'काबा-मदीना' गाकर विवादों में घिरीं TMC सांसद सायोनी घोष के सामने नई अग्निपरीक्षा: जादवपुर में बागियों को 18 दिन का अल्टीमेटम
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपने आक्रामक तेवरों और बयानों से हमेशा सुर्खियों में रहने वालीं तृणमूल कांग्रेस (TMC) की युवा नेता और जादवपुर से लोकसभा सांसद सायोनी घोष एक बार फिर राजनीतिक चक्रव्यूह के केंद्र में आ गई हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से 'काबा-मदीना' से जुड़े इस्लामिक गीत/कव्वाली गाने को लेकर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के निशाने पर आईं सायोनी घोष के सामने अब पार्टी के भीतर से ही गंभीर संगठनात्मक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। उनके अपने संसदीय क्षेत्र जादवपुर और आसपास के इलाकों में पार्टी लाइन से इतर काम करने वाले स्थानीय क्षत्रपों और बागी नेताओं के खिलाफ टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व ने बेहद कड़ा रुख अपना लिया है।
पार्टी की राज्य अनुशासन समिति ने संगठन विरोधी गतिविधियों, समानांतर कार्यक्रम चलाने और पार्टी के आधिकारिक फैसलों की अवहेलना करने वाले कई असंतुष्ट नेताओं को औपचारिक कारण बताओ (Show-Cause) नोटिस थमा दिया है। इन बागियों को अपनी सफाई पेश करने के लिए ठीक 18 दिन की सख्त मोहलत दी गई है। इस कड़े अल्टीमेटम के बाद बंगाल के सियासी गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि बाहरी विरोधियों के तीखे हमलों के बीच क्या सायोनी घोष अपने ही गढ़ में भड़की इस अंदरूनी बगावत को शांत कर पाएंगी, या फिर 18 दिनों के बाद तृणमूल कांग्रेस में बड़े पैमाने पर निष्कासन का दौर शुरू होने जा रहा है।
'काबा-मदीना' गाने पर क्यों मचा था सियासी संग्राम? भाजपा के हमले और सायोनी का रुख
सायोनी घोष पर ताजा संगठनात्मक दबाव को समझने के लिए उस पृष्ठभूमि को जानना जरूरी है जिसके चलते वे पिछले कुछ समय से लगातार राज्य और राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बनी हुई हैं। कुछ समय पहले अल्पसंख्यक बहुल इलाके में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सायोनी घोष ने मंच से माइक थामकर 'काबा आमार मदीना आमार' (काबा मेरा, मदीना मेरा) की पंक्तियां गाई थीं। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने इसे तृणमूल कांग्रेस के 'कट्टर तुष्टिकरण' का चरम उदाहरण करार दिया था।
भाजपा नेताओं ने सायोनी घोष के पुराने बयानों—विशेष रूप से वर्षों पूर्व शिवलिंग पर कंडोम पहनाने से जुड़े विवादित ट्वीट—को दोबारा याद दिलाते हुए उन पर हिंदू विरोधी और अवसरवादी राजनीति करने का आरोप लगाया। शुभेंदु अधिकारी और सुकांत मजूमदार जैसे भाजपा दिग्गजों ने सवाल उठाया कि जो नेत्री सनातन प्रतीकों का उपहास उड़ाती रही हैं, वे अब केवल मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए मंचों से धार्मिक गीत अलाप रही हैं। हालांकि, सायोनी घोष और टीएमसी ने इस पर पलटवार करते हुए कहा था कि बंगाल की संस्कृति 'सर्वधर्म समभाव' और गंगा-जमुनी तहजीब की प्रतीक है, जहां रामकृष्ण परमहंस और नजरुल इस्लाम की परंपरा के तहत सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है। लेकिन इस विवाद ने विपक्ष को सायोनी के खिलाफ एक बड़ा मनोवैज्ञानिक हथियार थमा दिया।
अनुशासन समिति का कड़ा हंटर: बागियों को 18 दिन की मोहलत, पूछा- पार्टी से क्यों न निकालें?
