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September 04 2026 08:42 pm

'शायद अब कभी नहीं मिलेंगे उनके शव': नेपाल की उफनती नदियों और 50 फीट गहरे मलबे में समाई सैकड़ों जिंदगियां

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पहाड़ों के दरकने और आसमान से बरसी आफत के बाद नेपाल के हिमालयी अंचल में जो तबाही मची है, उसके निशान शायद दशकों तक नहीं मिटेंगे। उफनती नदियों, बहती सड़कों और धंसते पहाड़ों के बीच फंसे दर्जनों अभागे लोगों के परिजनों की आंखें पिछले कई दिनों से नदी के मटमैले पानी और मलबे के ढेरों को टकटकी लगाए देख रही थीं। वे इस आस में बैठे थे कि काश उनका कोई अपना जिंदा मिल जाए, या कम से कम उसका मृत शरीर ही अंतिम संस्कार के लिए नसीब हो जाए। मगर अब ग्राउंड जीरो पर सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे शीर्ष अधिकारियों, सेना के गोताखोरों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने एक ऐसा बयान दे दिया है जिसने इन पीड़ित परिवारों के पैरों तले से जमीन खिसका दी है। बचाव दल के वरिष्ठ अधिकारियों का साफ कहना है कि जिस रफ्तार से सैलाब आया था और नदी के तल में जितना भारी मलबा जमा है, उसे देखते हुए यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि शायद इनमें से कई लोगों के शव अब कभी नहीं मिल पाएंगे।

आपदा प्रबंधन से जुड़े तकनीकी जानकारों और गोताखोरों का यह आकलन किसी को भी विचलित कर सकता है। जब गाड़ियां और दर्जनों यात्री सीधे सैकड़ों फीट गहरी खाई में गिरकर उफनती हिमालयी नदी में समा गए, तो पानी का प्रवाह इतना विकराल था कि लोहे के बड़े-बड़े चेसिस और इंजन तक तिनके की तरह बह गए। कई दिनों की अथक मेहनत, अत्याधुनिक सोनार कैमरों, ड्रोन और चुंबकों के इस्तेमाल के बावजूद जब पानी के भीतर से कुछ खास हाथ नहीं लगा, तब रेस्क्यू टीमों ने बेहद भारी मन से इस बात के संकेत दिए कि अब किसी के जीवित बचने की संभावना तो शून्य है ही, साथ ही कई शवों का हमेशा के लिए लापता हो जाना लगभग तय हो चुका है।

उफनती त्रिशूली-नारायणी और सैकड़ों टन गाद: क्यों नामुमकिन लग रहा है रेस्क्यू?

इस पूरे तलाशी अभियान में सबसे बड़ी रुकावट नेपाल की भौगोलिक बनावट और यहां की पहाड़ी नदियों का हिंसक मिजाज बन चुका है। त्रिशूली, नारायणी और उनकी सहायक नदियां जब मानसून के मौसम में उफान पर होती हैं, तो उनका बहाव किसी आम मैदानी नदी जैसा नहीं होता। इन नदियों में पानी के साथ भारी मात्रा में नुकीले पत्थर, बड़े-बड़े बोल्डर और पहाड़ों से कटा गाद (सिल्ट) अत्यधिक दबाव के साथ नीचे की ओर बहता है।

नदी तल पर काम करने वाले गोताखोरों ने बताया कि पानी की ऊपरी सतह जितनी अशांत दिखती है, तलहटी में हालात उससे दस गुना ज्यादा खतरनाक हैं। नदी की तलहटी में 30 से 50 फीट तक गाद और कीचड़ की परत जम चुकी है। यदि कोई भारी वाहन या इंसान का शरीर उस बहाव में नीचे बैठ भी गया हो, तो कुछ ही मिनटों में वह सैकड़ों टन वजनी कंक्रीट और मिट्टी के नीचे जिंदा दफन हो जाता है। ऐसे हालात में अंडरवाटर कैमरे और सोनार तरंगें भी गाद की मोटी चादर को भेद पाने में नाकाम साबित हो रही हैं। गोताखोरों के लिए गहरे पानी में उतरना अपनी जान जोखिम में डालने जैसा है, क्योंकि पानी के भीतर 'जीरो विजिबिलिटी' है, यानी आंखें खोलने पर भी हाथ भर की दूरी पर कुछ दिखाई नहीं देता।

विशेषज्ञ गोताखोरों और सेना का बड़ा बयान: 'नदी की गहराइयों में समा चुकी हैं देह'

नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और नेपाल पुलिस के उच्चाधिकारियों ने संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग में बेहद संवेदनशील शब्दों में जमीनी हकीकत को साझा किया। तलाशी अभियान का नेतृत्व कर रहे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नदी के तीव्र वेग ने शवों को कई किलोमीटर दूर धकेल दिया है। हिमालयी नदियों में पानी की रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है, और रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर किसी ब्लेड की तरह काम करते हैं।

