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September 04 2026 11:28 pm

'हमने भारत से कोई मुआवजा नहीं मांगा, हमारी अपेक्षा सिर्फ मानवीय सहायता की है': काठमांडू ने खारिज कीं भ्रामक अफवाहें

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हिमालयी देश नेपाल में मूसलाधार मानसूनी बारिश के बाद आई भीषण बाढ़ और विनाशकारी भूस्खलन से मची व्यापक तबाही के बीच कूटनीतिक गलियारों में उपजे एक बड़े विवाद पर काठमांडू ने आधिकारिक तौर पर पूर्णविराम लगा दिया है। हाल के दिनों में सीमा पार और सोशल मीडिया पर इस तरह के भ्रामक दावे किए जा रहे थे कि नेपाल ने सीमाई नदियों और बराजों से हुए नुकसान के बदले भारत सरकार से भारी वित्तीय मुआवजे की मांग की है। इन अटकलों को सिरे से खारिज करते हुए नेपाली नेतृत्व और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नेपाल ने भारत से किसी भी तरह का कोई मुआवजा या हर्जाना नहीं मांगा है।

नेपाली अधिकारियों ने दो-टूक शब्दों में कहा कि एक संप्रभु और करीबी पड़ोसी के रूप में नेपाल अपने पुराने और ऐतिहासिक मित्र भारत की ओर मुआवजे के लिए नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदा से कराह रहे लाखों प्रभावित नागरिकों के लिए बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता और तकनीकी सहयोग की उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। काठमांडू ने दोहराया कि जब भी नेपाल पर कोई बड़ी प्राकृतिक विपत्ति आई है, भारत हमेशा संकटमोचक बनकर सबसे पहले खड़ा रहा है। इस मौजूदा जल-प्रलय में भी नेपाल को उम्मीद है कि भारत एक बड़े भाई और जिम्मेदार पड़ोसी का फर्ज निभाते हुए राहत, बचाव और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण में उसी आत्मीयता से हाथ बढ़ाएगा जैसा उसने एक दशक पहले आए भीषण भूकंप के दौरान किया था।

2015 के महाभूकंप और 'ऑपरेशन मैत्री' की मिसाल: जब भारत ने दिखाई थी सच्ची मित्रता

नेपाल सरकार के प्रतिनिधियों ने भारत के साथ अपने भावनात्मक और मानवीय संबंधों को रेखांकित करते हुए वर्ष 2015 के उस काले अध्याय को याद किया जब 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप ने पूरे नेपाल को हिलाकर रख दिया था। उस भीषण त्रासदी में लगभग 9,000 लोगों की जान चली गई थी और लाखों घर खंडहर में तब्दील हो गए थे। उस वक्त भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आपदा के चंद घंटों के भीतर 'ऑपरेशन मैत्री' (Operation Maitri) लॉन्च कर दिया था। भारतीय वायुसेना के विमान, एनडीआरएफ (NDRF) की टीमें, सेना के फील्ड अस्पताल, दवाइयां और राहत सामग्री काठमांडू की सड़कों पर सबसे पहले पहुंचे थे।

नेपाल ने कहा कि भूकंप के बाद के वर्षों में भी भारत ने काठमांडू और गोरखा जिले में हजारों भूकंपरोधी मकानों, स्कूलों और ऐतिहासिक धरोहरों के पुनर्निर्माण के लिए 1 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय और ढांचागत मदद दी थी। वर्तमान में आई बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल के कई प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों, जलविद्युत परियोजनाओं, पुलों और सैकड़ों गांवों को तबाह कर दिया है। ऐसे में नेपाल का मानना है कि भारत की तकनीकी विशेषज्ञता, इंजीनियरिंग कोर और मानवीय आपूर्ति ही इस समय नेपाल की सबसे बड़ी ढाल बन सकती है। यह संबंध किसी संकीर्ण वित्तीय लेनदेन या मुआवजे के दायरे में नहीं बंधा है, बल्कि यह दो देशों के बीच साझा संवेदनाओं की अटूट कड़ी है।

कोसी, गंडक और साझा नदियों का दर्द: सीमा पार जल संकट पर संकीर्ण राजनीति से बचने की अपील

भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और जटिल कूटनीतिक मुद्दा रहा है। नेपाल के पहाड़ों से निकलने वाली कोसी, गंडक, करनाली (घाघरा) और बागमती जैसी सदानीरा नदियां जब भारी बारिश के बाद उफान पर आती हैं, तो वे न केवल नेपाल के तराई क्षेत्रों में जलमग्नता पैदा करती हैं, बल्कि नीचे स्थित भारतीय राज्य बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी भारी तबाही मचाती हैं। हर साल मानसून के दौरान दोनों तरफ के कुछ राजनीतिक हलकों में नदियों के जलस्तर, बराज के फाटकों को खोलने और सिल्ट (गाद) जमाव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं।

