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July 31 2026 06:16 pm

Nepal Political Crisis: जिस 'जेन-जी' ने बालेन शाह को बनाया नेपाल का PM, अब वही मांग रही इस्तीफा

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क: नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। पारंपरिक राजनीतिक दलों और भ्रष्टाचार से तंग आकर पिछले साल नेपाल की सत्ता पर क्रांतिकारी बदलाव करने वाले युवा प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) खुद अपनों के ही चक्रव्यूह में फंस गए हैं। जिस 'जेन-जी' (Gen-Z) और युवा छात्र वोटर्स ने बालेन शाह को एक 'सिस्टम रिफॉर्मर' के रूप में देखकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचाया था, आज वही छात्र संगठन सड़कों पर उतरकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

काठमांडू की सड़कों पर प्रधानमंत्री के खिलाफ मशाल जुलूस निकाले जा रहे हैं और देश के 10 प्रमुख छात्र संगठनों ने पीएम के ताजा बयान को पूरी तरह से 'राष्ट्रविरोधी' करार दिया है।

विवाद की असली वजह: भारत को लेकर दिया गया 'अजीबो-गरीब' बयान

बालेन शाह के खिलाफ युवाओं और राष्ट्रवादी खेमे के भड़कने की ताजा और सबसे मुख्य वजह संसद में दिया गया उनका एक गैर-जिम्मेदाराना बयान है। बालेन शाह ने हाल ही में भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चल रहे सुगौली संधि कालीन कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा सीमा विवाद को लेकर संसद में भाषण दिया।

क्या कहा था बालेन शाह ने?

प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपने भाषण में कहा, "जिस तरह भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, उसी तरह नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है।" इसके साथ ही उन्होंने इस सदियों पुराने द्विपक्षीय विवाद को सुलझाने के लिए ब्रिटेन और चीन जैसे तीसरे देशों से मदद लेने की वकालत भी कर डाली।

पीएम का यह बयान आते ही नेपाल का पूरा राष्ट्रवादी धड़ा और छात्र संगठन भड़क उठे। विपक्ष ने इसे नेपाल के पारंपरिक क्षेत्रीय दावों को कमजोर करने वाला और देश की संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए संसद ठप कर दी है। छात्रों का कहना है कि यह केवल 'जुबान फिसलने' का मामला नहीं है, बल्कि नेपाल के राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता है।

नेपाली छात्रों की नाराजगी के 2 मुख्य कारण

कारणप्रभाव और पृष्ठभूमि
सीमा विवाद पर कमजोर रुखछात्रों का आरोप है कि पीएम ने भारत के सामने नेपाल का पक्ष कमजोर किया है। 10 छात्र संगठनों के गठबंधन ने अल्टीमेटम दिया है कि पीएम या तो अपना बयान वापस लेकर जनता से माफी मांगें, अन्यथा पद से इस्तीफा दें।
छात्र राजनीति पर प्रतिबंध का गुस्सानाराजगी सिर्फ इस बयान से नहीं है। इस साल की शुरुआत में बालेन शाह सरकार ने अपने 'सुधारवादी एजेंडे' के तहत शैक्षणिक संस्थानों से छात्र राजनीति को सीमित करने का आदेश दिया था। हालांकि, नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी, जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई थी और छात्र तब से मौके की तलाश में थे।

भारत ने दिया करारा जवाब: तीसरे पक्ष की भूमिका को सिरे से नकारा

नेपाली प्रधानमंत्री द्वारा इस विवाद में चीन और ब्रिटेन को घसीटने की कोशिश पर भारत सरकार ने भी बेहद कड़ा और दोटूक जवाब दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दिल्ली में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान साफ किया कि भारत और नेपाल के बीच किसी भी तीसरे पक्ष (Third Party) की दखलअंदाजी को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जायसवाल ने कहा, "सीमा से जुड़े सभी मुद्दों के समाधान के लिए भारत और नेपाल के बीच पहले से ही मजबूत द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है। सभी संबंधित पक्षों को यह पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि इस मामले में किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं है।"

98% सीमा निर्धारित, गंडक नदी है मुख्य कारण

भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि भारत और नेपाल की लगभग 98 प्रतिशत सीमा पूरी तरह निर्धारित हो चुकी है। कुछ हिस्से जो अभी अनसुलझे हैं, उनकी मुख्य वजह गंडक नदी के मार्ग में समय-समय पर होने वाला बदलाव है। इसके अलावा, सीमा के कुछ चिह्नित क्षेत्रों में 'नो-मैन्स लैंड' पर अतिक्रमण और अवैध कब्जे के मामले हैं, जिन्हें दोनों देश आपस में मिलकर सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत ने हमेशा इस बात को दोहराया है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भारत के उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा हैं।