विशेषज्ञों का अंदेशा है कि भीषण टकराव और पत्थरों की रगड़ के कारण इंसानी शरीर सुरक्षित अवस्था में रह ही नहीं सकते। कई शव पानी के भीतर बने गहरे भंवरों (Whirlpools) में फंसकर नीचे की चट्टानों में दब चुके हैं, जहां इंसानी पहुंच किसी भी तकनीक के जरिए मुमकिन नहीं है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, शवों के विघटन (Decomposition) की प्रक्रिया तेज हो चुकी है, जिससे उनके अवशेषों की पहचान करना या उन्हें खोज निकालना हर बीतते घंटे के साथ नामुमकिन होता जा रहा है। यही वजह है कि अब आधिकारिक तौर पर यह माना जा रहा है कि एक बड़ा हिस्सा प्रकृति के इसी अथाह गर्भ में हमेशा-हमेशा के लिए विलीन हो चुका है।

भारतीय सीमा की ओर बहने की आशंका: सीमांत जिलों में अलर्ट और संयुक्त खोज

नेपाल की इन उफनती नदियों की भौगोलिक दिशा सीधे भारत के मैदानी इलाकों से जुड़ती है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी बनती है और यही नदी बिहार की सीमा में प्रवेश करते ही 'गंडक नदी' के नाम से जानी जाती है। इस भौगोलिक जुड़ाव को देखते हुए नेपाल प्रशासन ने भारतीय सीमा पर तैनात एजेंसियों और सीमावर्ती जिलों के प्रशासन से संपर्क साधा है। वाल्मीकि नगर बैराज और उसके आसपास के क्षेत्रों में गंडक नदी के किनारों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।

भारतीय सीमा सुरक्षा बल और स्थानीय गोताखोरों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है, ताकि यदि पानी के तेज बहाव में कोई शव सीमा पार बहकर भारत की ओर आता है, तो उसे तुरंत निकाला जा सके। कुछ मामलों में शव हादसे की जगह से 80 से 100 किलोमीटर दूर बहकर चले जाते हैं। लेकिन बैराज के फाटकों और उफनती गंडक के विशाल पाट में भी तलाश करना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा साबित हो रहा है। लगातार बढ़ रहा जलस्तर और सीमावर्ती इलाकों में हो रही मूसलाधार बारिश ने दोनों देशों के संयुक्त प्रयासों के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

परिजनों का छलकता दर्द: 'हमें सिर्फ आखिरी बार उनका चेहरा देखना है'

नदी के उफनते किनारों पर बैठे परिजनों का विलाप किसी भी कठोर दिल इंसान को झकझोर देने के लिए काफी है। कोई अपने बूढ़े माता-पिता की तस्वीर हाथ में लिए रो रहा है, तो कोई अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों के कपड़ों को सीने से लगाकर आंसू बहा रहा है। इन परिवारों के लिए यह अनिश्चितता मौत की खबर से भी ज्यादा पीड़ादायक है। इसे मनोविज्ञान में 'अम्बिजुअस लॉस' (अनसुलझा शोक) कहा जाता है, जहां इंसान को यह पता ही नहीं होता कि उसका अपना जीवित है या मृत, और अगर मृत है तो उसका अंतिम संस्कार कैसे किया जाए।

एक बदहवास परिजन ने रोते हुए कहा, "हमें सरकार से कोई मुआवजा नहीं चाहिए, हमें बस हमारे बेटे का शरीर सौंप दिया जाए ताकि हम अपनी परंपरा के अनुसार उसे मुखाग्नि दे सकें। बिना शव देखे हम जीवन भर कैसे मान लें कि वह अब इस दुनिया में नहीं है?" जब प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें यह समझाया कि अब शवों का मिलना लगभग नामुमकिन हो चुका है, तो किनारों पर चीख-पुकार मच गई। कई परिजन अभी भी नदी किनारे इस उम्मीद में डेरा डाले बैठे हैं कि शायद नदी की कोई लहर उनके अपनों को किनारे फेंक दे।

हिमालयी आपदाओं का क्रूर भूगोल: कब तक प्रकृति के प्रकोप की कीमत चुकाएंगे निर्दोष?

यह त्रासदी केवल कुछ शवों के खो जाने का मामला नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पर्यावरण के साथ हो रही अनियंत्रित छेड़छाड़ और लचर आपदा प्रबंधन पर एक बड़ा सवालिया निशान है। नेपाल के पहाड़ी राजमार्गों पर हर साल मॉनसून के दौरान दर्जनों लैंडस्लाइड होते हैं, लेकिन ढलानों की मजबूती, सटीक वेदर वार्निंग सिस्टम और सुरक्षित टनलिंग के अभाव में आम जनता अपनी जान गंवाती है।

जब तक पहाड़ों के संवेदनशील भूगोल को समझे बिना अंधाधुंध निर्माण जारी रहेगा, तब तक ऐसी त्रासदियां बेकसूर जिंदगियों को लीलती रहेंगी। रेस्क्यू टीमों का यह बेबस दावा कि 'शायद अब शव कभी नहीं मिलेंगे', सिर्फ एक बयान नहीं है बल्कि यह कुदरत के रौद्र रूप के सामने इंसान की तकनीकी लाचारी का सबसे दर्दनाक दस्तावेज है। यह घटना भविष्य के लिए एक चेतावनी है कि यदि हमने प्रकृति के संवेदनशील स्वरूप का सम्मान नहीं किया, तो उसके प्रकोप से बचने का कोई रास्ता इंसानी समझ के पास नहीं होगा।