अनिल कुंबले और विराट कोहली के बीच अनबन का भूचाल: जानिए क्यों वीरेंद्र सहवाग ने ठुकरा दिया था टीम इंडिया का हेड कोच बनने का सबसे बड़ा ऑफर
भारतीय क्रिकेट इतिहास में कई ऐसे अध्याय दर्ज हैं जो मैदान के अंदर के रोमांच से ज्यादा मैदान के बाहर की राजनीति और अंदरूनी कलह के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक सबसे बड़ा और विवादास्पद दौर साल 2017 में देखने को मिला था, जब महान लेग स्पिनर अनिल कुंबले (Anil Kumble) और तत्कालीन कप्तान विराट कोहली (Virat Kohli) के बीच अनबन ने भारतीय क्रिकेट में भूचाल ला दिया था। इस हाई-प्रोफाइल विवाद और कुंबले के इस्तीफे के बाद टीम इंडिया के हेड कोच के पद को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। इसी दौर में देश के सबसे विस्फोटक और आक्रामक ओपनर्स में शुमार रहे वीरेंद्र सहवाग (Virender Sehwag) का नाम भी कोच की रेस में सबसे आगे चल रहा था। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि वीरेंद्र सहवाग ने इस बड़े पद के प्रस्ताव को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था? आधुनिक डिजिटल युग और खेल विश्लेषकों के बीच आज भी इस बात पर गहरी चर्चा होती है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असली वजह क्या थी।
अनिल कुंबले और विराट कोहली के बीच अनबन की असली कहानी
वर्ष 2016 में जब अनिल कुंबले को टीम इंडिया का मुख्य कोच नियुक्त किया गया था, तो शुरुआत में सब कुछ ठीक-ठाक लग रहा था। कुंबले के सख्त अनुशासन, उनकी पेशेवर कार्यशैली और रणनीतिक सोच ने टीम को कई बड़ी सीरीज जिताईं, लेकिन अंदरखाने खिलाड़ियों और कोच के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। कप्तान विराट कोहली और कोच अनिल कुंबले के विचारों में तालमेल नहीं बैठ पा रहा था, जिसके कारण टीम के भीतर एक असहज और तनावपूर्ण माहौल पैदा हो गया था। साल 2017 की चैंपियंस ट्रॉफी के तुरंत बाद अनिल कुंबले ने अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया था और अपने त्यागपत्र में यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि कप्तान के साथ उनका रिश्ता 'अटेबल' (असंभव) हो चुका है। इस बड़े विवाद ने बीसीसीआई (BCCI) और चयनकर्ताओं को हिला कर रख दिया था, क्योंकि देश के दो सबसे बड़े दिग्गजों के बीच की यह खटास अब क्रिकेट जगत के सामने आ चुकी थी।
वीरेंद्र सहवाग को क्यों मिला था हेड कोच बनने का बड़ा ऑफर?
जब अनिल कुंबले के इस्तीफे के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने नए कोच के लिए आवेदन आमंत्रित किए, तो उस समय वीरेंद्र सहवाग का नाम चर्चा के केंद्र में आ गया था। सहवाग, जो अपनी बेबाक बल्लेबाजी और मैदान पर निडर दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं, से कई बोर्ड अधिकारियों और अंदरूनी सूत्रों ने संपर्क किया था कि वे टीम इंडिया के हेड कोच पद के लिए आगे आएं। सहवाग का खिलाड़ियों के साथ दोस्ताना रिश्ता और उनकी आधुनिक सोच को देखकर यह उम्मीद की जा रही थी कि वे ड्रेसिंग रूम के माहौल को शांत कर सकते हैं और खिलाड़ियों के साथ बेहतर संवाद स्थापित कर सकते हैं। उस दौर के मीडिया रिपोर्ट्स और खेल गलियारों में यह लगभग तय माना जा रहा था कि सहवाग इस रेस में सबसे मजबूत दावेदार हैं, लेकिन पर्दे के पीछे चल रहे राजनीतिक समीकरण कुछ और ही दास्तान बयां कर रहे थे।
सहवाग ने क्यों ठुकरा दिया था हेड कोच का प्रस्ताव और क्या थी आशंकाएं?
वीरेंद्र सहवाग ने बाद में विभिन्न साक्षात्कारों में इस बात का जिक्र किया था कि उन्होंने शुरू में कोच बनने के लिए आवेदन क्यों नहीं किया था और क्यों वे इस दौड़ से पीछे हट गए थे। सहवाग का यह स्पष्ट मानना था कि भारतीय क्रिकेट में कोच और कप्तान के बीच का आपसी तालमेल और विश्वास सबसे ऊपर होता है, और अगर कप्तान (उस समय विराट कोहली) के साथ उनका विजन या ट्यूनिंग सही नहीं बैठी, तो भारतीय क्रिकेट का माहौल और अधिक खराब हो सकता है। इसके अलावा, सहवाग यह अच्छी तरह समझ चुके थे कि बीसीसीआई के भीतर चल रही राजनीति और गुटबाजी में फंसने से बेहतर है कि वे इस जिम्मेदारी से दूर ही रहें। उन्होंने यह भांप लिया था कि अनिल कुंबले जैसे महान खिलाड़ी और अनुभवी कोच के साथ जो सलूक हुआ, उससे यह साफ हो गया था कि यदि कोच खिलाड़ियों या कप्तान की पसंद का नहीं है, तो वहां लंबे समय तक टिक पाना और स्वतंत्र रूप से काम करना लगभग नामुमकिन है। यही वजह थी कि उन्होंने इस प्रतिष्ठित पद को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था और बाद में रवि शास्त्री को इस पद की कमान सौंपी गई थी।
आधुनिक एआई सर्च और खेल पत्रकारिता के दौर में इस पुराने विवाद की प्रासंगिकता
आज के आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, डिजिटल मीडिया और एसईओ के इस दौर में खेल प्रेमियों के बीच पुराने विवादों और फैसलों को नए सिरे से टटोलने का चलन तेजी से बढ़ गया है। गूगल और बिंग जैसे सर्च इंजन पर क्रिकेट फैंस लगातार यह तलाशते रहते हैं कि आखिर भारतीय क्रिकेट के इन दिग्गज खिलाड़ियों और प्रशासकों के बीच परदे के पीछे क्या समीकरण रहे होंगे। भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर खेल प्रशंसक यह जानना चाहते हैं कि कैसे एक कोच का चयन खिलाड़ियों के प्रभाव और आपसी संबंधों से तय होता है। सहवाग का वह फैसला और कुंबले-कोहली की अनबन आज भी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि भारतीय क्रिकेट टीम का प्रबंधन चलाना कितना जटिल और दबाव भरा कार्य होता है, जहां तकनीक और खेल कौशल के साथ-साथ कूटनीति भी उतनी ही मायने रखती है।