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July 29 2026 05:33 am

हर तीन साल में एक बार आता है यह दुर्लभ व्रत, सुख-समृद्धि के लिए जरूर पढ़ें भगवान गणेश की ये दो पौराणिक कथाएं

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हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व है, जो पूरी तरह से विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश को समर्पित है। लेकिन इन सभी चतुर्थियों में 'विभुवन संकष्टी चतुर्थी' को सबसे ज्यादा दुर्लभ और फलदायी माना गया है। यह पावन व्रत हर साल नहीं आता, बल्कि हर तीन साल में एक बार जब 'अधिकमास' (पुरुषोत्तम मास) आता है, तब उसके कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। साल 2026 में यह अद्भुत और दुर्लभ संयोग 3 जून 2026 (बुधवार) के दिन बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चतुर्थी तिथि और बुधवार का दिन, ये दोनों ही भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय हैं। ऐसे में बुधवार के दिन विभुवन संकष्टी चतुर्थी का आना इस व्रत के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और बप्पा की सच्ची भक्ति से पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े संकटों का नाश होता है और घर में सुख-शांति व समृद्धि का वास होता है। इस पावन अवसर पर पूजा के साथ इन दो पौराणिक व्रत कथाओं को पढ़ने या सुनने से बप्पा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

पहली पौराणिक कथा: जब भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को बताया इस व्रत का महत्व

विभुवन संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी पहली कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव कौरवों से जुए में अपना राजपाठ, धन-दौलत और पूरा साम्राज्य हार गए थे, तब उन्हें जंगलों में दर-दर भटकना पड़ रहा था। वनवास के दौरान अत्यधिक कष्ट झेल रहे पांडव अपने दुखों से मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से पूछा, "हे प्रभु! कृपा करके हमें कोई ऐसा मार्ग या व्रत बताइए, जिससे हमारे इन भयंकर कष्टों का अंत हो सके और हम अपना खोया हुआ राज्य और सम्मान दोबारा वापस पा सकें।"

युधिष्ठिर की व्याकुलता देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उन्हें 'विभुवन संकष्टी चतुर्थी' व्रत के बारे में बताया। श्रीकृष्ण ने कहा कि अधिकमास में आने वाली यह चतुर्थी साक्षात भगवान गणेश की दिव्य शक्तियों से जुड़ी है, जो मनुष्यों को मनवांछित फल देने वाली और हर प्रकार के संकटों का समूल नाश करने वाली है। भगवान कृष्ण के आदेशानुसार, पांचों पांडवों ने माता द्रौपदी के साथ मिलकर पूरी श्रद्धा और कड़े नियमों के साथ यह व्रत किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव और भगवान गणेश की असीम कृपा से पांडवों के सभी कष्ट धीरे-धीरे दूर हो गए और अंत में उन्होंने महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त कर अपना खोया हुआ वैभवशाली साम्राज्य वापस पा लिया।

दूसरी पौराणिक कथा: जब प्रथम पूज्य बनने के लिए भगवान गणेश ने चली अनूठी चाल

भगवान गणेश से जुड़ी एक अन्य बेहद लोकप्रिय और शिक्षाप्रद कथा भी प्रचलित है। इसके अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं पर कोई बहुत बड़ा और भारी संकट आ गया। देवताओं ने उस संकट से उबरने की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन जब कोई हल नहीं निकला, तो वे सभी व्याकुल होकर महादेव भगवान शिव के पास मदद मांगने पहुंचे। देवताओं की गुहार सुनकर भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों—भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय को पास बुलाया और उनसे देवताओं के इस संकट को दूर करने के लिए कहा। दोनों ही भाइयों ने इस कार्य के लिए तुरंत हामी भर दी।

अब दुविधा यह थी कि इस कार्य की शुरुआत पहले कौन करे? तब भगवान शिव ने दोनों की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने के लिए एक शर्त रखी। महादेव ने कहा, "तुम दोनों में से जो भी अपनी सवारी पर बैठकर पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर सबसे पहले मेरे पास वापस लौटेगा, उसे ही देवताओं के इस संकट को हल करने का पहला अवसर और श्रेय मिलेगा।"

पिता की बात सुनते ही भगवान कार्तिकेय बिना एक पल गंवाए अपने तीव्र गति वाले वाहन 'मोर' पर सवार होकर ब्रह्मांड और पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। दूसरी ओर, भगवान गणेश शांत भाव से वहीं खड़े रहे। उनका वाहन एक छोटा सा 'मूषक' (चूहा) था, जिसकी गति मोर के मुकाबले बहुत धीमी थी। गणेश जी ने ठंडे दिमाग से सोचा कि मूषक पर बैठकर पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना बेहद कठिन और समय लेने वाला काम है।

तभी बप्पा को एक अद्भुत उपाय सूझा। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देते हुए पृथ्वी का चक्कर लगाने के बजाय, वहीं सिंहासन पर बैठे अपने माता पार्वती और पिता भगवान शिव के चारों ओर सात परिक्रमाएं पूरी कर लीं और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जब महादेव ने उनसे इसका कारण पूछा, तो भगवान गणेश अत्यंत मधुर वाणी में बोले, "हे माता-पिता! शास्त्रों के अनुसार माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण संसार और ब्रह्मांड समाहित है। इसलिए आपके चरणों की परिक्रमा करना पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने से कहीं बढ़कर है।"

भगवान गणेश का यह परम ज्ञानी और तार्किक उत्तर सुनकर भगवान शिव, माता पार्वती और वहां मौजूद सभी देवी-देवता गदगद हो गए। बप्पा की इस कुशाग्र बुद्धि को देखकर उन्हें सभी देवताओं के संकट को दूर करने के लिए चुना गया। इसके बाद भगवान गणेश ने अपनी शक्तियों से देवताओं पर आए उस भीषण संकट को पल भर में दूर कर दिया। तभी से भगवान गणेश को 'विघ्नहर्ता' कहा जाने लगा और वे अग्रपूज्य यानी सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता बने।