हरियाली अमावस्या पर पूर्ण सूर्य ग्रहण का साया, जानिए पितरों का तर्पण, पवित्र नदी स्नान और दान किस समय करना होगा शुभ
सनातन धर्म परंपरा में सावन मास की अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और पितृ कर्मों की दृष्टि से अत्यंत पावन स्थान है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और पितरों के निमित्त तर्पण व श्राद्ध कर्म करने से साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है। हालांकि, इस बार हरियाली अमावस्या पर लगने जा रहे पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Solar Eclipse) के कारण श्रद्धालुओं और साधकों के बीच स्नान, दान और पितृ तर्पण के सही समय को लेकर गहरा संशय बना हुआ है। शास्त्रों और ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार सूर्य ग्रहण के दौरान लगने वाले 'सूतक काल' में सभी प्रकार के धार्मिक, मांगलिक, पूजा-पाठ और स्पर्श कर्म पूरी तरह से वर्जित माने जाते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद आवश्यक हो जाता है कि ग्रहण काल के नियमों का पालन करते हुए पितरों की तृप्ति का कार्य और अमावस्या का पवित्र स्नान-दान कब और किस समय करना सबसे शुभ और फलदायी रहेगा।
हरियाली अमावस्या और पूर्ण सूर्य ग्रहण का धार्मिक व ज्योतिषीय संयोग
वैदिक पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि के स्वामी स्वयं पितृ देव माने गए हैं, जबकि सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो समस्त जगत को ऊर्जा प्रदान करते हैं। सूर्य को पितरों का कारक ग्रह भी माना जाता है। जब हरियाली अमावस्या जैसी पावन तिथि पर पूर्ण सूर्य ग्रहण का दुर्लभ संयोग बनता है, तो इसका प्रभाव पृथ्वी, प्रकृति और मानव जीवन पर बहुत गहरा पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार सूर्य ग्रहण तब घटित होता है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में आकर सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह से ढक लेता है। भले ही कोई सूर्य ग्रहण भारत में दृश्यमान (visible) हो या न हो, लेकिन खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अमावस्या तिथि पर ग्रहण का प्रभाव सूक्ष्म रूप से बना रहता है। यदि ग्रहण भारत में दृश्यमान होता है, तो उसका सूतक काल ग्रहण शुरू होने से ठीक 12 घंटे (4 पहर) पूर्व प्रारंभ हो जाता है, जिस दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या मूर्ति स्पर्श नहीं किया जाता है।
पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म कब और कैसे करें?
शास्त्रों में विधान है कि पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और तिल-जल अर्पण का कार्य हमेशा दोपहर के समय यानी 'कुतूप काल' या 'रोहिण काल' में किया जाता है। सूर्य ग्रहण के दिन तर्पण करने के लिए समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:
सूतक काल से पूर्व या ग्रहण समाप्ति के बाद: यदि ग्रहण का सूतक काल दोपहर के समय प्रभावी है, तो पितरों का तर्पण ग्रहण काल के दौरान कभी न करें। इस स्थिति में शास्त्रों का निर्देश है कि तर्पण का कार्य या तो सूतक काल शुरू होने से पहले सुबह-सुबह निपटा लिया जाए अथवा सूर्य ग्रहण समाप्त होने के तुरंत बाद मोक्ष काल (ग्रहण समाप्ति) में पवित्र स्नान करके किया जाए।
तर्पण की सही विधि: यदि आप घर पर तर्पण कर रहे हैं, तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में कुश की अंगूठी (पवित्री) धारण करें और काले तिल, जल व कच्चे दूध से पितरों को अंजलि दें। ग्रहण काल के प्रभाव को शांत करने के लिए तर्पण के जल में तुलसी दल (यदि सूतक से पहले तोड़ा गया हो) या कुशा अवश्य मिलाएं।
मंत्र एवं मानसिक जप: ग्रहण काल के दौरान बोलकर पूजा या तर्पण करने के बजाय मन ही मन 'ॐ पितृभ्यः नमः' या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का निरंतर जप करते रहें। ग्रहण काल में किया गया मानसिक जप और ध्यान पितरों को असीम शांति प्रदान करता है।
अमावस्या स्नान और पुण्य दान का सही शुभ मुहूर्त
अमावस्या तिथि पर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा) में स्नान करने का बहुत बड़ा महात्म्य है। ग्रहण के दिन स्नान और दान के नियम सामान्य दिनों से थोड़े भिन्न होते हैं:
ग्रहण पूर्व स्नान (वेध स्नान): सूतक काल लगने से पूर्व प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे शरीर और मन शुद्ध हो जाते हैं।
ग्रहण समाप्ति के बाद का स्नान (मोक्ष स्नान): ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य ग्रहण की समाप्ति होते ही तुरंत स्नान करना अति आवश्यक होता है। इसे 'मोक्ष स्नान' कहा जाता है। नदी, सरोवर या घर में ही जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करने से ग्रहण का सारा नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है और शरीर में नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
महादान का समय: सूर्य ग्रहण के दिन दान देने का सबसे उत्तम समय ग्रहण की समाप्ति (मोक्ष काल) के तुरंत बाद माना गया है। ग्रहण समाप्त होने के बाद ही दान की सामग्रियों का स्पर्श करें। हरियाली अमावस्या पर काले तिल, अनाज (गेहूं, चावल), गुड़, काले वस्त्र, जूते-चप्पल, छाता और तांबे के बर्तनों का दान करना पितृ दोष और राहू-केतु के अशुभ प्रभावों से मुक्ति दिलाता है।
ग्रहण काल और हरियाली अमावस्या पर ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण सावधानियां
हरियाली अमावस्या और सूर्य ग्रहण के इस पावन संयोग पर कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है ताकि किसी भी तरह का दोष न लगे। ग्रहण काल के दौरान पका हुआ भोजन न करें और न ही खाएं। पहले से बने हुए भोजन, पानी और दूध में कुशा या तुलसी के पत्ते डालकर रखें, जिससे उन पर ग्रहण की नकारात्मक किरणों का असर न हो (ध्यान रहे कि तुलसी पत्र सूतक काल शुरू होने से पहले ही तोड़ लें)। गर्भवती महिलाओं को ग्रहण काल के दौरान घर के अंदर ही रहना चाहिए और चाकू, कैंची या सुई जैसी नुकीली वस्तुओं का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए। ग्रहण के दौरान सोना, भोजन करना और पूजा की मूर्तियों को छूना पूरी तरह से वर्जित है। ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, मंदिर की सफाई करें, देवी-देवताओं को स्नान कराकर नया वस्त्र पहनाएं और फिर स्वयं भी स्नान करके समर्थानुसार गरीबों व ब्राह्मणों को भोजन व अन्न का दान करें।