बाढ़ की तबाही के बाद नेपाल ने भारत, अमेरिका और चीन से मांगा जलवायु मुआवजा; कहा- 'हमें दान नहीं

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नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी के बाद काठमांडू के रुख में एक अभूतपूर्व कूटनीतिक बदलाव देखने को मिला है। हिमालयी ग्लेशियर टूटने से मची भारी तबाही और 1,000 से अधिक मौतों के बीच नेपाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह दुनिया के बड़े और अमीर देशों के सामने राहत सामग्री या आर्थिक सहायता के लिए 'मदद' मांगने वाला याचक बनकर नहीं खड़ा रहेगा। नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी नीति को बदलते हुए 'सहायता' (Aid) से 'न्याय और मुआवजा' (Climate Justice and Compensation) की ओर मोड़ने का औपचारिक ऐलान किया है।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने टेलीविजन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को दिए बयानों में दो टूक कहा कि नेपाल एक ऐसे वैश्विक संकट की सबसे भयानक कीमत चुका रहा है, जिसे उसने खुद कभी पैदा ही नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कोई मानवीय दान या खैरात का विषय नहीं है, बल्कि दुनिया के बड़े औद्योगिक देशों की कानूनी, वित्तीय और नैतिक जवाबदेही का मामला है। नेपाल के वित्त मंत्रालय ने औपचारिक रूप से अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और वैश्विक जलवायु एजेंसियों को पत्र भेजकर इस विशाल क्षति की भरपाई के लिए मुआवजे का दावा ठोक दिया है।

0.04% बनाम 50% से अधिक उत्सर्जन: बड़े प्रदूषक देशों पर फूटा नेपाल का गुस्सा

नेपाल के इस आक्रामक रुख के केंद्र में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का असमान गणित है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी मात्र 0.04 प्रतिशत है, जो नगण्य के बराबर है। इसके विपरीत, नेपाल ने दुनिया के तीन सबसे बड़े औद्योगिक और आर्थिक महाशक्तियों—चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत को इस संकट के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार ठहराया है।

वैश्विक उत्सर्जन ट्रैकर के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले चीन वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के 33 प्रतिशत से अधिक हिस्से के लिए जिम्मेदार है। संयुक्त राज्य अमेरिका लगभग 11.7 प्रतिशत और भारत लगभग 8 प्रतिशत का योगदान करता है। यानी दुनिया का 50 फीसदी से ज्यादा कार्बन प्रदूषण इन्हीं तीन देशों की औद्योगिक गतिविधियों से निकलता है। नेपाल का सीधा तर्क है कि औद्योगीकरण और आर्थिक विकास का मुनाफा इन महाशक्तियों ने कमाया, जबकि उनके द्वारा फैलाए गए प्रदूषण से गर्म हो रहे वातावरण की मार नेपाल के मासूम नागरिकों, किसानों और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को झेलनी पड़ रही है।

'पहाड़ों की सुनामी' और अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे का विनाश

नेपाल सरकार ने 26 अगस्त को भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में आई बाढ़ को कोई साधारण मौसमी आपदा मानने से इनकार कर दिया है। विशेषज्ञों और उपग्रह विश्लेषणों के अनुसार, यह आपदा भारी बारिश से नहीं, बल्कि नेपाल-तिब्बत सीमा पर उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के विशाल हिस्से के अचानक ढहने (Glacial Collapse) से शुरू हुई थी। इस घटना ने पहाड़ों पर 20 से 30 मीटर ऊंची पानी और मलबे की दीवार खड़ी कर दी, जो 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घाटियों में उतरी।

इस 'पहाड़ी सुनामी' ने न केवल सैकड़ों बस्तियों और बत्तीस से अधिक नगरपालिका वार्डों को मलबे के नीचे दबा दिया, बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले जलविद्युत (हाइड्रोपावर) क्षेत्र को तबाह कर दिया। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में कई मल्टी-बिलियन डॉलर के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। पुनर्निर्माण और राहत की लागत कई अरब डॉलर (खरबों नेपाली रुपये) तक पहुंचने का अनुमान है, जिसे अकेले नेपाल जैसा विकासशील देश अपनी सीमित अर्थव्यवस्था के दम पर वहन नहीं कर सकता।

लॉस एंड डैमेज फंड: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कैसे दावा पेश कर रहा है नेपाल?

