Sharadiya Navratri : जूही, जंगली और कुष्मांडा देवी मंदिर में भक्तों की भीड़ और तैयारी

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India News Live,Digital Desk : शारदीय नवरात्र 22 सितंबर से शुरू होने जा रहे हैं और कानपुर में इन तीन देवी मंदिरों के दर्शन किए बिना नवरात्र अधूरी सी लगती है। इनमें से एक मंदिर तो शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है।

भक्तों की भीड़ को ध्यान में रखते हुए मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने बिजली, पानी और सफाई जैसी आवश्यक सुविधाओं को दुरुस्त किया है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आने-जाने के रास्तों को भी व्यवस्थित किया गया है। सुरक्षा के लिए पुलिस की तैनाती के साथ सीसीटीवी कैमरों का जाल लगाया गया है, ताकि हर आने-जाने वाले पर नजर रखी जा सके। मंदिर में पुरुष और महिला भक्तों के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकासी व्यवस्था की गई है।

जूही बारा देवी मंदिर

यह मंदिर लगभग 1700 साल पुराना है और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। कहानी है कि 12 बहनें पिता से अनबन के बाद यहां आकर रहने लगी थीं, और बाद में वे पत्थर बन गईं। उनके श्राप से पिता भी पत्थर बन गए। तभी से यह मंदिर पूजा का केंद्र बन गया।

भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर चुनरी बांधते हैं। नवरात्र के दौरान यहां प्रतिदिन करीब एक लाख श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। पहले यहां भक्ति की कुछ खतरनाक प्रथाएं होती थीं, जैसे मुंह में नुकीली धातु रखना, लेकिन अब प्रशासन की सख्ती के बाद यह बंद हो चुकी हैं।

मंदिर में चार प्रमुख द्वार हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। अधिकांश भक्त पूर्व की ओर से प्रवेश करते हैं। नवरात्र में मेले का भी आयोजन होता है, जिसमें झूले और दुकानें लगाई जाती हैं।

“माता के दर्शन के लिए प्रतिदिन 50 हजार से अधिक भक्त आते हैं। सुबह 3 बजे से ही दर्शन का ताता शुरू हो जाता है और रात तक चलता है।”
– रूपम शर्मा, अध्यक्ष, बारा देवी मंदिर ट्रस्ट

किदवई नगर जंगली देवी मंदिर

यह मंदिर लगभग 1400 साल पुराना है। इतिहास में दर्ज है कि मो. बकर के मकान की खुदाई के दौरान ताम्रपत्र मिला था, और वहीं नीम के पेड़ की खोह में मां की प्रतिमा मिली। वर्ष 1979 में तूफान में नीम का पेड़ गिर गया, इसके बाद भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।

मां की प्रतिमा 2.45 कुंतल चांदी के सिंहासन में विराजमान है और दिन में तीन बार स्वरूप बदलती है। भक्त मानते हैं कि ईंट चढ़ाने से मां मुराद पूरी करती हैं। नवरात्र में मंदिर और गर्भगृह को फूलों से सजाया जाता है, साथ ही कन्या भोज और खजाना वितरण भी आयोजित होता है।

– विजय पांडेय, महामंत्री, जंगली देवी मंदिर ट्रस्ट

घाटमपुर कुष्मांडा देवी मंदिर

यह मंदिर करीब 1000 साल पुराना है। इतिहास के अनुसार इसकी नींव सन् 1380 में राजा घाटमपुर दर्शन ने रखी थी। 1890 में चंदीदीन भुर्जी ने मंदिर का निर्माण कराया। मराठा शैली में बने मंदिर की मूर्तियां दूसरी से दसवीं शताब्दी की मानी जाती हैं।

कृष्णा नामक ग्वाला की गाय के दूध गिराने से मां की पिंडी मिली थी, जिसे लेकर मान्यता है कि इस जल का आंखों पर लगाने से रोग दूर होते हैं। नवरात्र में मंदिर में लगभग 50 हजार श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन के लिए आते हैं। चौथे दिन भव्य दीपदान का आयोजन किया जाता है।

– लल्लू सैनी, अध्यक्ष, कुष्मांडा देवी माली सेवा समिति