अमेरिका-ईरान तनाव की मार: एअर इंडिया और इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बड़ी गिरावट, विदेशी एयरलाइंस को मिला फायदा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव का सीधा असर अब भारतीय विमानन क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत से अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने वाले यात्रियों की कुल संख्या में 10.5 फीसदी की गिरावट आई है, जो घटकर 1.7 करोड़ रह गई है। इस दौरान जहां भारतीय एयरलाइंस ने अपने यात्री आधार में भारी कमी देखी है, वहीं विदेशी एयरलाइंस की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
भारतीय एयरलाइंस की यात्री संख्या में भारी गिरावट
डेटा के मुताबिक, भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में 26 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। एअर इंडिया ग्रुप (एअर इंडिया और एअर इंडिया एक्सप्रेस) पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में 35 फीसदी की कमी आई है। वहीं, देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में भी 15.4 फीसदी की गिरावट देखी गई है, जो घटकर 33.4 लाख पर सिमट गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जून 2025 में हुए अहमदाबाद विमान हादसे के बाद सुरक्षा और परिचालन कारणों से विदेशी उड़ानों में की गई कटौती भी इस गिरावट का एक प्रमुख कारण है।
विदेशी एयरलाइंस और पश्चिमी कंपनियों का बढ़ा दबदबा
एक ओर जहां भारतीय कंपनियां चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही हैं, वहीं विदेशी एयरलाइंस अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं। एमिरेट्स की भारत से आने-जाने वाली यात्री संख्या सात फीसदी बढ़कर 14.8 लाख तक पहुंच गई है। इसके अलावा, लुफ्थांसा, स्विस और ब्रिटिश एयरवेज जैसी पश्चिमी विमानन कंपनियों ने भारत के लिए अपनी उड़ानों की आवृत्ति (Frequency) में इजाफा किया है। लुफ्थांसा ने 3.7 लाख तो ब्रिटिश एयरवेज ने 2.9 लाख से अधिक यात्रियों का सफर तय कराया है, जो भारतीय एयरलाइंस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र बंद होने का भी असर
भारतीय कंपनियों, विशेषकर दिल्ली हब से संचालित होने वाली उड़ानों के लिए पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद होना एक बड़ा आर्थिक नुकसान साबित हुआ है। लंबे रूट के कारण ईंधन की खपत बढ़ गई है और परिचालन लागत में भी भारी उछाल आया है, जिससे एअर इंडिया और इंडिगो जैसी कंपनियों को अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को लाभदायक बनाए रखने में संघर्ष करना पड़ रहा है।