बाहरी मोर्चे पर जब सायोनी घोष विपक्ष के हमलों का सामना कर रही थीं, तभी जादवपुर और दक्षिण 24 परगना से जुड़े तृणमूल के संगठनात्मक ढांचे में दरारें चौड़ी होने लगीं। जादवपुर लोकसभा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से माकपा (CPM) का लाल किला रहा है, जिसे ममता बनर्जी ने तोड़ा था और बाद में मिमी चक्रवर्ती के बाद सायोनी घोष ने यहां से विशाल जीत दर्ज की थी। लेकिन चुनाव बीतने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्षदों, ब्लॉक अध्यक्षों और पूर्व पदाधिकारियों के बीच वर्चस्व की जंग सड़क पर आ गई।
हाल ही में पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों का बहिष्कार करने, समानांतर जनसंपर्क अभियान चलाने और सायोनी घोष के नेतृत्व को खुलेआम चुनौती देने वाले कई प्रभावशाली स्थानीय नेताओं की शिकायत सीधे तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी तक पहुंची। इसके बाद हरकत में आई टीएमसी अनुशासन समिति ने कड़े शब्दों में कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में साफ लिखा गया है कि यदि 18 दिनों के भीतर असंतुष्ट नेताओं ने अपने गैर-जिम्मेदाराना आचरण का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया, तो उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से निष्कासित कर दिया जाएगा। अनुशासन समिति के इस अल्टीमेटम ने पूरे जादवपुर क्षेत्र के सत्ता गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
जादवपुर में 'पुराने बनाम नए' का टकराव: सायोनी घोष के सामने दोहरी चुनौती
तृणमूल कांग्रेस के भीतर पिछले दो वर्षों से 'ओल्ड गार्ड्स' (ममता बनर्जी के वफादार पुराने जमीनी कार्यकर्ता) और 'न्यू जनरेशन' (अभिषेक बनर्जी की युवा ब्रिगेड) के बीच जो खींचतान चल रही है, जादवपुर उसकी सबसे संवेदनशील प्रयोगशाला बन चुका है। सायोनी घोष, जिन्हें अभिषेक बनर्जी का बेहद करीबी और भरोसेमंद माना जाता है, को जब मिमी चक्रवर्ती की जगह जादवपुर से टिकट दिया गया था, तभी से स्थानीय पुराने सिपहसालार असहज महसूस कर रहे थे।
चुनाव के समय पार्टी अनुशासन के डर से सब कुछ शांत दिखा, लेकिन अब पुराने नेताओं का एक खेमा पर्दे के पीछे से सायोनी के कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है। उनका आरोप है कि सांसद बनने के बाद सायोनी पुराने ब्लॉक स्तर के नेताओं की अनदेखी कर रही हैं और अपने निजी सलाहकारों व चुनिंदा युवाओं को ज्यादा तरजीह दे रही हैं। दूसरी तरफ, सायोनी समर्थकों का कहना है कि सिंडिकेट राज और ठेकेदारी से जुड़े पुराने नेता अपनी काली कमाई और दादागिरी बंद होने के डर से सांसद के विकास कार्यों में अड़ंगा लगा रहे हैं। बागियों का यह खुला विद्रोह सायोनी के लिए अपनी प्रशासनिक और संगठनात्मक क्षमता साबित करने की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।
ममता-अभिषेक का सख्त फरमान: 'किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं होगी अनुशासनहीनता'
कालीघाट (ममता बनर्जी के आवास) और कैमक स्ट्रीट (अभिषेक बनर्जी के दफ्तर) से इस बार जो संदेश दिया गया है, वह बेहद स्पष्ट है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव और उप-चुनावों से पहले तृणमूल नेतृत्व किसी भी सूरत में पार्टी के भीतर गुटबाजी की खुली छूट नहीं देना चाहता।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि बागियों को 18 दिन की मोहलत केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता है, ताकि किसी को यह कहने का मौका न मिले कि बिना सुनवाई के कार्रवाई की गई। यदि बागी नेता बिना शर्त सांसद सायोनी घोष के साथ तालमेल बिठाकर काम करने को राजी नहीं होते हैं, तो पार्टी बिना किसी झिझक के उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देगी। संदेश साफ है कि चाहे कोई कितना भी पुराना नेता क्यों न हो, पार्टी के आधिकारिक सांसद और संगठन के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने की इजाजत किसी को नहीं मिलेगी।
18 दिन बाद क्या करेंगी सायोनी घोष? आगे की राह और राजनीतिक असर
अब सारा दारोमदार इस बात पर टिका है कि नोटिस की 18 दिन की मियाद खत्म होने पर क्या समीकरण बनते हैं। सायोनी घोष के सामने इस समय दो रास्ते हैं—पहला यह कि वह एक परिपक्व सांसद की भूमिका निभाते हुए असंतुष्ट खेमे के प्रमुख नेताओं को चाय पर बुलाकर उनके गिले-शिकवे सुनें और उन्हें मुख्यधारा में जोड़े रखें। दूसरा रास्ता यह है कि वे कड़ा रुख अपनाते हुए बागियों पर कार्रवाई की सिफारिश करें और अपने संसदीय क्षेत्र में पूरी तरह नए चेहरों की टीम खड़ी करें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सायोनी के लिए यह समय बेहद सावधानी से कदम उठाने का है। 'काबा-मदीना' विवाद के जरिए विपक्ष उन पर बहुसंख्यक भावनाओं की उपेक्षा का ठप्पा लगाने में जुटा है, और ऐसे में यदि जादवपुर के हिंदू बहुल वार्डों में पार्टी के पुराने हिंदू कैडर नाराज होकर घर बैठ गए या भाजपा/माकपा की तरफ खिसक गए, तो इसका सीधा असर भविष्य के चुनावों में देखने को मिल सकता है। अगले 18 दिन न केवल जादवपुर तृणमूल के असंतुष्ट नेताओं का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि ग्लैमर की दुनिया से निकलकर राजनीति के खुरदुरे धरातल पर उतरीं सायोनी घोष एक कुशल और सुलझी हुई राजनेता के रूप में खुद को स्थापित कर पाती हैं या नहीं।