नेपाली पक्ष ने इस बात पर विशेष बल दिया कि कोसी और गंडक बराज समझौतों के तहत जल नियंत्रण और बराज संचालन के नियम दोनों देशों की संयुक्त तकनीकी समितियों द्वारा तय किए जाते हैं। जब नेपाल के पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों में रिकॉर्ड बारिश होती है, तो बराजों की सुरक्षा और बांधों को टूटने से बचाने के लिए पानी छोड़ना एक तकनीकी और इंजीनियरिंग मजबूरी बन जाता है, न कि कोई जानबूझकर उठाया गया कदम। नेपाल ने अपील की है कि इस साझा प्राकृतिक आपदा को किसी कूटनीतिक टकराव या मुआवजे की संकीर्ण बहस में बदलने के बजाय दोनों देशों को एक साझा जल-प्रबंधन तंत्र विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि जान-माल के नुकसान को दोनों तरफ न्यूनतम किया जा सके।

'नेबरहुड फर्स्ट' नीति पर भारत की तत्परता: नई दिल्ली से राहत और बचाव का भरोसा

काठमांडू के इस सकारात्मक और स्पष्ट रुख के बाद नई दिल्ली की ओर से भी सकारात्मक संदेश दिए गए हैं। भारत सरकार अपनी विदेश नीति में 'पड़ोसी प्रथम' (Neighborhood First) के सिद्धांत को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत नेपाल की जमीनी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और भारतीय दूतावास नेपाल के गृह मंत्रालय और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ चौबीसों घंटे समन्वय में काम कर रहा है।

भारत की ओर से पहले ही आपातकालीन जीवन रक्षक दवाइयां, अस्थायी टेंट, वाटर प्यूरीफिकेशन प्लांट्स, बोट्स और खाद्य पैकेट्स से लदे ट्रक सीमावर्ती रास्तों से नेपाल भेजे जा रहे हैं। भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल भी सीमाई इलाकों में फंसे नेपाली नागरिकों और तीर्थयात्रियों को सुरक्षित निकालने में नेपाली सुरक्षाबलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि नेपाल की स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हुई है, और संकट की इस घड़ी में नेपाल को अकेला छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

स्थायी समाधान की ओर कदम: हाई डैम प्रोजेक्ट्स और रियल-टाइम डेटा शेयरिंग की दरकार

नेपाल द्वारा मुआवजे की बात खारिज कर मानवीय मदद की अपील करने से दोनों देशों के नीति-निर्माताओं के लिए दीर्घकालिक समाधानों पर चर्चा करने का एक नया अवसर खुल गया है। दोनों देशों के हाइड्रोलॉजिस्ट्स और पर्यावरणविदों का मानना है कि तदर्थ राहत सामग्री बांटना केवल तात्कालिक उपाय है। हर साल मानसून में दोहराई जाने वाली इस तबाही को हमेशा के लिए रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

इसके लिए सबसे पहले 'सप्तकोशी हाई डैम प्रोजेक्ट' (Saptakoshi High Dam) जैसी बहुउद्देशीय परियोजनाओं पर वर्षों से लटकी वार्ताओं को गति देनी होगी, जिससे न केवल नेपाल में हजारों मेगावाट स्वच्छ बिजली पैदा हो सकेगी बल्कि भारी बाढ़ के पानी को नियंत्रित कर बिहार और नेपाल के तराई को डूबने से बचाया जा सकेगा। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मौसम और जलस्तर से जुड़े 'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम' (पूर्व चेतावनी प्रणाली) और रियल-टाइम डिजिटल डेटा शेयरिंग को पूरी तरह से आधुनिक बनाना है। यदि काठमांडू और पटना-दिल्ली के बीच बादलों के फटने और नदी के बहाव का सटीक डेटा कुछ घंटे पहले साझा हो जाए, तो हजारों जिंदगियों और मवेशियों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है।

रोटी-बेटी के रिश्ते की कसौटी: प्राकृतिक आपदा में एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत

भारत और नेपाल के संबंध महज दो सरकारों के औपचारिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिवारिक विरासत—जिसे 'रोटी-बेटी का रिश्ता' कहा जाता है—पर आधारित हैं। पशुपतिनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक और जनकपुर से लेकर अयोध्या तक फैली यह साझा आस्था दोनों देशों को एक ऐसे सूत्र में पिरोती है जिसे कोई राजनीतिक उतार-चढ़ाव कमजोर नहीं कर सकता।

नेपाल के इस आधिकारिक बयान ने उन तत्वों के मंसूबों पर पानी फेर दिया है जो आपदा के समय भी दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई खोदने की फिराक में थे। यह स्पष्ट हो गया है कि नेपाल भारत को किसी विवादित पक्ष के रूप में नहीं, बल्कि अपने सबसे विश्वस्त, मजबूत और आत्मीय संकटमोचक के रूप में देखता है। जैसे भारत ने अतीत में हर कठिन मोड़ पर नेपाल के आंसू पोंछे हैं, वैसे ही इस बार भी बाढ़ के मलबे से नेपाल को बाहर निकालने और उसके नागरिकों के पुनर्वास में भारत का सहयोग एक नए विश्वास और प्रगाढ़ दोस्ती की नई इबारत लिखेगा।