तो क्या हार के बाद भी सियासी जीत उद्धव ठाकरे की? BMC में ऐसे मजबूत विपक्ष बनकर उभरेगी शिवसेना (UBT)

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India News Live,Digital Desk : मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) भले ही सत्ता से बाहर रह गई हो, लेकिन नतीजों के बाद पार्टी को कमजोर आंकना जल्दबाजी होगी। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने अनुभवी और पुराने पार्षदों के दम पर बीएमसी सदन में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। यही वजह है कि आने वाले समय में शिवसेना (यूबीटी) बीएमसी में एक सशक्त और आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने की तैयारी में दिख रही है।

227 सदस्यीय बीएमसी में यह मुकाबला सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि अनुभव और राजनीतिक पकड़ का भी है।

अनुभव बनाम नए चेहरे, यहीं से शुरू होगी सियासत

शिवसेना (शिंदे गुट) से चुनकर आए 29 पार्षदों में से करीब 20 नए चेहरे हैं। इसके उलट शिवसेना (यूबीटी) की ओर से कई ऐसे नेता पार्षद बनकर सदन में पहुंचे हैं, जो पहले भी नगर निगम की सत्ता और प्रशासन का अनुभव रखते हैं। यही अनुभव आने वाले महीनों में बीएमसी की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

विशेषज्ञों की मानें तो सदन में नए और पुराने नेताओं की यह टकराहट कई अहम मुद्दों पर तीखी बहस और राजनीतिक रणनीति को जन्म दे सकती है।

शिवसेना (यूबीटी) के खाते में चार पूर्व महापौर

इस चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) से चार पूर्व महापौर पार्षद बनकर चुने गए हैं। इनमें किशोरी पेडणेकर, विशाखा राउत, श्रद्धा जाधव और मिलिंद वैद्य शामिल हैं। इसके अलावा पार्टी से दो पूर्व उपमहापौर हेमांगी वर्लीकर और सुहास वाडकर भी जीतकर सदन में पहुंचे हैं।

पूर्व महापौर विश्वनाथ महादेश्वर की पत्नी पूजा महादेश्वर का भी पार्षद बनकर आना पार्टी के लिए अनुभव और राजनीतिक विरासत दोनों को मजबूत करता है।

कोविड काल की पहचान बनी किशोरी पेडणेकर

पूर्व महापौर किशोरी पेडणेकर का नाम मुंबई की राजनीति में खास पहचान रखता है। कोविड-19 महामारी के दौरान वह महापौर थीं और उस समय बीएमसी के कामकाज में उनकी सक्रिय भूमिका लगातार चर्चा में रही। पेशे से नर्स रहीं किशोरी पेडणेकर को महामारी के चरम दौर में मुंबई की गलियों, सड़कों और बीएमसी अस्पतालों में निरीक्षण करते देखा गया। कई मौकों पर उन्होंने नर्स की वर्दी पहनकर भी काम किया, जिससे उनकी जमीनी छवि और मजबूत हुई।

बीएमसी की राजनीति में शिवसेना की पुरानी विरासत

शिवसेना का बीएमसी से रिश्ता दशकों पुराना रहा है। पार्टी ने डॉ. मनोहर जोशी जैसे महापौर दिए, जो आगे चलकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष बने। इसी तरह छगन भुजबल, जो अब अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में मंत्री हैं, भी बीएमसी की राजनीति से निकलकर उपमुख्यमंत्री तक पहुंचे।

यही इतिहास शिवसेना (यूबीटी) को यह भरोसा देता है कि बीएमसी में विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत रख सकती है।

आने वाले महीनों में दिखेगा बीएमसी का असली सियासी रंग

सत्ता से बाहर होने के बावजूद अनुभवी पार्षदों की मौजूदगी, प्रशासन की गहरी समझ और बीएमसी पर पुरानी पकड़ शिवसेना (यूबीटी) को मजबूत विपक्ष बनाती है। ऐसे में आने वाले महीनों में बीएमसी सदन में तीखी बहस, राजनीतिक रणनीति और कई नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।

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