'विराट कोहली होते तो नतीजा कुछ और होता': कोलंबो टेस्ट ड्रॉ होने पर भड़के मोहम्मद कैफ; रक्षात्मक कप्तानी पर उठाए तीखे सवाल
कोलंबो/नई दिल्ली: श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो के ऐतिहासिक आर. प्रेमदासा/सिंहली स्पोर्ट्स क्लब मैदान पर खेला गया रोमांचक टेस्ट मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त होने के बाद भारतीय क्रिकेट जगत में तीखी बहस छिड़ गई है। मैच के पांचवें और अंतिम दिन जब भारतीय टीम जीत की प्रबल दावेदार नजर आ रही थी और श्रीलंकाई टीम पर पूरी तरह दबाव बनाया जा सकता था, उस समय भारतीय गेंदबाजी और कप्तानी की रक्षात्मक रणनीति के कारण मुकाबला बेनतीजा समाप्त हो गया। इस परिणाम से पूर्व भारतीय दिग्गज क्रिकेटर और कमेंटेटर मोहम्मद कैफ का गुस्सा फूट पड़ा है। एक खेल शो और अपने आधिकारिक सोशल मीडिया चैनल पर विश्लेषण करते हुए मोहम्मद कैफ ने टीम इंडिया की बॉडी लैंग्वेज और नेतृत्व क्षमता को आड़े हाथों लिया। कैफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि इस टेस्ट मैच में पूर्व कप्तान विराट कोहली मैदान पर नेतृत्व कर रहे होते, तो मैच का नतीजा ड्रॉ नहीं बल्कि भारत की एक ऐतिहासिक और धमाकेदार जीत होती।
'कोहली होते तो नतीजा कुछ और होता': कोलंबो टेस्ट ड्रॉ होने पर मोहम्मद कैफ का फूटा गुस्सा
मैच खत्म होने के तुरंत बाद अपनी बेबाक और तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मोहम्मद कैफ ने कहा कि टेस्ट क्रिकेट केवल पांच दिनों तक गेंद और बल्ले से औपचारिकता पूरी करने का खेल नहीं है, बल्कि यह अंतिम सत्र तक विरोधी टीम के पसीने छुड़ाने और जीत छीनने का नाम है।
कैफ ने कहा, "जब आपको पता था कि मैच के अंतिम दिन पिच पर दरारें पड़ चुकी हैं, गेंद तेजी से टर्न और बाउंस हो रही है, तब आपकी सोच हर हाल में 10 विकेट झटकने की होनी चाहिए थी। लेकिन मैदान पर भारतीय टीम की जो मानसिकता दिखाई दी, वह बेहद निराशाजनक थी। हम मैच जीतने के लिए नहीं, बल्कि केवल रन रोकने के लिए फील्डिंग सजा रहे थे। मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि अगर आज मैदान पर विराट कोहली कप्तानी कर रहे होते, तो वे ड्रॉ के लिए कभी नहीं जाते। कोहली हर एक श्रीलंकाई बल्लेबाज के कान में सांसें ले रहे होते, सिली पॉइंट और लेग स्लिप में तीन-तीन फील्डर खड़े होते और टीम हर गेंद पर विकेट के लिए अपील कर रही होती। विराट की गैर-मौजूदगी में वह आक्रामकता और आग पूरी तरह गायब दिखी।"
अंतिम दिन नहीं चटका सके 10 विकेट: रणनीति और फील्ड प्लेसमेंट की खुली पोल
मुकाबले के अंतिम दिन भारतीय टीम को जीत के लिए विपक्षी टीम को ऑलआउट करना था, जबकि श्रीलंका को मैच बचाने के लिए लगभग 75 से 80 ओवर क्रीज पर टिकना था। पिच पूरी तरह से स्पिनरों के अनुकूल हो चुकी थी और भारतीय टीम के पास इन-फॉर्म स्पिन आक्रमण मौजूद था।
इसके बावजूद श्रीलंकाई पुछल्ले बल्लेबाजों और मध्यक्रम ने भारतीय गेंदबाजों को आसानी से थका दिया। कैफ ने तकनीकी गलतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब श्रीलंकाई बल्लेबाज संघर्ष कर रहे थे, तब भारतीय कप्तान ने डीप प्वाइंट, डीप स्क्वायर लेग और लॉन्ग-ऑन पर फील्डर तैनात कर दिए। इससे श्रीलंकाई बल्लेबाजों को आसानी से सिंगल लेकर स्ट्राइक बदलने का मौका मिला। कैफ ने सवाल उठाया कि जब विरोधी टीम 350 या 400 रनों के लक्ष्य का पीछा ही नहीं कर रही थी और केवल मैच ड्रॉ कराने के लिए खेल रही थी, तो फिर बाउंड्री बचाने के लिए फील्डर पीछे रखने का क्या औचित्य था? कप्तान को केवल बल्लेबाजों के इर्द-गिर्द कैचिंग फील्डर्स का जाल बिछाना चाहिए था ताकि हर गेंद पर आउट होने का खौफ पैदा किया जा सके।
विराट कोहली का वो '60 मिनट का खौफ': कैफ ने क्यों दिलाई लॉर्ड्स और ओवल की याद?