नेपाल ने अपने दावे को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के कानूनी तंत्र के तहत इसे आगे बढ़ाया है। वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और वन एवं पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी के संयुक्त हस्ताक्षर वाले एक आधिकारिक पत्र के जरिए नेपाल ने 'लॉस एंड डैमेज फंड' (Loss and Damage Fund) के बोर्ड से तत्काल आपातकालीन वित्तीय सहायता और मुआवजे की मांग की है।

उल्लेखनीय है कि 'लॉस एंड डैमेज फंड' की ऐतिहासिक रूपरेखा 2022 में मिस्र में आयोजित COP27 जलवायु सम्मेलन में तय की गई थी और इसे दुबई में आयोजित COP28 के दौरान लागू किया गया था। इस फंड का मूल उद्देश्य ही यह है कि जो गरीब और कमजोर देश जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम झेल रहे हैं, उन्हें अमीर और ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले देशों द्वारा सीधे वित्तीय क्षतिपूर्ति दी जाए। नेपाल इस वैश्विक फंड से ठोस राहत पाने वाले शुरुआती पर्वतीय देशों में अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है।

2 अरब लोगों के अस्तित्व और दक्षिण एशियाई जल सुरक्षा का संकट

काठमांडू स्थित 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) की वैज्ञानिक रिपोर्टों में लगातार चेतावनी दी जा रही है कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं। विदेश मंत्री खनाल ने रेखांकित किया कि यह मांग सिर्फ नेपाल की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दक्षिण एशियाई सभ्यता के अस्तित्व का सवाल है।

यदि हिमालयी ग्लेशियर इसी रफ्तार से नष्ट होते रहे, तो गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और त्रिशूली जैसी सदानीरा नदियों का जलस्तर पहले अनियंत्रित बाढ़ लाएगा और बाद में ये नदियां सूखने की कगार पर पहुंच जाएंगी। इससे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल सहित पूरे दक्षिण एशिया में रहने वाले 2 अरब से अधिक लोगों की पेयजल सुरक्षा, कृषि और खाद्य प्रणाली हमेशा के लिए तबाह हो जाएगी। इसलिए नेपाल का कहना है कि हिमालय की सुरक्षा के लिए बड़े देशों को तुरंत अपनी तिजोरी खोलनी होगी।

भारत और वैश्विक ताकतों का पक्ष: क्या नेपाल की मांग पर बनेगी सहमति?

नेपाल द्वारा मुआवजे की मांग किए जाने पर वैश्विक स्तर पर जटिल बहस शुरू हो गई है। भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'क्लाइमेट जस्टिस' (जलवायु न्याय) और 'कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटीज' (CBDR) का प्रबल समर्थक रहा है। भारत का ऐतिहासिक रुख यह रहा है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों जैसे पश्चिमी औद्योगिक राष्ट्रों ने पिछली दो शताब्दियों में अंधाधुंध जीवाश्म ईंधन जलाकर कार्बन बजट का सबसे बड़ा हिस्सा हड़प लिया है।

भारत का तर्क है कि विकासशील देशों की ऊर्जा जरूरतों और प्रति व्यक्ति कम उत्सर्जन को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही भारत ने संकट की इस घड़ी में नेपाल को तुरंत 57.5 टन से अधिक आपातकालीन राहत सामग्री, सैन्य दल और फॉरेंसिक विशेषज्ञ भेजकर पड़ोसी धर्म निभाया है। चीन ने भी टनल रेस्क्यू के लिए विशेषज्ञ टीमें तैनात की हैं।

हालांकि, नेपाल का स्पष्ट संदेश है कि आपदा के बाद भेजे जाने वाले कुछ टन राशन और रेस्क्यू उपकरण केवल तात्कालिक मरहम हैं, स्थायी समाधान नहीं। नेपाल अब वैश्विक सम्मेलनों में इस कानूनी सिद्धांत को मजबूती से स्थापित करने की तैयारी में है कि जो देश जितना अधिक वायुमंडल को प्रदूषित करेंगे, उन्हें प्रकृति के विनाश की उतनी ही बड़ी आर्थिक कीमत सीधे तौर पर चुकानी होगी।