अग्नि के बिना क्यों अधूरा है हर धार्मिक अनुष्ठान? जानिए अग्निदेव के पांच रूप, रहस्य और धार्मिक महत्व

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India News Live,Digital Desk : सनातन हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति में अग्निदेव को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय स्थान प्राप्त है। वे केवल एक तत्व नहीं, बल्कि वैदिक काल के सबसे प्रमुख और प्रत्यक्ष देवताओं में से एक हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ 'ऋग्वेद' का पहला मंत्र ही अग्निदेव की स्तुति से शुरू होता है— "ॐ अग्निमीले पुरोहितम् यज्ञस्य देवमृत्विजम्..."। ऋग्वेद का पहला पूरा अध्याय और उसके शुरुआती नौ श्लोक पूरी तरह से अग्निदेव को ही समर्पित हैं। हमारे महान ऋषियों ने हजारों साल पहले ही अग्नि के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व को पहचान लिया था। ऋषि यास्क ने अग्नि को 'अग्रणि' कहा है, जिसका सीधा अर्थ है—जिसका स्थान सबसे पहला और सर्वोच्च हो। आठ वसुओं में भी अग्निदेव को प्रथम स्थान प्राप्त है।

ब्रह्मांड और पृथ्वी पर मौजूद हैं अग्निदेव के ये अद्भुत रूप

अग्नि का एक दिव्य अर्थ यह भी है कि जो हमेशा ऊपर की ओर गति करता हो। संपूर्ण ब्रह्मांड में अग्नि मुख्य रूप से चार विशाल रूपों में विद्यमान है— पहली आकाश में साक्षात 'सूर्य' के रूप में, दूसरी अंतरिक्ष में कड़कने वाली 'विद्युत' (बिजली) के रूप में, तीसरी पृथ्वी पर प्रकट होने वाली 'साधारण अग्नि' के रूप में और चौथी पाताल लोक में धधकते 'ज्वालामुखी' के रूप में।

इसके साथ ही, पृथ्वी लोक पर मानव जीवन के बीच अग्नि के पांच रूप सबसे ज्यादा प्रसिद्ध और पूजनीय माने गए हैं:

यज्ञाग्नि: अग्नि का वह पावन रूप, जिसके माध्यम से मनुष्य लोक-कल्याण और विश्व शांति की भावना से यज्ञ कुंड में आहुति देकर भगवान की स्तुति करता है।

भोजाग्नि: यह रूप रसोई में भोजन पकाने के काम आता है। अग्नि के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए आज भी हमारे देश के अनेक पारंपरिक घरों में भोजन का पहला ग्रास (अग्निहोत्र) अग्निदेव को समर्पित करने के बाद ही भोजन बनाया और खाया जाता है।

जठराग्नि: यह मनुष्यों और जीवों के पेट में रहकर भोजन पचाने का कार्य करती है और मनुष्य को कर्म व पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरित करती है।

दावाग्नि: यह जंगलों में लगने वाली भीषण आग है, जो कई बार विनाशकारी रूप तो लेती है, लेकिन प्रकृति के पुराने स्वरूप को नष्ट कर नए सृजन का कारण भी बनती है।

श्मशान अग्नि: अग्निदेव अपने इस पांचवें और अंतिम रूप में मनुष्य के नश्वर शरीर (पार्थिव देह) को पवित्र कर उसे पुनः पंचतत्वों में विलीन कर देते हैं।