मोहम्मद कैफ ने भारतीय टेस्ट क्रिकेट के इतिहास के उन सुनहरे पलों का जिक्र किया जब विराट कोहली की आक्रामक कप्तानी ने हारी हुई या ड्रॉ होती बाजियों को ऐतिहासिक जीत में बदल दिया था। कैफ ने 2021 के ऐतिहासिक लॉर्ड्स टेस्ट और ओवल टेस्ट का विशेष रूप से उदाहरण दिया।
कैफ ने याद दिलाते हुए कहा, "लॉर्ड्स में इंग्लैंड के खिलाफ जब भारत के पास महज 60 ओवर बचे थे, तब विराट कोहली ने हडल में अपनी टीम से कहा था कि अगले 60 ओवर इन 11 अंग्रेजों को नर्क जैसा महसूस होना चाहिए। और भारतीय टीम ने ठीक वही किया—हर खिलाड़ी एक शेर की तरह लड़ा और इंग्लैंड को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। टेस्ट क्रिकेट में कप्तानी केवल गेंदबाजी परिवर्तन करने का नाम नहीं है, बल्कि कप्तानी वह जज्बा है जो आप अपने 10 अन्य खिलाड़ियों के भीतर फूंकते हैं। कोहली कभी भी ड्रॉ से संतुष्ट नहीं होते थे; वे हारने का जोखिम उठाकर भी मैच जीतने के लिए जाते थे। आज की भारतीय टीम में उसी निर्भीक और आक्रामक डीएनए की भारी कमी महसूस हो रही है।"
शुभमन गिल और गंभीर की जोड़ी पर उठे सवाल: क्या कप्तानी में दिखी अनुभवहीनता?
श्रीलंका दौरे पर भारतीय टीम की कप्तानी संभाल रहे युवा बल्लेबाज शुभमन गिल और मुख्य कोच गौतम गंभीर की रणनीति भी इस ड्रॉ के बाद सवालों के घेरे में आ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि गिल एक बेहतरीन बल्लेबाज हैं, लेकिन टेस्ट मैच के पांचवें दिन के अत्यधिक दबाव, फील्ड मैनिपुलेशन और आक्रामक चालों के मामले में वे पूरी तरह अनुभवहीन नजर आए।
कैफ ने कहा कि जब गेंदबाज लगातार एक ही लेंथ पर गेंद डाल रहे थे और श्रीलंकाई बल्लेबाज आराम से फ्रंट-फुट डिफेंस कर रहे थे, तब कप्तान की ओर से कोई लीक से हटकर (Out of the Box) फैसला देखने को नहीं मिला। न तो फील्डिंग में कोई असामान्य बदलाव किया गया और न ही बल्लेबाजों की एकाग्रता तोड़ने के लिए कोई मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया गया। कोच गौतम गंभीर जो खुद अपने खेल के दिनों में बेहद आक्रामक रहे हैं, उनके कार्यकाल में भारतीय टीम का इस तरह रक्षात्मक होकर मैच को हाथ से फिसलने देना क्रिकेट प्रेमियों के गले नहीं उतर रहा है।
WTC फाइनल की राह हुई पेचीदा: एक ड्रॉ से भारत को कितना बड़ा नुकसान?
आईसीसी वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC 2025-27) के मौजूदा चक्र में किसी भी टेस्ट मैच का ड्रॉ होना वास्तव में एक हार जैसा नुकसान पहुंचाता है। टेस्ट जीतने पर टीम को जहां पूरे 12 अंक (100% अंक प्रतिशत) मिलते हैं, वहीं मैच ड्रॉ होने पर दोनों टीमों को केवल 4-4 अंक (33.3% अंक प्रतिशत) से संतोष करना पड़ता है।
श्रीलंका जैसी निचली रैंकिंग वाली टीम के खिलाफ ड्रॉ खेलने के कारण भारत के पीसीटी (PCT - Points Percentage System) को भारी झटका लगा है। आने वाले महीनों में भारतीय टीम को न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीमों के खिलाफ उनके घरेलू मैदानों पर कठिन टेस्ट सीरीज खेलनी है। उपमहाद्वीप की अनुकूल पिचों पर पूरे अंक न जुटा पाना भारतीय टीम को डब्ल्यूटीसी फाइनल की दौड़ से बाहर कर सकता है। कैफ ने चेतावनी दी कि यदि भारतीय टीम ने समय रहते इन चूकों से सबक नहीं लिया, तो टेबल में टॉप-2 में बने रहना नामुमकिन हो जाएगा।
टेस्ट क्रिकेट में 'ड्रॉ' स्वीकार्य नहीं: टीम इंडिया को बदलना होगा अपना रवैया
अपने विस्तृत विश्लेषण के अंत में मोहम्मद कैफ ने स्पष्ट किया कि भारतीय क्रिकेट को आधुनिक टेस्ट प्रारूप के अनुसार अपनी मानसिकता को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। आज की दुनिया में इंग्लैंड की 'बैजबॉल' शैली और ऑस्ट्रेलिया का आक्रामक दृष्टिकोण यह दिखाता है कि टेस्ट क्रिकेट में रक्षात्मक सोच की कोई जगह नहीं बची है।
कैफ ने कहा कि भारतीय टीम के पास दुनिया का सर्वश्रेष्ठ टैलेंट, बेहतरीन तेज गेंदबाज और मैच-विनर स्पिनर्स मौजूद हैं। कमी केवल उस भूख और निर्दयी आक्रामकता (Ruthless Aggression) की है जो कभी टीम इंडिया की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी। कोलंबो टेस्ट का यह ड्रॉ भारतीय थिंक-टैंक के लिए एक वेक-अप कॉल है कि जब तक मैदान पर जीत की भूख नहीं होगी, तब तक प्रतिभा के दम पर भी मैच नहीं जीते जा सकते।