यूपी चुनाव: कांग्रेस कहे 150 सीट, अखिलेश बोले- 'बात सीट की नहीं जीत की...
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आधिकारिक तारीखों के ऐलान से पहले ही सूबे का सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। 403 विधानसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य में मुख्य विपक्षी खेमे के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर जोरदार रस्साकशी जारी है। 'इंडिया' गठबंधन के दोनों प्रमुख सहयोगियों—समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर तलवारें खिंची नजर आ रही हैं। जहां कांग्रेस लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित होकर राज्य में कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की जिद पर अड़ी है, वहीं सपा का शीर्ष नेतृत्व और उसके नेता इसे जमीनी हकीकत से कोसों दूर बता रहे हैं। सपा नेताओं का साफ कहना है कि कांग्रेस को 50 सीटें भी मिल जाएं तो बहुत हैं, जिससे गठबंधन के भविष्य को लेकर सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सपा का रुख: जीतने की क्षमता और कैडर आधार ही बनेगा पैमाना
समाजवादी पार्टी के सांसद और वरिष्ठ नेता सीटों के बंटवारे को लेकर आक्रामक मुद्रा में हैं। सपा सांसद एस.पी. सिंह पटेल ने दो-टूक कहा है कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा केवल जीत की संभावना (विनेबिलिटी) और संगठन की वास्तविक ताकत के आधार पर ही तय होगा। सपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस का संगठन राज्य के अधिकांश जिलों में बूथ स्तर पर मौजूद नहीं है, ऐसे में उसे अधिक सीटें देना सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को वॉकओवर देने जैसा होगा। पार्टी के कई रणनीतिकारों का मानना है कि जमीनी हकीकत के हिसाब से कांग्रेस का वास्तविक हिस्सा महज 10 से 20 सीटों का ही बनता है, लेकिन गठबंधन धर्म निभाने के लिए उसे अधिकतम 50 सीटों तक सीमित किया जाना चाहिए।
'बात सीट की नहीं, जीत की है': अखिलेश यादव ने संभाला मोर्चा
सीटों को लेकर दोनों दलों के नेताओं की तीखी बयानबाजी जब खुले टकराव में बदलने लगी, तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने खुद स्थिति को संभालने के लिए हस्तक्षेप किया। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक संदेश साझा करते हुए लिखा:
"मकसद जब साफ हो तो हाथ-में-हाथ होता है! निगाह मंजिल पर हो तो सफर आसान होता है! बात बड़ी ये नहीं है कि गठबंधन में कितनी सीटें या कौन सी सीट किसके पास जा रही है, बात बड़ी ये है कि हम सबको ये सुनिश्चित करना है कि जीत गठबंधन की हो। फिर दोहराते हैं: बात सीट की नहीं, जीत की है।"
अखिलेश यादव के इस दखल के पीछे दोहरी रणनीति मानी जा रही है। पहला, वह भाजपा को इस बात का मौका नहीं देना चाहते कि विपक्षी एकता में दरार का संदेश जनता तक जाए। दूसरा, उन्होंने अपनी पार्टी के बड़बोले नेताओं को सख्त ताकीद की है कि वे सीट शेयरिंग पर सार्वजनिक बयानबाजी करने के बजाय अपनी राय केवल पार्टी फोरम के भीतर ही रखें।
कांग्रेस का विस्तार बनाम सपा की सत्ता में वापसी की लड़ाई
उत्तर प्रदेश का यह चुनाव दोनों ही दलों के राजनीतिक वजूद के लिहाज से बेहद नाजुक मोड़ पर है। भाजपा जहां प्रदेश में लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रचने की तैयारी में है, वहीं अखिलेश यादव की अगुवाई में सपा सत्ता में वापसी के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह गठबंधन के सहयोगियों को साधे रखें, लेकिन साथ ही सपा के मजबूत उम्मीदवारों की सीटें काटकर पार्टी को नुकसान न होने दें।
दूसरी तरफ, कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सीटों की संजीवनी के बाद उत्तर प्रदेश में अपना खोया हुआ जनाधार दोबारा पाने और संगठन में जान फूंकने के मौके के तौर पर इस चुनाव को देख रही है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की 150 सीटों की मांग दबाव बनाने की रणनीति से अधिक कुछ नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, कांग्रेस के पास भाजपा को सीधे टक्कर देने लायक मजबूत संगठनात्मक ढांचा अभी तैयार नहीं है, ऐसे में अगर बातचीत 60 से 70 सीटों के सम्मानजनक आंकड़े पर सहमति में बदलती है, तभी गठबंधन भाजपा को कड़ी चुनौती पेश कर पाएगा।