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September 05 2026 01:57 am

मौत के जबड़े से 216 घंटे बाद लौटी जिंदगी: अंधेरी सुरंग में 9 दिन तक मलबे के नीचे घुटती सांसों के बीच कैसे संजीवनी बना 'महामंत्र'

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जमीन से दर्जनों फीट नीचे जब चारों तरफ सैकड़ों टन वजनी कंक्रीट और नुकीले पत्थरों का मलबा गिर जाए, बाहर निकलने के सारे रास्ते एक सेकंड में बंद हो जाएं और रोशनी की एक किरण तक न बचे, तो इंसान का दिल और दिमाग जवाब देने लगता है। ऐसी ही रूह कंपा देने वाली स्थिति में एक शख्स ने पूरे 9 दिन यानी 216 घंटे तक मौत की आंखों में आंखें डालकर जंग लड़ी। निर्माण कार्य के दौरान अचानक धंस गई पहाड़ी ने उसे एक अंधेरे, नम और संकरे कालकोठरी जैसे गड्ढे में कैद कर दिया था। जब बचाव दल ने उसे मलबे को चीरते हुए बाहर निकाला, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। सुरक्षित बाहर आते ही उसने जो दास्तान बयां की, उसने डॉक्टरों, इंजीनियरों और आपदा प्रबंधन के अनुभवी अधिकारियों को भी हैरान कर दिया है।

घुप अंधेरा, टपकता पानी और गिरता ऑक्सीजन: भूख और खौफ से कैसे लड़ी गई जंग?

हादसा उस वक्त हुआ जब सुरंग के अंदर नियमित ड्रिलिंग और खुदाई का काम चल रहा था। अचानक तेज गड़गड़ाहट के साथ पूरी छत नीचे आ गिरी। कुछ ही सेकंड में चारों ओर केवल धूल का गुबार और सन्नाटा पसर गया। जब धूल थोड़ी छंटी, तो सर्वाइवर ने महसूस किया कि वह चारों तरफ से बड़े-बड़े बोल्डर से घिर चुका है और खड़ा होने तक की जगह नहीं बची है। सुरंग के भीतर तापमान लगातार गिर रहा था और पत्थरों की दरारों से रिसता ठंडा पानी उसके शरीर को जमा रहा था। उसके पास न तो खाने के लिए एक दाना था और न ही पीने का साफ पानी।

ऐसी परिस्थिति में सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन की कमी और शारीरिक ऊर्जा को बनाए रखना था। उसने पत्थरों की दरारों से रिसकर बूंद-बूंद टपकते भूमिगत पानी को अपनी हथेलियों में समेटकर हलक को गीला किया। उसने तय किया कि वह चिल्लाने या बेवजह हलचल करने में अपनी सांसें और ऊर्जा बर्बाद नहीं करेगा। संकरे स्थान में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर न बढ़े, इसलिए उसने उथली और धीमी सांसें लेना शुरू किया। हर बीतता घंटा मानो एक सदी के बराबर लग रहा था, लेकिन उसने अपनी आंखों के सामने अपनी बूढ़ी मां, पत्नी और बच्चों के चेहरों को ओझल नहीं होने दिया।

'मन हार जाता तो शरीर हार जाता': महामंत्र का निरंतर जाप और अटूट मानसिक संतुलन

मेडिकल साइंस और मानव मनोविज्ञान का मानना है कि पूर्ण अंधकार और एकांत में 48 से 72 घंटे बिताने के बाद इंसान मानसिक संतुलन खोने लगता है। उसे अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देने लगती हैं और मतिभ्रम (Hallucination) का शिकार होकर वह पैनिक अटैक में दम तोड़ देता है। लेकिन इस शख्स ने अपने दिमाग को भटकने से रोकने के लिए अपने आध्यात्मिक विश्वास को सबसे बड़ी ढाल बनाया।

सर्वाइवर ने बताया कि जब भी उसे लगता कि सांसें उखड़ रही हैं या अब वह दोबारा सुबह का सूरज नहीं देख पाएगा, वह अपनी आंखें बंद कर लेता और निरंतर महामंत्र का जाप करने लगता। उसने मन ही मन गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र के शब्दों को दोहराना शुरू किया। मंत्रों की इस मानसिक गूंज ने उसके दिल की धड़कनों को स्थिर रखा और घबराहट को पास नहीं फटकने दिया। उसने बताया कि अंधेरे में जब मौत सामने खड़ी दिखती थी, तो मंत्रोच्चार उसे एक अलौकिक सुरक्षा कवच जैसा अहसास कराता था। इसी अटूट आस्था ने उसके भीतर यह अडिग विश्वास जगाए रखा कि चाहे जितने दिन लग जाएं, ऊपर वाले की कृपा से रेस्क्यू टीम उस तक जरूर पहुंचेगी।

जमीन के 50 फीट ऊपर रेस्क्यू वॉर: जब एनडीआरएफ और आधुनिक मशीनों ने झोंकी पूरी ताकत

सुरंग के धंसने के ठीक बाद बाहर की दुनिया में कोहराम मच चुका था। राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), भू-वैज्ञानिकों और टनलिंग इंजीनियरों की संयुक्त टीम ने तुरंत मोर्चा संभाला। सुरंग का मुहाना पूरी तरह से मलबे से अवरुद्ध था, और ऊपर से लगातार कच्ची मिट्टी व पत्थर गिर रहे थे। भारी मशीनों का कंपन सुरंग के भीतर बचे हिस्से को भी ढहा सकता था, जिससे अंदर फंसे शख्स की जान को तुरंत खतरा हो सकता था।

