छात्रों के ऐतिहासिक आंदोलन के आगे झुकी देवेंद्र फडणवीस सरकार: 17 दिनों से अनशन पर बैठे आदिवासी (ST) छात्रों की सभी मांगें मंजूर
मुंबई/पुणे: महाराष्ट्र में अपने संवैधानिक अधिकारों, रोजगार और आवासीय छात्रावासों में बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर पिछले 17 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे आदिवासी (ST) छात्र-छात्राओं के ऐतिहासिक और चट्टानी आंदोलन के सामने आखिरकार राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार को झुकना पड़ा है। पुणे के मांजरी हॉस्टल, नागपुर और नासिक में लगातार जारी आमरण अनशन और छात्रों की बिगड़ती तबीयत के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में छात्र प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय मैराथन बैठक की और उनकी सभी प्रमुख मांगों को सैद्धांतिक व प्रशासनिक रूप से स्वीकार करने का ऐलान किया। बैठक के बाद राज्य के आदिवासी विकास मंत्री डॉ. अशोक उइके ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि सरकार ने छात्रों की भर्ती, रोस्टर प्रणाली और हॉस्टल सुधार से जुड़ी सभी मांगों को मान लिया है। इस बड़े नीतिगत फैसले के बाद छात्र संगठनों ने अपना 17 दिनों से चल रहा अनशन समाप्त करने की घोषणा की है, जिससे राज्य भर के लाखों आदिवासी युवाओं में राहत और उत्साह की लहर दौड़ गई है।
17 दिनों का अनशन और मंत्रालय में मैराथन बैठक: सरकार ने मानी सभी मांगें
पुणे के मांजरी स्थित आदिवासी बालक-बालिका छात्रावास परिसर में शुरू हुआ यह अनशन देखते ही देखते पूरे महाराष्ट्र के आदिवासी युवाओं का एक बड़ा जनआंदोलन बन गया था। कई दिनों तक अन्न-जल त्यागने के कारण कई छात्र-छात्राओं की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ने लगी थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। इसके बावजूद छात्र अपनी मांगों पर अड़े रहे।
शनिवार को पुणे से छात्रों का एक विशेष प्रतिनिधिमंडल मंत्रालय पहुंचा, जहां मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के बीच घंटों बातचीत हुई। बैठक के बाद मंत्री अशोक उइके ने संवाददाताओं को बताया, "मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने छात्रों की सभी मांगों पर बेहद सकारात्मक और संवेदनशील रुख अपनाया है। छात्रों द्वारा रखे गए सभी मुद्दों को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। यही नहीं, मुख्यमंत्री ने यह भी भरोसा दिया है कि लिए गए फैसलों के जमीनी क्रियान्वयन (Implementation) की समीक्षा के लिए ठीक तीन महीने बाद दोबारा समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी ताकि किसी भी स्तर पर कोई प्रशासनिक बाधा न आए।"
क्यों अनशन पर बैठे थे ST छात्र? गढ़चिरौली की दर्दनाक घटना से भड़का था आक्रोश
इस व्यापक छात्र आंदोलन की शुरुआत के पीछे केवल प्रशासनिक मांगें नहीं थीं, बल्कि आदिवासी आश्रम शालाओं और छात्रावासों में वर्षों से व्याप्त घोर लापरवाही और बदहाली का गहरा दर्द था। आंदोलन की चिंगारी उस समय भड़की जब महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली जिले के एक सरकारी आदिवासी आवासीय आश्रम स्कूल में रात को सोते समय जहरीले सांप के काटने से तीन मासूम आदिवासी छात्राओं की तड़प-तड़प कर मौत हो गई।
इस हृदयविदारक घटना ने आदिवासी विकास विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों और आश्रम शालाओं की सुरक्षा व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। छात्रों ने आरोप लगाया कि सुदूर क्षेत्रों के हॉस्टलों में खिड़कियां-दरवाजे टूटे हुए हैं, प्राथमिक चिकित्सा व एंटी-वेनम दवाओं का अभाव है और बच्चों को कीड़े-मकोड़ों व सांपों के खौफ के बीच जमीन पर सोने को मजबूर किया जाता है। इसके अलावा, छात्रों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता (सेंट्रल किचन बनाम डीबीटी), स्वच्छता और सुरक्षा के मुद्दों पर छात्रों का धैर्य टूट गया और उन्होंने पुणे, नागपुर व नासिक में एक साथ अनशन का बिगुल फूंक दिया।
'पॉइंट रोस्टर' और पेसा (PESA) भर्ती पर सरकार का बड़ा नीतिगत फैसला
