ममता और स्टालिन की हार में छिपा है कांग्रेस का 'जीत' वाला गणित?
India News Live, Digital Desk: देश के राजनीतिक नक्शे पर विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक नई बहस छेड़ दी है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन की चुनावी हार ने न केवल उनके राज्यों की सत्ता बदली है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक बड़ा मोड़ ला दिया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या ममता और स्टालिन जैसे कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं की विदाई से सबसे ज्यादा खुशी कांग्रेस खेमे में है? आखिर क्यों राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए इन क्षत्रपों की हार एक 'छिपा हुआ आशीर्वाद' (Blessing in disguise) साबित हो सकती है, आइए समझते हैं।
I.N.D.I.A. गठबंधन में कम होगी 'बार्गेनिंग' की ताकत?
लंबे समय से कांग्रेस केंद्र में मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद क्षेत्रीय पार्टियों के दबाव में रहती आई है। विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' में ममता बनर्जी और स्टालिन जैसे नेताओं का कद इतना बड़ा था कि वे अक्सर कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल देते थे। चाहे सीट शेयरिंग का मुद्दा हो या प्रधानमंत्री पद की दावेदारी, ये क्षत्रप राहुल गांधी के नेतृत्व को खुलकर स्वीकार करने में हिचकते थे। जानकारों का मानना है कि राज्यों में इनकी पकड़ कमजोर होने से अब गठबंधन की ड्राइविंग सीट पर कांग्रेस का दबदबा बढ़ जाएगा।
कांग्रेस को दिख रहा है खोई हुई जमीन वापस पाने का मौका
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दो ऐसे राज्य हैं जहाँ कांग्रेस कभी बेहद मजबूत हुआ करती थी, लेकिन ममता और स्टालिन के उदय ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया। अब जबकि इन क्षेत्रीय दिग्गजों को जनता ने नकारा है, कांग्रेस को लगता है कि वह फिर से इन राज्यों में 'वैकल्पिक विपक्षी दल' के रूप में उभर सकती है। कांग्रेस की रणनीति अब उन वोटबैंक को वापस अपनी ओर खींचने की है, जो कभी उसका हुआ करता था लेकिन बाद में क्षेत्रीय दलों के पाले में चला गया।
राहुल गांधी के नेतृत्व को मिलेगी निर्विवाद स्वीकार्यता
राष्ट्रीय स्तर पर जब भी विपक्ष की बात होती थी, ममता बनर्जी अक्सर खुद को चेहरा बनाने की कोशिश करती थीं। वहीं, स्टालिन की डीएमके का दक्षिण भारत में प्रभाव कांग्रेस के लिए गठबंधन की मजबूरी बना हुआ था। इन दोनों नेताओं के चुनावी ग्राफ में गिरावट आने से अब राहुल गांधी के सामने विपक्षी खेमे में कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा है। इससे कांग्रेस को उम्मीद है कि 2029 के आम चुनाव में राहुल गांधी बिना किसी आंतरिक चुनौती के निर्विवाद नेता के रूप में उभरेंगे।
क्या क्षेत्रीय दलों का पतन कांग्रेस के लिए वरदान है?
भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जहाँ-जहाँ क्षेत्रीय दल कमजोर हुए हैं, वहां मुकाबला सीधा भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमट गया है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि अगर क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं, तो भाजपा विरोधी वोट छिटकने के बजाय सीधे कांग्रेस के पास आएंगे। हालांकि, यह राह इतनी आसान भी नहीं है, क्योंकि भाजपा इन राज्यों में खाली हुई जगह को भरने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी इस राजनीतिक बदलाव का कितना फायदा उठा पाते हैं।