'सुप्रीम कोर्ट के जज भी भारत में ही कराते हैं इलाज', कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को विदेश जाने की इजाजत देने से किया साफ इनकार
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों और देश की न्यायपालिका से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को कलकत्ता हाईकोर्ट से करारा झटका मिला है। अदालत ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी आंख के इलाज के लिए अमेरिका के प्रतिष्ठित जॉन्स Hopkins अस्पताल जाने की अनुमति मांगी थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से की गई टिप्पणियां इस समय देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश में चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी अन्य देश से कम नहीं हैं और यहां तक कि देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट के जज भी अपने इलाज के लिए भारत की चिकित्सा व्यवस्था पर ही भरोसा करते हैं। अदालत के इस कड़े रुख और तर्कों के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है।
कलकत्ता हाईकोर्ट में क्या रहा पूरा घटनाक्रम और क्यों खारिज हुई याचिका?
अभिषेक बनर्जी की ओर से कलकत्ता हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर आग्रह किया गया था कि उनकी बाईं आंख की चिकित्सीय स्थिति के विशेष उपचार के लिए उन्हें तीन सप्ताह के लिए विदेश जाने की अनुमति दी जाए। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि वे पिछले कई वर्षों से अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल से अपना इलाज कराते आ रहे हैं और अपनी पसंद के डॉक्टर से इलाज कराना उनका मौलिक अधिकार है। हालांकि, राज्य सरकार के अतिरिक्त महाअधिवक्ता राजदीप मजूमदार और अन्य पक्षों ने इसका कड़ा विरोध किया। अदालत को बताया गया कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कई आपराधिक मामले और चुनाव प्रचार के दौरान कथित भड़काऊ भाषण देने से जुड़े गंभीर मुकदमे दर्ज हैं, जिनकी जांच वर्तमान में चल रही है। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि पूर्व में कोर्ट द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया था कि उनकी आंख की स्थिति की जांच कोलकाता के सरकारी एसएसकेएम (SSKM) अस्पताल के एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड से कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या उनका इलाज देश में संभव है या नहीं। लेकिन जब उनके वकीलों ने स्पष्ट कर दिया कि वे कोर्ट के इस निर्देशानुसार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने को तैयार नहीं हैं, तो अदालत ने बिना किसी अन्य विकल्प के याचिका को खारिज कर दिया।
"मेडिकल साइंस में भारत पीछे नहीं" - अदालत की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने भारतीय चिकित्सा प्रणाली की मजबूती पर जोर देते हुए बहुत महत्वपूर्ण और स्पष्ट टिप्पणी की। जज ने यह सवाल उठाया कि आखिर आंखों के विशेष इलाज के लिए विदेश जाना ही क्यों अनिवार्य है, जबकि देश के भीतर ही तमाम उत्कृष्ट चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध हैं। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा कि मेडिकल साइंस के क्षेत्र में आज भारत किसी भी अन्य देश से पीछे नहीं है और देश के सबसे बड़े न्यायिक संस्थानों यानी सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश भी अपने इलाज के लिए भारत के डॉक्टरों और अस्पतालों पर ही भरोसा करते हैं। अदालत का यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि देश की न्यायपालिका को स्वदेशी चिकित्सा व्यवस्था और स्वास्थ्य ढांचे पर पूरा विश्वास है। कोर्ट ने यह भी माना कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ देश में कई गंभीर आपराधिक मामलों की जांच चल रही हो और उसे कुछ शर्तों के तहत ही अंतरिम सुरक्षा दी गई हो, तो उसकी विदेश यात्रा के दावों को अन्य कानूनी पहलुओं के साथ जोड़कर ही देखा जाना चाहिए।
कानूनी और राजनीतिक दांवपेंच के बीच फंसा मामला
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के दौरान कथित भड़काऊ भाषणों और अन्य मामलों को लेकर बिधाननगर पुलिस और सीआईडी (CID) द्वारा एफआईआर दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने पूर्व में अभिषेक बनर्जी को इन मामलों में दंडात्मक कार्रवाई से राहत तो दी थी, लेकिन यह शर्त भी लगाई थी कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे। राहत पाने के लिए उन्होंने पहले भी अदालत का दरवाजा खटखटाया था और जब वहां से राहत नहीं मिली, तो वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों इस मामले पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया था कि चूंकि मामला उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए कलकत्ता हाईकोर्ट ही एक सप्ताह के भीतर इस पर अंतिम निर्णय ले। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद जब यह मामला दोबारा एकल पीठ के पास आया, तो अदालत ने तमाम पक्षों को सुनने के बाद यह कड़ा फैसला सुनाया।
डिजिटल युग और आधुनिक एआई सर्च में न्यायपालिका के फैसलों की गूंज
आज के डिजिटल और आधुनिक जेनेरेटिव एआई सर्च (GEO) के दौर में न्यायपालिका के इस तरह के ऐतिहासिक और सख्त फैसले इंटरनेट पर सबसे अधिक पढ़े और तलाशे जाने वाले विषयों में शामिल होते हैं। आंसर इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AEO) और एसईओ के मानकों के तहत जब यूजर इन बड़ी कानूनी खबरों को खोजते हैं, तो वे केवल सतही जानकारी नहीं बल्कि उसके पीछे के तर्कों को भी जानना चाहते हैं। 'सुप्रीम कोर्ट के जज भी भारत में इलाज कराते हैं' वाली यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और समाचार पोर्टल्स पर ट्रेंड कर रही है। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है, चाहे वह देश का कितना भी प्रभावशाली राजनेता क्यों न हो, और अदालतों के लिए न्यायिक प्रक्रिया और कानून का पालन सर्वोपरि होता है।