भारत की जल-रणनीति: पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने के लिए 2600 करोड़ की दो बड़ी टनल परियोजनाएं
India News Live,Digital Desk : भारत ने सिंधु जल समझौते के बाद पाकिस्तान की ओर जाने वाले अतिरिक्त पानी को रोकने और उसका उपयोग अपने देश में करने के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और ढांचागत पहल की है। लगभग 2600 करोड़ रुपये की लागत वाली इन दो प्रमुख परियोजनाओं के जरिए भारत चिनाब और चंद्रा नदी के पानी को मोड़ने और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
परियोजनाओं का विवरण:
चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना (लागत: 2352 करोड़ रुपये):
संरचना: इस परियोजना के तहत लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी एक टनल का निर्माण किया जाएगा।
प्रक्रिया: पहले चरण में लाहौल घाटी में नदी पर 19 मीटर ऊंचा बराज बनाया जाएगा। इसके माध्यम से चंद्रा नदी के पानी को हाइड्रोलिक स्ट्रक्चर और टनल की सहायता से ब्यास बेसिन की तरफ मोड़ दिया जाएगा।
उद्देश्य: यह परियोजना भारत को पाकिस्तान जाने वाले अतिरिक्त पानी का अधिकतम उपयोग करने में सक्षम बनाएगी।
सलाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना (लागत: 268 करोड़ रुपये):
संरचना: रियासी जिले में स्थित इस परियोजना में एक नया 'डायवर्जन-कम-सेडिमेंट बाईपास टनल' बनाया जाएगा।
समस्या का समाधान: वर्षों से पहाड़ों से आने वाली गाद (मिट्टी) के कारण सलाल बांध की जल भंडारण क्षमता घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह गई है। यह टनल बांध से गाद निकालने में मदद करेगी, जिससे उसकी भंडारण क्षमता फिर से बढ़ सकेगी।
सिंधु जल समझौते और भारत की बदली रणनीति:
सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु, चिनाब और झेलम नदियों के 80 प्रतिशत पानी का अधिकार पाकिस्तान को प्राप्त है, जबकि ब्यास, रावी और सतलुज के 80 प्रतिशत पानी पर भारत का अधिकार है। हालांकि, आतंकी घटनाओं और सुरक्षा कारणों के चलते भारत ने अब पाकिस्तान की ओर जाने वाले अधिकतम पानी को रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।
भारत की इन ढांचागत परियोजनाओं का उद्देश्य केवल पानी को रोकना ही नहीं, बल्कि उस पानी को गंगा बेसिन तक पहुँचाने का रास्ता बनाना भी है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने में समय लगेगा क्योंकि पानी के बहाव को मोड़ना और बड़े पैमाने पर ढांचा तैयार करना एक तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है।
इन परियोजनाओं को नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और जल संसाधन प्रबंधन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।