जब अग्निदेव ने अर्जुन को दिया 'गांडीव' और श्रीकृष्ण को मिली 'कौमोदकी' गदा

पौराणिक महाकाव्य 'महाभारत' में अग्निदेव से जुड़ी एक बेहद रोचक कथा का वर्णन मिलता है। राजा श्वेतकी द्वारा लगातार किए गए महायज्ञों में अत्यधिक घी की आहुतियां ग्रहण करने के कारण अग्निदेव को 'अजीर्ण' (अपच) की बीमारी हो गई थी और उनका तेज कम हो गया था। अपनी इस बीमारी को दूर करने और खोई हुई दिव्य शक्ति को दोबारा पाने के लिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की सहायता ली। श्रीकृष्ण और अर्जुन की मदद से उन्होंने 'खांडव वन' का दहन किया, जिससे उनकी बीमारी ठीक हो गई। इस सहायता से परम प्रसन्न होकर अग्निदेव ने अर्जुन को संसार का सबसे शक्तिशाली 'गांडीव' धनुष और भगवान श्रीकृष्ण को उनकी प्रसिद्ध 'कौमोदकी' गदा उपहार स्वरूप प्रदान की थी। इसी खांडव वन के दहन के बाद पांडवों ने वहां अपनी वैभवशाली राजधानी 'इंद्रप्रस्थ' राज्य की स्थापना की थी।

जानिए क्यों कहलाए 'सर्वभक्षी' और 'दंडाधीश'

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार अग्निदेव की अनजाने में दी गई प्रेरणा से 'पुलोम' नामक असुर ने महर्षि भृगु की परम पवित्र पत्नी 'पुलोमा' का बलपूर्वक अपहरण कर लिया था। जब महर्षि भृगु को इस पूरी सच्चाई का पता चला, तो उन्होंने क्रोधित होकर अग्निदेव को 'सर्वभक्षी' (सब कुछ खाने वाले) होने का भयंकर श्राप दे दिया। इसी श्राप के कारण अग्निदेव पवित्र और अपवित्र, सभी प्रकार के पदार्थों का सेवन करते हुए सर्वभक्षी देव बन गए। इसके अलावा, मनुष्यों द्वारा किए गए दुष्कर्मों और पापों का दंड देने का विशेष अधिकार भी अग्निदेव के पास ही है, यही वजह है कि शास्त्रों में इन्हें 'दंडाधीश' के नाम से भी पुकारा जाता है।

देवी 'स्वाहा' से हुआ विवाह और क्या है अग्निदेव का प्रिय भोजन?

अग्निदेव के जन्म और माता-पिता को लेकर शास्त्रों में कई मत हैं। ऋग्वेद में इन्हें 'शक्ति का पुत्र' माना गया है, तो कहीं-कहीं यह उल्लेख मिलता है कि वे सृष्टि के रचयिता परमात्मा के मुख से उत्पन्न हुए हैं। एक अन्य कथा के अनुसार, धर्म की 'निका वसु' नामक पत्नी से अग्निदेव का जन्म हुआ। अग्निदेव का विवाह प्रजापति कश्यप की परम विदुषी पुत्री देवी 'स्वाहा' से हुआ था। यही कारण है कि आज भी यज्ञ में कोई भी आहुति देते समय 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण अनिवार्य रूप से किया जाता है। इनके 'पावक', 'पवमान' और 'शुचि' नाम के तीन पराक्रमी पुत्र हुए और आगे चलकर इनके पुत्रों और पौत्रों की कुल संख्या उनन्चास (49) तक पहुंच गई।

ऋग्वेद के अनुसार, अग्निदेव मनुष्य लोक और देवलोक के बीच एक दिव्य पुल यानी 'संदेशवाहक' का कार्य करते हैं। हम यज्ञ कुंड में जो भी आहुतियां डालते हैं, उसे अग्निदेव देवताओं तक पहुंचाते हैं। इन्हें यज्ञों का राजा और दिव्य पुरोहित भी कहा जाता है। शुद्ध गाय का घी, यव (जौ), काले तिल, ताजा दही, चावल की खीर और श्रीखंड जैसी पवित्र मिठाइयां अग्निदेव का सबसे प्रिय भोजन हैं, जिन्हें वे अपनी सातों जिह्वाओं (अग्नि की सात लपटें) से ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म में चाहे विवाह का सात फेरा हो, मुंडन हो, गृह प्रवेश हो या कोई भी छोटा-बड़ा पूजन, अग्निदेव की साक्षात उपस्थिति के बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान कभी पूरा नहीं माना जाता।