चुनाव आयोग को मिला बड़ा अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने 'वोटर लिस्ट स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) को ठहराया वैध
India News Live,Digital Desk : लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची का सटीक होना सबसे अनिवार्य शर्त है। इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि निर्वाचन आयोग के पास वोटर लिस्ट को अपडेट करने, नाम जोड़ने और हटाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का कर्तव्य है। कोर्ट ने कहा कि पिछले चार दशकों से वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था, जिससे इसमें कई अशुद्धियां, दोहरे नाम और पलायन के कारण गलत डेटा शामिल हो गया था। बेंच ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव वोटर लिस्ट की अखंडता और विश्वसनीयता पर ही टिकी है, इसलिए आयोग द्वारा की गई यह कार्रवाई पूरी तरह उचित है।
नागरिकता पर अदालत की अहम टिप्पणी
नागरिकता के संवेदनशील मुद्दे पर कोर्ट ने स्थिति बिल्कुल साफ कर दी है। अदालत ने कहा कि:
चुनाव आयोग को जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत दस्तावेजों की जांच का अधिकार है, ताकि केवल पात्र मतदाता ही सूची में रहें।
यदि किसी के दस्तावेज संदेह पैदा करते हैं, तो आयोग नाम हटाने का फैसला ले सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात: वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है। नागरिकता का अंतिम फैसला केवल 'नागरिकता अधिनियम' के तहत सक्षम अधिकारी ही कर सकते हैं, चुनाव आयोग नहीं।
नाम कटने वालों के लिए राहत के निर्देश
कोर्ट ने उन लोगों के लिए एक सुरक्षा कवच भी तैयार किया है जिनके नाम नागरिकता के संदेह में हटाए गए थे:
चुनाव आयोग को ऐसे सभी मामले 4 सप्ताह के भीतर संबंधित सक्षम प्राधिकारियों को भेजने होंगे।
अगले चुनाव से पहले इन व्यक्तियों को सुनवाई का मौका दिया जाएगा।
अगर जांच में वे भारतीय नागरिक पाए जाते हैं, तो उनके नाम तुरंत वोटर लिस्ट में बहाल किए जाएंगे।
बिहार में 'अनुपस्थिति' के कारण गलती से हटाए गए नाम भी सत्यापन प्रक्रिया के जरिए वापस जोड़े जा सकेंगे।
क्यों शुरू हुआ था यह विवाद?
चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार से इस SIR प्रक्रिया की शुरुआत की थी, जिसे बाद में अन्य राज्यों में भी लागू किया गया। इसके तहत 2002-2003 की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर वंशावली साबित करने की मांग की गई थी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसे 'NRC जैसी प्रक्रिया' बताते हुए चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि इससे गरीब और प्रवासी वर्ग के लोग मतदान से वंचित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि यह कोई नागरिकता परीक्षण नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक सत्यापन है ताकि विदेशी नागरिकों को वोटिंग से रोका जा सके और लिस्ट की शुद्धता बनी रहे। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने ईसीआई के तर्कों को स्वीकार करते हुए इस संवैधानिक अधिकार पर अपनी मुहर लगा दी है।