The sacred story of Manikarnika Ghat : पार्वती के श्राप से क्यों जलती हैं चिताएँ हमेशा

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India News Live,Digital Desk : वाराणसी के मणिकर्णिका घाट को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और रहस्यमयी स्थलों में से एक माना जाता है। यह घाट गंगा नदी के तट पर है और इसे महाश्मशान कहा जाता है क्योंकि यहाँ 24 घंटे चिताएँ जलती रहती हैं और मान्यता है कि यहाँ अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष (जन्म‑मरण के चक्र से मुक्ति) मिलती है। यही वजह है कि लोग इसे जीवन‑मरण के बाद की यात्रा का एक महत्वपूर्ण बिंदु मानते हैं। 

मणिकर्णिका घाट का नाम और इसके पीछे की कथा भी खास रूप से जुड़ी हुई है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक बार देवी पार्वती ने इसी घाट पर स्नान किया था और उस दौरान उनकी एक कान की बाली (मणि) गंगा के किनारे गिर गई थी। इसे ढूंढने के लिए भक्ति और प्रयास जारी रहे, लेकिन बाली नहीं मिली। कथाओं के अनुसार, पार्वती के क्रोध और निराशा के कारण उन्होंने यहाँ एक प्रकार का शाप दिया कि यह स्थान हमेशा आग से प्रकाशित रहेगा — यानी चिताएँ निरंतर जलती रहेंगी। इसी वजह से मणिकर्णिका घाट को हमेशा दाह संस्कार और अग्नि‑प्रक्रिया से भरा हुआ माना जाता है। 

एक अन्य कथा यह भी है कि भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर तपस्या की थी, और भगवान शिव और पार्वती भी वहाँ आए थे। जब विष्णु की तपस्या से गंगा के पास बना कुंड बन रहा था, तब पार्वती की बाली उसी में गिर गई। यह घटना भी मणिकर्णिका घाट के नाम के पीछे की एक वजह बताई जाती है। 

इन कथाओं के कारण मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक अंतिम संस्कार स्थल नहीं बल्कि धर्म, आस्था, जीवन‑मरण और मोक्ष की प्रतीक स्थल माना जाता है। यहाँ की अग्नि और चिताएँ इसे एक अंतिम यात्रा का द्वार बनाती हैं, जहाँ आत्मा को शांति और मुक्ति मिलने की आशा होती है।