इंजीनियरों ने बेहद सतर्कता बरतते हुए होरिजेंटल ड्रिलिंग रिग्स और अमेरिकन ऑगर मशीनों की मदद से मलबे में स्टील पाइपलाइन डालने का काम शुरू किया। आधुनिक ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और थर्मल इमेजिंग सेंसर्स के जरिए मलबे के भीतर इंसानी जीवन की हलचल को ट्रैक किया गया। बचाव दल ने दिन-रात एक कर दिया; 24 घंटे लगातार ड्रिलिंग चलती रही। मलबे में लोहे की बड़ी-बड़ी सरिया और बोल्डर बार-बार ऑगर मशीन के ब्लेड को तोड़ रहे थे, लेकिन जवानों ने हार नहीं मानी और हर बाधा को गैस कटर से काटकर रास्ता बनाया।

मलबे के आर-पार पहली आवाज: 'भैया, हम आ गए हैं, बस कुछ घंटे और'

रेस्क्यू के सातवें दिन अभियान में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 4 इंच व्यास की एक छोटी लाइफलाइन पाइप मलबे को भेदकर अंदर तक पहुंच गई। बचाव दल ने जब पाइप के जरिए एयर कंप्रेसर से ताजी ऑक्सीजन अंदर भेजी और माइक्रो एंडोस्कोपिक कैमरा डाला, तो स्क्रीन पर शख्स की आंखें चमकती दिखाई दीं। उस क्षण कंट्रोल रूम में मौजूद हर अधिकारी की सांसें थम गईं।

जब पाइप के जरिए बचाव दल के एक जवान ने आवाज लगाई, "भैया, क्या आप सुन पा रहे हैं?", तो अंदर से धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज आई, "हां, मैं जिंदा हूं।" यह आवाज सुनते ही बाहर मौजूद परिजनों और रेस्क्यू टीम के चेहरे खिल उठे। इसके तुरंत बाद उसी संकरी पाइप के जरिए ग्लूकोज, ओआरएस का घोल, पानी और आवश्यक दवाएं भेजी गईं। डॉक्टरों ने माइक्रोफोन के जरिए लगातार उससे बात की और उसकी काउंसलिंग करते रहे ताकि उसका हौसला न टूटे। यह संपर्क उसके लिए जीवनदायिनी संजीवनी साबित हुआ।

जब बाहर निकली जिंदगी: आंसुओं में बदला खौफ, डॉक्टरों ने बताया 'अद्भुत चमत्कार'

नौवें दिन की सुबह आखिरकार वह ऐतिहासिक पल आ ही गया जब बचाव कर्मियों ने 800 एमएम की चौड़ी निकासी पाइपलाइन को सफलतापूर्वक अंदर तक पहुंचा दिया। एनडीआरएफ के दो जांबाज जवान व्हील-स्ट्रेचर और ऑक्सीजन मास्क के साथ पाइप के रास्ते अंदर रेंगे और सुरक्षित रूप से उस तक पहुंचे। जब उसे मलबे के उस पार से खींचकर बाहर निकाला गया, तो पूरी घाटी "भारत माता की जय" और बचाव दल के नारों से गूंज उठी।

तुरंत उसकी आंखों पर काली पट्टी बांधी गई, क्योंकि 9 दिनों तक घने अंधेरे में रहने के बाद सीधी रोशनी उसकी आंखों की रेटिना को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकती थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराए जाने के बाद डॉक्टरों की विशेष टीम ने उसकी जांच की। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि इतने लंबे समय तक बिना भोजन के रहने से उसके शरीर में गंभीर डिहाइड्रेशन और मांसपेशियों में कमजोरी आई थी, लेकिन उसके वाइटल्स और आंतरिक अंग पूरी तरह सुरक्षित थे। डॉक्टरों ने इसे केवल शारीरिक सहनशक्ति नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और मानसिक दृढ़ता का एक अभूतपूर्व चमत्कार करार दिया है।

आपदा में जीवन की सबसे बड़ी सीख: संकट कितना भी गहरा हो, उम्मीद कभी नहीं मरती

यह घटना केवल एक सफल रेस्क्यू ऑपरेशन की खबर भर नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव जाति के लिए विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की एक अमर मिसाल है। जब इंसान मौत के साए में घिर जाता है, तो भौतिक संसाधन नहीं बल्कि उसका आत्मबल और ईश्वर के प्रति उसका विश्वास ही उसे जिंदा रखता है। नौ दिनों तक भूखे-प्यासे रहकर पत्थरों के नीचे मौत को मात देने वाले इस शख्स की कहानी बताती है कि जब तक सांसें बाकी हैं, तब तक उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सुरंग के अंधेरे को चीरकर लौटी यह जिंदगी साबित करती है कि विज्ञान की आधुनिक तकनीक और इंसान के अटूट विश्वास का संगम हर असंभव को संभव बना सकता है।