आंदोलनकारी छात्रों की सबसे प्रमुख और रणनीतिक मांग सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सही क्रियान्वयन और 'पॉइंट रोस्टर' में अनुसूचित जनजाति (ST) को उनका वाजिब हक दिलाने को लेकर थी। छात्रों की मांग थी कि सरकारी संकल्प (GR) के अनुसार 100-पॉइंट रोस्टर में एसटी वर्ग को दूसरे स्थान पर रखा जाए।
आदिवासी विकास मंत्री ने स्पष्ट किया कि पॉइंट रोस्टर को लेकर सरकार ने पहले ही एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित कर दी है और समिति की सिफारिशें अगले तीन महीनों के भीतर आ जाएंगी, जिसके आधार पर रोस्टर में उचित सुधार लागू किया जाएगा। इसके अलावा, 'पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम' यानी पेसा (PESA) और गैर-पेसा क्षेत्रों में रुकी हुई भर्तियों को लेकर भी ऐतिहासिक निर्णय हुआ। मंत्री ने बताया कि पेसा के तहत आने वाले 17 संवर्गों (Cadres) में से 9 संवर्गों की भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि शेष बचे सभी 8 संवर्गों की भर्ती तुरंत शुरू करने के सख्त निर्देश जारी कर दिए गए हैं।
हॉस्टल प्रवेश में उम्र सीमा खत्म और बॉम्बे हाई कोर्ट का कड़ा रुख
छात्रों के आंदोलन का एक और बड़ा मुद्दा आदिवासी छात्रावासों में प्रवेश के लिए लगाई गई कठोर उम्र सीमा (Age Limit) का था, जिसके चलते उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कई जरूरतमंद आदिवासी छात्र हॉस्टल की सुविधा से वंचित हो रहे थे। छात्रों की मांग के दबाव में सरकार ने हॉस्टल प्रवेश से आयु सीमा के इस प्रतिबंधात्मक नियम को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
इस बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए कड़ा रुख अपनाया था। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखड की खंडपीठ ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था कि वह अनशन कर रहे छात्रों के स्वास्थ्य और कल्याण को हर हाल में सुनिश्चित करे। अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि वे व्यवस्था की अनदेखी के चलते किसी भी युवा छात्र की जान जाते हुए नहीं देखना चाहते। अदालत के इस सख्त रुख ने भी सरकार पर त्वरित समाधान निकालने का दबाव बढ़ाया।
सियासी हलचल और विपक्ष का दबाव: राहुल गांधी से लेकर रोहित पवार तक का समर्थन
इस आंदोलन ने महाराष्ट्र के सियासी पारे को भी गरमा दिया था। पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के दौरान एक आदिवासी छात्रा ने मंच पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के सामने हॉस्टल की बदहाली, सुरक्षा और अपमानजनक नियमों का मुद्दा उठाया था। इसके बाद राहुल गांधी ने सीधे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर आदिवासी छात्रों की मांगों पर तुरंत संज्ञान लेने और उम्र सीमा हटाने की मांग की थी।
इसके अलावा एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) के विधायक रोहित पवार, भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) और कई सामाजिक व आदिवासी संगठनों ने अनशन स्थल पर पहुंचकर छात्रों को खुला समर्थन दिया था। छात्र प्रतिनिधियों ने मांगों के स्वीकार होने के बाद विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।
3 महीने बाद होगी फैसलों की समीक्षा: छात्रों की जीत से खुला नया अध्याय
महाराष्ट्र सरकार द्वारा सभी मांगों पर लिखित सहमति जताए जाने और तीन महीने के भीतर प्रगति की समीक्षा के लिए विशेष बैठक के वादे के बाद छात्र प्रतिनिधियों ने अनशन समाप्त करने का औपचारिक निर्णय लिया। आदिवासी विकास विभाग ने सभी जिलाधिकारियों और हॉस्टल अधीक्षकों को आश्रम शालाओं में सुरक्षा ऑडिट कराने, मेडिकल सुविधाएं बहाल करने और डीबीटी फंड समय पर जारी करने के निर्देश दिए हैं।
17 दिनों तक धूप, बारिश और शारीरिक कष्ट सहकर छात्रों द्वारा लड़ी गई यह लड़ाई इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब छात्र एकजुट होकर अपने वैध अधिकारों के लिए खड़े होते हैं, तो सत्ता को उनकी आवाज सुननी ही पड़ती है। फडणवीस सरकार के इस फैसले से राज्य के लाखों आदिवासी छात्र-छात्राओं के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य को एक नई दिशा और सुरक्षा मिली है।