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October 07 2026 07:38 pm

'रूस तब भी भारत के साथ खड़ा था, जब बाकी दुनिया पाकिस्तान के पीछे थी': मॉस्को संग रिश्तों पर एस. जयशंकर का पश्चिमी देशों को दो-टूक जवाब

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वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी पर सवाल उठाने वाले पश्चिमी देशों को विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक बार फिर आईना दिखाया है। एक अंतरराष्ट्रीय संवाद सत्र के दौरान मॉस्को के साथ भारत के संबंधों पर पूछे गए तीखे सवालों का जवाब देते हुए जयशंकर ने कूटनीतिक स्पष्टता के साथ ऐतिहासिक संदर्भ सामने रखे।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नई दिल्ली और मॉस्को के रिश्ते किसी तात्कालिक राजनीतिक सुविधा पर नहीं, बल्कि दशकों के गहरे रणनीतिक भरोसे और परखे हुए इतिहास पर टिके हैं।

'जब सब पाकिस्तान के साथ थे, तब रूस ने दिया सहारा'

पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर रूस से दूरी बनाने के बनाए जा रहे परोक्ष दबाव पर जयशंकर ने शीत युद्ध के दौर और भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की याद दिलाई:

ऐतिहासिक समर्थन: जयशंकर ने कहा, "आजादी के बाद के दशकों में जब पश्चिमी दुनिया की अधिकांश ताकतें पाकिस्तान के पीछे खड़ी थीं और उसे सैन्य व राजनीतिक समर्थन दे रही थीं, उस दौर में केवल सोवियत संघ (रूस) ही था जो भारत के हितों की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़ा रहा।"

1971 का युद्ध और यूएन वीटो: उन्होंने याद दिलाया कि चाहे 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हो या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में कश्मीर पर भारत विरोधी प्रस्तावों को रोकना, मॉस्को ने हमेशा भारत की संप्रभुता का सम्मान किया और जरूरत पड़ने पर वीटो पावर का इस्तेमाल कर पश्चिमी दबाव को बेअसर किया।

सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति: ऐसे समय में जब पश्चिमी देशों ने भारत को आधुनिक रक्षा हथियार देने से इनकार कर दिया था, रूस ने भारतीय सेना को मजबूत बनाने के लिए जरूरी तकनीक और साजो-सामान मुहैया कराया।

'पश्चिमी देशों का अपना इतिहास है, हमारा अपना अनुभव'

विदेश मंत्री ने पश्चिमी विश्लेषकों के दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हर देश के अंतरराष्ट्रीय संबंध उसके अपने राष्ट्रीय हितों और ऐतिहासिक अनुभवों से तय होते हैं:

यूरोपीय नजरिए से अलग दृष्टि: जयशंकर ने रेखांकित किया कि यूरोप का रूस को देखने का चश्मा द्वितीय विश्व युद्ध और सोवियत विस्तारवाद से जुड़ा हो सकता है, लेकिन भारत का अनुभव इससे बिल्कुल अलग रहा है।

भरोसेमंद साझेदार: भारत और रूस के बीच पिछले सात दशकों में कभी कोई प्रत्यक्ष सीमा विवाद या रणनीतिक टकराव नहीं रहा, जिसने इस साझेदारी को दुनिया के सबसे स्थिर द्विपक्षीय संबंधों में से एक बनाया है।

'रणनीतिक स्वायत्तता' से समझौता नहीं करेगा भारत

डॉ. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) पर मजबूती से कायम है:

सबके साथ संतुलन: भारत क्वाड (QUAD) के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत इंडो-पैसिफिक साझेदारी बना रहा है, वहीं ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के जरिए यूरेशियाई शक्तियों के साथ भी तालमेल बनाए हुए है।

ऊर्जा और राष्ट्रीय हित: रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने के फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने दोहराया कि भारत सरकार का पहला दायित्व अपने 140 करोड़ नागरिकों के लिए सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा सुनिश्चित करना और घरेलू महंगाई पर नियंत्रण रखना है।

जयशंकर का यह बयान एक बार फिर वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र और राष्ट्रीय हित-केंद्रित विदेश नीति की दृढ़ता को रेखांकित करता है।