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September 14 2026 05:20 pm

वैश्विक मंच पर घिरते ही पलटे शहबाज शरीफ, चौतरफा दबाव के बाद अब साध रहे कूटनीतिक पैंतरे

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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बड़ी-बड़ी डींगें हांकने और मंचों पर आक्रामक रुख दिखाने वाले पाकिस्तान की एक बार फिर वैश्विक पटल पर पोल खुल गई है। पहले अपनी शर्तों और बयानों को लेकर अड़ियल रुख अपनाने वाला इस्लामाबाद अब अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक आर्थिक बदहाली के आगे पूरी तरह बैकफुट पर आ गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वादे करके मुकरने और अपनी बात से पलटने के अपने पुराने ढर्रे को दोहराते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का रुख अचानक नरम पड़ गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) सत्र के दौरान वाशिंगटन और प्रमुख पश्चिमी ताकतों को रिझाने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान अब कूटनीतिक खुशामद और गिड़गिड़ाने की रणनीति पर उतर आए हैं।

पहले तीखे तेवर, फिर वैश्विक मंच पर फजीहत

बीते कुछ समय से पाकिस्तान अपनी घरेलू जनता का ध्यान भटकाने के लिए सीमा पार आतंकवाद, क्षेत्रीय समझौतों और भारत को लेकर लगातार आक्रामक बयानबाजी कर रहा था। मक्का रक्षा समझौते की आड़ में खुद को मुस्लिम जगत का नेतृत्वकर्ता दिखाने और सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की मांग को लेकर पाकिस्तान ने जमकर हवाबाजी की थी।

हालांकि, ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के साझा घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाए जाने और नई दिल्ली द्वारा 1960 की सिंधु जल संधि को आतंकवाद के खात्मे तक कड़ाई से स्थगित रखे जाने के फैसले ने पाकिस्तान के होश उड़ा दिए। भारत के दृढ़ संकल्प और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते अलगाव के बाद शहबाज सरकार की सारी आक्रामकता धरी की धरी रह गई और अब वे दुनिया के सामने खुद को 'बातचीत का हिमायती' दिखाने का ढोंग रच रहे हैं।

आईएमएफ की शर्तें और खाली खजाने का डर

पाकिस्तान के इस यू-टर्न के पीछे सबसे बड़ी मजबूरी उसका खाली खजाना और गहराता वित्तीय संकट है:

आईएमएफ की सख्त निगरानी: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिलने वाली अगली किस्तों और बेलआउट पैकेज के लिए पाकिस्तान को हर हाल में अमेरिकी और पश्चिमी समर्थन की जरूरत है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर संकट: देश का विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर झूल रहा है और कर्ज चुकाने के लिए भी नए कर्ज लेने पड़ रहे हैं।

महंगाई और ऊर्जा संकट: पेट्रोल, डीजल और बिजली की आसमान छूती कीमतों ने आम जनता में आक्रोश भर दिया है, जिससे शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार की जमीन खिसक रही है।

ऐसे में किसी भी बड़े देश से टकराने की हैसियत न होने के कारण शहबाज शरीफ अब अमेरिकी नेतृत्व और वित्तीय संस्थानों के सामने अपनी मजबूरियों का वास्ता देकर कूटनीतिक गुहार लगा रहे हैं।

जबान देकर पलटने का पुराना इतिहास

राजनयिक विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों, एफएटीएफ (FATF) की प्रतिबद्धताओं और द्विपक्षीय आश्वासनों से मुकरना पाकिस्तान की पुरानी फितरत रही है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय प्रतिबंधों या सख्त कार्रवाई का खतरा मंडराता है, पाकिस्तान शांति और सहयोग की कसमें खाने लगता है।

लेकिन जैसे ही दबाव थोड़ा कम होता है या विदेशी मदद हाथ लग जाती है, वह तुरंत अपनी पुरानी आतंकी और भड़काऊ नीतियों पर लौट आता है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान शहबाज शरीफ का अचानक बदला हुआ और नरम मिजाज इसी दोहरे चरित्र का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका मकसद केवल तात्कालिक कूटनीतिक व आर्थिक राहत पाना है।

दुनिया ने समझा पाकिस्तान का पैंतरा

हालांकि, अब वैश्विक समुदाय पाकिस्तान की इस दोहरी चाल को भली-भांति समझने लगा है। चाहे अमेरिका का कड़ा रुख हो या फिर खाड़ी देशों द्वारा आर्थिक मदद के बदले कड़े वित्तीय सुधारों की शर्त रखना, पाकिस्तान की इस 'हवाबाजी' को अब कहीं से भी खुली छूट मिलती नहीं दिख रही है। भारत ने भी स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, जिससे शहबाज शरीफ की कूटनीतिक पैंतरेबाजी पूरी तरह बेअसर साबित हो रही है।