तब अखिलेश यादव ने उन्हें रोकने के बजाय खामोशी साधे रखी थी।

कथनी और करनी के अंतर पर तीखे सवाल

बृजलाल ने कहा कि जहां केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की योगी सरकार ने बाबा साहेब के सम्मान में 'पंच तीर्थ' का निर्माण कराया और कुशीनगर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की स्थापना के साथ बौद्ध सर्किट को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित किया, वहीं सपा सरकार के समय बौद्ध धर्मस्थलों की सुरक्षा तक दांव पर लगी रही।

उन्होंने कहा कि जब तक समाजवादी पार्टी अपने पिछले शासनकाल के इन ऐतिहासिक कृत्यों और तुष्टिकरण की नीति पर स्पष्ट जवाब नहीं देती, तब तक अखिलेश यादव द्वारा बौद्ध तीर्थस्थलों के संरक्षण और 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के दावों को दलित और बौद्ध समाज केवल चुनावी भ्रमजाल ही मानेगा।