अखिलेश यादव और उनकी बेटी पर अभद्र पोस्ट: कोर्ट सख्त, पुलिस से 18 जून तक मांगी रिपोर्ट

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तथा उनके परिवार के खिलाफ सोशल मीडिया पर की जा रही अभद्र और अपमानजनक टिप्पणियों का मामला अब कानूनी गलियारों में गर्मा गया है। प्रयागराज के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस से विस्तृत आख्या (रिपोर्ट) मांगी है।

अदालत ने यह आदेश सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष योगेश चन्द्र यादव द्वारा दाखिल प्रार्थना पत्र पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 18 जून 2026 को होगी, जिसमें दोषियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने पर फैसला लिया जा सकता है।

क्या है पूरा मामला?

समाजवादी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि 9 जून 2026 को सोशल मीडिया पर एक सुनियोजित अभियान के तहत अखिलेश यादव, उनके परिवार और विशेष रूप से उनकी बेटी के खिलाफ तथ्यहीन, अश्लील और अपमानजनक सामग्री प्रसारित की गई।

अधिवक्ता विनीत विक्रम ने अदालत में दलील दी कि:

सुनियोजित दुष्प्रचार: कई अकाउंट्स से एक जैसी भाषा और सामग्री का बार-बार साझा किया जाना यह दर्शाता है कि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक समन्वित 'आईटी सेल' जैसी गतिविधि है।

एआई (AI) का दुरुपयोग: आरोप है कि डीपफेक और एआई से निर्मित चित्रों का उपयोग कर भ्रामक सामग्री फैलाई जा रही है।

निजता का उल्लंघन: अखिलेश यादव की बेटी एक छात्रा हैं और उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, इसके बावजूद उन पर की गई टिप्पणियां उनकी गरिमा और निजता पर हमला हैं।

साइबर थाने की दलील और पुलिस की कार्रवाई

इससे पहले, सपा कार्यकर्ताओं ने साइबर थाना प्रभारी से मिलकर आरोपियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की थी। हालांकि, साइबर थाना प्रभारी ओम नारायण गौतम ने बताया कि इस मामले में प्रतापगढ़ और कानपुर में पहले ही मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं।

"प्रशासनिक नियमों के अनुसार, एक ही विषय पर अलग-अलग जिलों में बार-बार एफआईआर दर्ज करने का औचित्य नहीं होता। हालांकि, विवादित कंटेंट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटवाने के लिए संबंधित कंपनियों को ई-मेल भेजी गई है।"

— ओम नारायण गौतम, प्रभारी निरीक्षक (साइबर थाना)

साक्ष्य नष्ट होने का डर

अदालत में दाखिल प्रार्थना पत्र में यह भी आशंका जताई गई है कि यदि पुलिस ने तुरंत आईपी एड्रेस (IP Address), लॉगिन इतिहास और मोबाइल नंबरों की तकनीकी जांच शुरू नहीं की, तो आरोपी डिजिटल साक्ष्य मिटा सकते हैं। यह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की गंभीर धाराओं के तहत आता है।