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September 29 2026 01:41 pm

"तुम किस तरह के बेटे हो?"— सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही बुजुर्ग पिता से प्रॉपर्टी के लिए लड़ रहे शख्स को लगाई कड़ी फटकार

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माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत एक बुजुर्ग पिता द्वारा अपने ही बेटे को घर और संपत्ति से बेदखल करने के कानूनी आदेश को पूरी तरह सही ठहराया है। अदालत ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे बेटे की याचिका को सिरे से खारिज करते हुए उसे ऐसी तीखी फटकार लगाई, जिसकी चर्चा इस समय पूरे देश के कानूनी गलियारों और सामाजिक मंचों पर हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस पुराने फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है, जिसमें पीड़ित पिता के हक में बेटे को घर से बाहर निकालने का आदेश दिया गया था।

"उन्हें शांति से जीने दो"— कोर्ट रूम में न्यायाधीशों का फूटा गुस्सा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस बेहद संवेदनशील विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी। जैसे ही मामले की फाइल सामने आई और बेटे के वकील ने दलीलें रखनी शुरू कीं, बेंच का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। जस्टिस विक्रम नाथ ने याचिकाकर्ता बेटे को आड़े हाथों लेते हुए बेहद कड़े शब्दों में कहा, "तुम किस तरह के बेटे हो? अपने ही बुजुर्ग पिता के साथ इस तरह कोर्ट-कचहरी में लड़ रहे हो? यह समाज के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। यहाँ बहस करने की बजाय घर जाओ और अपने पिता की सेवा व देखभाल करो। उनके जीवन के जितने भी साल बचे हैं, कम से कम उन्हें तो शांति और सुकून से जीने दो।"

वकील ने दी पत्नी-बच्चों की दुहाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा— "नेक्स्ट केस"

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता बेटे के वकील वरुण भाटी ने अदालत के सामने अपनी बात रखने की कोशिश की और दलील दी कि उनके मुवक्किल का भी इस विवादित मकान पर कानूनी अधिकार बनता है, तो जस्टिस नाथ ने बिना वक्त गंवाए दो टूक अंदाज में कहा, "नहीं, अगला केस।" इसके बाद वकील ने भावनात्मक कार्ड खेलते हुए अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के ऊपर उसकी खुद की पत्नी और छोटे बेटे के भरण-पोषण की भी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है और इस बेदखली से उनका पूरा परिवार बेघर हो जाएगा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इन दलीलों में कोई कानूनी दम न पाते हुए इस पारिवारिक मामले में पिता के खिलाफ हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया।

जानिए क्या है राजस्थान का यह पूरा घरेलू जायदाद विवाद

यह पूरा विवाद राजस्थान के बिलाड़ा इलाके में स्थित एक आवासीय मकान से जुड़ा हुआ है। पीड़ित बुजुर्ग पिता ने अपने सगे बेटे के दुर्व्यवहार और रोज-रोज के झगड़ों से तंग आकर भरण-पोषण न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) का दरवाजा खटखटाया था। पिता का आरोप था कि उनका बेटा उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित और परेशान करता है, इसलिए उन्हें बुढ़ापे के इस पड़ाव में अपने ही घर के भीतर सुरक्षित और शांति से रहने के लिए सुरक्षा प्रदान की जाए। ट्रिब्यूनल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फरवरी 2024 में पिता की अर्जी स्वीकार की और बेटे को तत्काल घर खाली करने का फरमान सुना दिया। इस आदेश को बेटे ने राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल जज और फिर डिवीजन बेंच में चुनौती दी, लेकिन दोनों ही जगहों से उसे करारा झटका लगा और ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना गया।

"दादी के नाम पर था घर"— बेटे ने पैतृक संपत्ति का कानून के सामने रखा तर्क

सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी अंतिम याचिका में बेटे ने पैतृक संपत्ति के कानून का सहारा लेते हुए खुद का बचाव करने की पुरजोर कोशिश की थी। उसका दावा था कि यह विवादित घर कोई निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि एक पैतृक और अविभाजित पारिवारिक संपत्ति है, जिसे मूल रूप से साल 1986 में उसकी दिवंगत दादी के नाम पर खरीदा गया था। बेटे का तर्क था कि दादी के निधन के बाद इस घर पर परिवार के कई अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों का भी बराबर का हक बनता है, इसलिए इसे केवल उसके पिता की निजी मिल्कियत मानकर उसे बेघर नहीं किया जा सकता। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सालों से इसी छत के नीचे रह रहा है। उसने यह भी दलील दी कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का इस्तेमाल मालिकाना हक और विरासत जैसे जटिल दीवानी विवादों को निपटाने के लिए एक शॉर्टकट के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किए सारे दावे, पिता के सुकून को माना सर्वोपरि

बेटे की याचिका में बेदखली के कारण उसकी पत्नी और मासूम बच्चों के भविष्य पर पड़ने वाले बुरे सामाजिक व आर्थिक प्रभाव को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी। याचिका में यह बड़ा कानूनी सवाल भी उठाया गया था कि क्या किसी संपत्ति के मालिकाना हक का रेगुलर सिविल कोर्ट द्वारा विधिवत फैसला हुए बिना, किसी सह-मालिक को महज एक संक्षिप्त प्रशासनिक कार्यवाही के जरिए उसके एकमात्र निवास स्थान से बेदखल किया जा सकता है? हालांकि, देश की सबसे बड़ी अदालत को राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायसंगत फैसले में दखल देने का कोई भी ठोस या मजबूत कानूनी आधार नजर नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग पिता की सुरक्षा और मानसिक शांति को सर्वोपरि मानते हुए बेटे की याचिका को हमेशा के लिए खारिज कर दिया और पिता के पक्ष को अंतिम रूप से सही ठहराया।